
मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब आप बोलते हो कि शुरुआत होगी तथ्य से, तो तथ्यों को देखना हैं, अब हर समय ऐसे तथ्यों को दूर ही से नहीं देखा जाता। जैसे अतीत है तो अतीत में भी उन तथ्यों के पास जाकर क्योंकि वो वहाँ लगातार हो रहे हैं तो


प्रश्नकर्ता: आख़िर इतना उपद्रव में करने में मज़ा क्यों आता है हम लोगों को?



आचार्य प्रशांत: तो पहले अध्याय का दोहराव हमने पिछले सत्र में पूरा करा, 'विषादयोग'। अर्जुन भ्रमित हैं, दुखी हैं और लगभग निश्चय कर चुके हैं कि मैं नहीं लड़ूँगा। और न लड़ने के पीछे जो दो तत्व वो बता रहे हैं, वो क्या थे मोटे तौर पर? वृत्तियाँ और?


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम रोहिंद है और मैं एक एक्टर (अभिनेता) हूँ। मेरा गोवा शिविर से कुछ समय पहले ब्रेकअप हुआ था।
ब्रेकअप होने के बाद में भी मैं चाहता था रिश्ते में रहना। तो उन्होंने इस तरीक़े से मुझे बिलकुल नीचा दिखाते हुए रिश्ते को समाप्त किया।…


अविवेकी जीव के मन में, ‘मैं’ और ‘मेरे’ का विचार उठता है, फिर रजस मन पर छा जाती है, उस मन पर जो वास्तव में, मौलिक रूप से सात्विक है।


सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।






प्रश्नकर्ता: समस्या ये है कि आत्मा भी चाहिए और अहंकार छूटता नहीं।

प्रश्नकर्ता: पिछले बाईस वर्षों से मैं एक साधना कर रहा था। अब ऐसा लगता है कि मैं ग़लत रास्ते पर साधना कर रहा था। तो इस संबंध में एक चौपाई आयी है कि शिव जी कहते हैं कि,



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या ज्ञान प्राप्ति के लिए कर्म अनिवार्य है? कर्म के अलावा ज्ञान प्राप्ति के कौन-कौन से साधन हैं? ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में बाधा क्या है?

प्रश्न: यदि ईश्वर सबकी सभी माँगें पूरी कर दें, तो क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: तो ईश्वर का अस्तित्व मिट जाएगा।

प्रश्न: आचार्य जी, ‘अपराध बोध’ क्या है?


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने एक प्रवचन में कहा है कि, "जो माँगोगे वो मिलेगा। अगर नहीं मिलता तो ये समझना कि वो तुम्हारे लिए नहीं है।" तो हमें कैसे पता चलेगा कि हमे क्या माँगना चाहिए और क्या नहीं माँगना चाहिए, ताकि हमें वो मिले जो हम माँगें?


आचार्य प्रशांत: सब कुछ तो सिर्फ़ जानना है न? खुद जानना। बस सुन नहीं लेना। किसी ने बोल दिया कि इंजीनियरिंग कर लो, तो कर ली। अब किसी ने बोल दिया कि चलो सॉफ्टवेयर वाली जॉब ले लो, तो ले ली। फिर किसी ने बोल दिया कि अब ये है,…

अष्टावक्र गीता (अध्याय २ श्लोक १८)

वक्ता: आप जो कुछ भी पाना चाहते हो, वो पहले ही मौजूद है। अगर पहले से ही मौजूद ना हो तो वो इंस्टिंक्ट ही नहीं उठेगी पाने की।
श्रोता: हम ये कह सकते हैं कि जो लक्ष्य है मूलतया वो गन्दगी को साफ़ करने का है ताकि जो हम हैं,…

प्रश्न: सर, मेरा सवाल है- दो लोग एक ही समाज में पले-बड़े हैं, एक ही जैसी स्थिति में, लेकिन बहुत बार ऐसा देखते हैं कि दोनों के शौक बिलकुल अलग-अलग होते हैं, ऐसा क्यों होता है? एक अगर इस दिशा में जा रहा है, तो दूसरा दूसरे दिशा में, बिलकुल…

