आग बनो, सम्मान मिलेगा || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैंने शिविर में आने की बात अपने जानने वालों को बतायी तो सबकी ओर से एक सी ही प्रतिक्रिया आयी कि ये तो जोगी बनने जा रहा है या संन्यास लेने की सोच रहा है। तो मेरा प्रश्न ये है कि समाज में अध्यात्म की ऐसी छवि क्यों बनी हुई है कि जो आध्यात्मिक हो जाएगा, वो एक दिन संन्यासी बन जाएगा और समाज को छोड़ देगा।
आचार्य प्रशांत: किया होगा लोगों ने ऐसा, इसीलिए ऐसी छवि है। क्या कहें इसमें? धर्म को तो समाज का केन्द्र होना चाहिए, समाज का ईन्धन होना चाहिए। धार्मिक आदमी जैसा ऊर्जावान जीवन तो किसी और का होना नहीं चाहिए। पर अगर समाज ने ये देखा है कि जो लोग धार्मिक होते हैं वो एकदम निठल्ले पड़ जाते हैं, तो फिर क्या किया जाए, बताइए।
अगर यही अनुभव में आया है समाज के कि अध्यात्म के नाम पर लोग कहीं जाकर पड़ जाते हैं, कहते हैं, ‘बस हो गया, जय सियाराम! करना क्या है, ये तो जगत माया है, मिथ्या है’, तो फिर ऐसी छवि बन गयी है। अब कुछ लोग निकलें जो दिखाएँ कि आध्यात्मिक आदमी से ज़्यादा गतिशील जीवन किसी का होता नहीं है, तो फिर धीरे-धीरे ये छवि मिटेगी भी। आप बोलते हो ऋषिकेश, अब यहाँ इतने साधु वगैरह हैं, लोगों को यही छवि आती है कि कहीं जा रहा होगा, बैठ जाएगा ऐसे ही, चिलम फूँकेगा!
(सभी श्रोतागण हँसते हुए)
एक आ गया था जब यहाँ तैयारी हो रही थी, ये सब तब गेरुआ-ही-गेरुआ यहाँ लगा हुआ था, तब ये बीच में हरे-पीले भी नहीं थे। तो ये सब देखकर पूछता है, ‘माल (गाँजा) है क्या?’ गेरुए का मतलब ही माल से हो गया है! यहाँ पर तैयारियाँ दो-तीन दिन से चल रही हैं। लोगों को उत्सुकता होती थी, बीच-बीच में सब इधर-उधर से आकर झाँकते थे कि क्या होने जा रहा है, क्या होने जा रहा है। लोग, लोगों की जिज्ञासाएँ!



