
यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।











![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)




अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्। न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥





तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढतां।

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं।
असारं निन्दितं हेयमि ति निश्चित्य शाम्यति॥९- ३॥
अनुवाद: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है, सारहीन है, निंदनीय है, त्याग करने योग्य है, ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है।



असंसारस्य तु क्वापिन हर्षो न विषादिता। स शीतलहमना नित्यं विदेह इव राजये॥



कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।


व्यामोहमात्रविरतौस्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥६॥
अनुवाद: अज्ञान मात्र की निवृत्ति होते ही, तथा स्वरूप का बोध होते ही, दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्वज्ञ पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं।



सर्वभूतेषु चात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं





येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥१५॥
अनुवाद: जिसने इस विश्व को कभी यथार्थ देखा हो, वह कहा करें कि नहीं है, नहीं है,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पिछले एक महीने से मैं अष्टावक्र गीता पढ़ रहा हूँ। तो मैंने अपने जीवन में भी देखा, शांति के रास्ते में शरीर और मन बीच-बीच में बाधा बनते हैं। तो इसी विषय पर जब मैंने अष्टावक्र गीता देखा; उसमें दो श्लोक मिले जो इससे रिलेवेंट थे,




आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र सत्तरवें अध्याय में ‘सव्छेन्द्रियों’ की बात करते हैं, स्वक्ष इन्द्रियाँ। तो प्रिय कह रही हैं की इससे क्या अर्थ हुआ? ‘स्वक्ष इन्द्रिययाँ’ मैं एक ही शब्द बोलूँ अभी, उसको कुछ लोग बड़े साधारण तरीके से सुन लेंगे। कुछ उस पर मुँह बिसोरने लगेंगे। कुछ हँसदेंगे। एक

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जड़धीर्यदि |मनोरथान् प्रलापांश्र्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ||
अष्टावक्र गीता


मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढ़तां|
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विष्यलालसः||
~अष्टावक्र गीता (अध्याय-18, श्लोक-76)