वक्ता: पिंजरा कितना भी मज़बूत हो, उसकी तीलियाँ कितनी भी सघन, लेकिन आकाश अपना अहसास करा ही देता है। बिलकुल बंद दीवारों द्वारों वाला पिंजरा हो, तो भी अपना अहसास करा देगा क्यूँकी आकाश पिंजरे के बाहर ही नहीं, पिंजरे के भीतर भी है, और पक्षी के भीतर भी है।


प्रश्न: उन पलों में जिनमें हम ध्यान में नहीं होते, उन पलों में एक गति होती है। वो गति ध्यान के पलों में क्यों नहीं होती?
वक्ता: गति की ज़रूरत सिर्फ़ तभी पड़ती है जब कोई संचलन या निरंतरता हो। ध्यान में सब आता और जाता है। ध्यान में कोई…

प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपके और भी कई संवाद सुने हैं, देखे हैं, उनमें एक कड़ी जुड़ती है निर्भरता और अहंकार में।

आचार्य प्रशांत: बाहर जो कुछ भी है, वो तो एफ़र्ट (प्रयास) माँगेगा-ही-माँगेगा। ‘एफ़र्टलेसनेस ’ कहाँ होती है?

कबीर माया पापिनी, लोभ भुलाया लोग। पूरी किनहुं न भोगिया, इसका यही बिजोग।।


श्रोता: सर, एक तरफ़ तो हमारी सारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं| और दूसरी तरफ़ दुनिया में हर वक़्त हमें आँका जा रहा होता है| ऐसे में हम परिस्तिथियों के ग़ुलाम बन कर रह जाते हैं| इस दशा को सुधारने के लिये क्या करें?

आगि जो लागि समुद्र में, धुआँ न परगट होय ।

श्रोता: सर, इच्छाओं को नियंत्रित कैसे करूँ?

सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?






तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।२.१।।
~ श्रीमद्भगवतगीता, द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, प्रथम श्लोक
आचार्य प्रशांत: संजय कहते हैं कि श्री कृष्ण ने उस प्रकार भाव से आविष्ट और अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन से कहा- 'हे अर्जुन, अनार्यों के योग्य, स्वर्ग प्राप्ति का विरोधी निंदाजनक ये मोह तुम्हें कहाँ से…
निर्पंथी को भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान। निर्द्वंद्व को मुक्ति है, निर्लोभी निर्वाण।। ~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: चार हिस्से हैं इसके, चारों को अलग-अलग बोलिए। एक आदमी पहले एक ही बोले, फिर अगला दूसरा।
"निर्पंथी को भक्ति है" — क्या अर्थ हुआ?
प्रश्नकर्ता१: सर, यहाँ निर्पंथी से अर्थ होता…
प्र: आख़िर हम लोगों से भूल कहाँ हो रही है?
आचार्य: भूल ये हो रही है कि जब शान्ति मिलती है, तो…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। जब मैं भारत का इतिहास पढ़ता हूँ, विशेषकर मुसलमान आक्रांताओं को लेकर। तो जो स्कूल में इतिहास पढ़ा था, वो देखकर मुझे ये लगता है कि काफ़ी कुछ दबाया गया। जैसे ब्रिज अंडर द कारपेट (सच्चाई छुपाना) बोलते हैं, वैसा किया गया।
तो अब ये देखने…
आचार्य प्रशांत: प्रथम अध्याय पर श्लोक-क्रमानुसार पूरी चर्चा और व्याख्या हम पहले कर चुके हैं। आज हम एक-एक श्लोक को अलग-अलग न लेकर पूरे अध्याय का ही सार संक्षेप में समझना चाहेंगे, ज़रा ऊपर से देखेंगे, विहंगम दृष्टि से।
बात ही पूरी क्या है? पहला अध्याय उस समस्या को हमारे…
श्रोता:…
प्रश्नकर्ता: किसी की यादें दिल से कैसे निकालें? समझ नहीं आता कि नाकाम इश्क़ का मातम मनाएँ या उन दो सालों की खुशबुओं का जशन। यादों में दिल ख़ुशगवार रहता है और यादों से बाहर बेकस और मायूस। (इम्तियाज़ अली हैं लखनऊ से)
आचार्य प्रशांत: यादों में दिल ख़ुशगवार रहता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्कार। मेरा एक छोटा सा प्रश्न है जिसका उत्तर मैं आपके विचारों के माध्यम से जानना चाहता हूँ। तीन शब्द हैं मेरे मस्तिष्क में — संकोच, डर और ज्ञान। क्या किसी तरह से ये आपस में सम्बन्धित हैं या किसी बिन्दु पर एक-दूसरे को कहीं परस्पर काटते…
~ उद्भव गीता, अध्याय १८, श्लोक ९
प्रसंग:
रज का क्या अर्थ होता है? अविवेकी आदमी "मै" का भाव क्यों…
निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः। छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृत:॥
ग्राम में रहने पर वहाँ के स्त्री-पुत्र आदि विषयों में जो आसक्ति होती है, यह जीव को बाँधने वाली रस्सी के समान है। पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं।…
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए,…
डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपने-आप को बहुत मजबूर अनुभव ना करो । और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अंधी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक़्क़त नहीं है, अगर वो अंधी ना हों। कुछ ऐसा माँग रहे हो…
तुम्हें क्या लगता है नर्क वो जगह है जहाँ बड़े-बड़े कड़ाहों में तेल उबल रहा है और लोग उसमें पकौड़ो की तरह तले जा रहे हैं? ना! नर्क वो जगह है जहाँ सब खूब मेहनत करते हैं, कमाते हैं, खाते हैं और सो जाते हैं। नर्क बड़ी साफ़-सुथरी जगह है…
प्रश्नकर्ता: हमारे मन का स्तर उठता क्यों नहीं? हम बेहतर होना चाहते हैं, पर चाहते हुए भी बेहतर हो क्यों नहीं पाते?
आचार्य प्रशांत: देखिए जो ये शब्द होता है न 'चाहना', ये थोड़ा भ्रामक शब्द है। हम साफ़-साफ़ जानते नहीं हैं कि हम चाहते क्या हैं। आप पूछेंगे तो…
आचार्य प्रशांत: लोग पूछते हैं, “अध्यात्म की ज़रूरत क्या है?"
तुम अगर आध्यात्मिक नहीं हो तो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे साथ कुछ अच्छा घटेगा, कुछ बुरा घटेगा। हमारे साथ जो तय है होना, जो डिफ़ॉल्ट (अकारण) है, वो प्राकृतिक है; और वो हमारे लिए अच्छा नहीं है। ये बात…
~ अष्टावक्र गीता
हे पुत्र! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देखकर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है।
आचार्य प्रशांत: इच्छा को शांत करना कोई…
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।
सत हरि भजन जगत सब सपना।।
आचार्य…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, 2011 के आसपास मुझे डिप्रेशन की समस्या हुई थी। उस समय घर में अशांति की वजह से मानसिक संतुलन थोड़ा ख़राब हो गया। एकदम से 'डर' आ गया जीवन में, और उसके बाद से वैसे ही चल रहा है। डर एकदम से हावी होता ही रहा,…
प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम! अभी तक जितना जीवन जिया, सब भौतिक वस्तुएँ एकत्रित करने में बिता दिया। आपके वीडियोज़ सुनने शुरु किए आठ-नौ महीने से, तो झूठ दिखता है कि कितना बेहोशी वाला जीवन जिया है। फ़िर, कहीं-न-कहीं उनका आकर्षण बना रहता है। जब परिवार में अपने परिवारजनों को देखते…
आचार्य प्रशांत: ज्ञान की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन तुम्हारी मुमुक्षा है। साधन तुमने कहा न। स्वयं आदि शंकराचार्य ‘साधन…
जीव…
प्रश्न: “मन जब भी कुछ छोड़ना चाहता है तो ऊपर-ऊपर की ही बात होती है, अंदर कहीं ना कहीं वो शायद पकड़ कर ही बैठा है। ऊपर-ऊपर से लगता है कि काफी कुछ जान गया, पर अंदर से पता है कि झूठ कितना है, स्थिति वही है। प्रश्न मैं ये…
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य प्रशांत: एक कहानी सुना रहा हूँ, ठीक है? इसको तार्किक तरीके से मत सुनना, इसका भाव समझने की कोशिश करना। कहते हैं, कि एक बार एक फ़कीर आया एक राजा के यहाँ पर। बड़ा राजा था, राजा से बोलता है एक छोटा सा कुछ चाहिये, मिलेगा? थोड़ा सा…
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।
आश्चर्य है मुझमें स्थित हुआ जगत वास्तव में मुझमें स्थित नहीं है, इसलिए न मेरा बंध है, न मोक्ष है ऐसे विचार से आश्रय रहित होकर मेरी…
श्रोता: सर ये, ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’?
वक्ता: ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’। बहुत बढ़िया; कुछ नहीं है जो उसमें गल नहीं जाता, कुछ नहीं है जो उसमें लय नहीं हो जाता। हम ये तो हर समय बोलते रहते हैं कि “द सुप्रीम इज़ द अल्टीमेट…
आचार्य प्रशांत: जब इतना सुने हो, तो जानते तो और ज़्यादा हो।
प्र: सर, अंत में उसका जो हल आता है वो ये आता है कि अपनी सुनो, लेकिन…
आचार्य: वहाँ एफ़र्टलेसनेस रहे, वहाँ पर अनावश्यक संघर्ष ना रहे। मानसिक एफ़र्ट का मतलब होता है, बहुत सारी बातें जो सोच रहे हैं, बहुत सारे विकल्प हैं जो सामने…
~ संत कबीर
वक्ता: क्या समझ आया इस दोहे से?
श्रोता १: भोगने के लिए, आपका होना वहाँ पर बड़ा ज़रुरी है। माया कभी तृप्ति होने नहीं देगी। लोभ का मतलब ही है कि – और चाहिए,…
प्रश्नकर्ता: सर, ये जो तीन गुणों का मॉडल है प्रकृति में — तमस, रजस और सत्, तो इसमें एक *हाइरार्की * (अनुक्रम) भी है। तमस, फिर रजस, फिर सत। तो सर, सत् में ऐसा क्या होता है कि वो ज़्यादा करीब होता है साक्षित्व के?
आचार्य प्रशांत: साक्षी हल्का…
वक्ता: बेटा ज़रूरतें हमारी बहुत…
~कबीर
वक्ता: बड़े-बड़े समुद्र हैं, जो हमसे बाहर लहराते हैं। और एक समुद्र हमारे भीतर भी लहराता है – मन का समुद्र। बाहर के समुद्रों में आग लगती हुई आपने शायद…
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?
एक महिला खिलाड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतती है, लेकिन उसे ऑनलाइन हैरसमेंट, फ़ेक अकाउंट्स और आपत्तिजनक तस्वीरों का सामना करना पड़ता है। सदियों की वर्जनाओं ने हमें स्त्री को सिर्फ़ देह के तल पर देखने का आदी बना दिया है, उसकी काबिलियत या गहराई से कोई सरोकार नहीं रहता। यही पैटर्न गाड़ी, नौकरी और शादी जैसे रोज़मर्रा के फैसलों में भी दिखता है। यह कोई विकृति नहीं, बल्कि इन्हीं वर्जनाओं की स्वाभाविक परिणति है।
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।