अष्टावक्र गीता (अध्याय २ श्लोक १८)
हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।
आमतौर पर हमने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना है। माना गया है कि धर्म, अर्थ और काम रहेगा, तो अन्ततः मोक्ष उतरेगा — यह भ्रम है। हमने यह बड़ी-से-बड़ी गलती की है कि धर्म को अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन बना लिया है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति का नाम धर्म नहीं हो सकता; वो तो कोई दुकान होगी। ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि यदि धर्म वो है जो अर्थ और काम की सेवा में लगा हुआ है, तो अर्थ और काम को ही नहीं, धर्म को भी त्याग दो — इनको त्यागना ही मोक्ष है।
जो सीखने को तैयार है, उसके लिए तो समूचा अस्तित्व ही गुरू है। पर तुममें पहले सीखने की वो महत् आकांक्षा तो उठे। पहले तुम ये मानो तो, कि जीवन बड़ा सूना है, बड़ा व्यर्थ जा रहा है, तुम्हारे भीतर एक छटपटाहट तो उठे। तुम तो झूठे संतोष में जी रहे हो, तुम तो माने बैठे हो कि ये तो ठीक है, मुझे पता ही है। हाँ! हाँ! ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, सब ठीक है। मस्त रहो! बस ऐसा है, सन्तुष्ट रहो, “संतोषं परमं धनम्।” जिसमें तड़प नहीं है, उसके लिए तो अध्यात्म की शुरुआत ही नहीं हो सकती।
अहंकार है, कुछ नहीं भी करो तो भी तुम लगे ही हुए हो, रत हो, उद्यमी हो। और नहीं है अगर अहंकार तो जो करना है करो, तुमने तब भी कुछ नहीं किया।अहंकार रहित कर्तृत्व को ही कहते हैं अकर्तृत्व। अकर्ता और कोई नहीं है; अकर्ता और कर्ता में यही अंतर है कि करते दोनों हैं, एक इसलिए करता है कि कुछ मिल जाएगा और एक बस यूँही करता है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…
आचार्य प्रशांत: क्या करना है, क्या नहीं करना है। क्या होना है, क्या नहीं होना है। दिशा कौनसी लेनी है, नहीं लेनी है इसका निर्णय अहंकार ही करता है। और आप ये नहीं कह सकते कि अहंकार ने अपने लिए गलत निर्णय करा। कोई और देखें, तो कह देगा कि…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…
कुत्रापिन जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्यधीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १८ , श्लोक २३)
अनुवाद: जिसका अंत:करण शीतल एवं स्वच्छ है, वो आत्माराम है। उस धीरपुरुष की न तो किसी वस्तु के त्याग की इच्छा होती है, और न तो कुछ पाने की आशा।
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।…
आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को…
आचार्य प्रशांत: स्वागत है! और मेरी मेज़ पर ये दोनों रीडिंग्स (पठन सामग्री) रखी हुई हैं जो आपको दी गयी थीं पढ़ने के लिए। तो कितने लोग हैं जो इसमें से कम-से-कम आधी सामग्री पढ़ पाये? आधी भी जिन्होंने पढ़ ली हो वो बता दें। (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)…
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं…
बुल्लिआ हिजरत विच्च इस्लाम दे मेरा नित्त है खास आराम। नित्त नित्त मराँ ते नित्त नित्त जीवाँ मेरा नित्त नित्त कूच मुकाम।
मैं भी हज़रत पैगम्बर की तरह हिज़रत करता हूँ, यात्रा करता हूँ, लेकिन मेरी यात्रा ऐसी है जो तब शुरु होती है, जब मैं बिलकुल शान्त, आराम, विश्राम…
◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।
◾ मिथ्याचारी वह है जो आगे के लालच में अच्छा काम करता है।
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥
अनुवाद: जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही…
न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्। निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
आत्मा का स्वरुप न दूर है, न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न प्रकार है और न मल।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक ५
आचार्य प्रशांत: "आत्मा…
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २
आचार्य प्रशांत: बता रहे हैं अष्टावक्र कि आए ही क्यों हो…
"मुक्ति के लिए अपने मन से वस्तुओं के उपभोग की इच्छा को विष की तरह त्याग दो, क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन करो" ~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १, श्लोक २
आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र गीता, पहला अध्याय, दूसरा श्लोक।
अष्टावक्र दया की बात क्यों कर…
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||
~ अष्टावक्र गीता
अनुवाद: स्थितप्रज्ञ पुरुष महान भोगों में विलास करते हैं, और पर्वतों की गहन गुफाओं में भी प्रवेश करते हैं, किन्तु वे कल्पना बंधन एवं बुद्धि वृत्तियों से मुक्त होते हैं।
आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और…
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक ८ )
अनुवाद: आत्मा ही ब्रह्म है और भाव - अभाव कल्पित हैं, ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?
अचार्य प्रशांत: जो…
क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्वन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 41)
अनुवाद: जो आग्रह करता है, उस मूर्ख का चित्त निरुद्ध कहाँ है? आत्मा में रमण करने वाले धीर पुरुष का चित्त तो सदैव स्वाभाविक रूप से निरुद्ध ही रहता है ॥ 41॥
आचार्य…
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 32)
A stupid man is bewildered when he hears the real truth, while even a clever man is humbled by it just like the fool.
आचार्य प्रशांत: यह श्लोक कहता है कि…
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय - ९, श्लोक…
निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।
आचार्य प्रशांत:…
~अष्टावक्र गीता
अध्याय १८, श्लोक २०
अनुवाद: जो धीर पुरुष है उसका न प्रवृत्ति से, न निवृत्ति से कोई आग्रह होता है। जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
आचार्य प्रशांत:…
अनुवाद: संसार मुक्त पुरुष को ना कहीं कोई हर्ष होता है, ना विषाद, उसका मन सदा शीतल होता है और वह विदेह के समान शोभायमान होता है।
आचार्य प्रशांत: विदेह के…
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं।
अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः॥ २-१५॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं, यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है वह निष्कलंक मैं ही हूँ
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 2 श्लोक १५)
प्रसंग:
"The Self is abstract intelligence free from thought.…
क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक १४ )
अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?
आचार्य…
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक…
समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता
अध्याय १८ श्लोक ७
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: तीन बातें हैं तीनों एक हैं। तीनों में से कोई किसी का कारण नहीं है।…
विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय - १0, श्लोक – १)
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण…
भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित्परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 4)
अनुवाद: यह संसार केवल एक भावना मात्र हैं, परमार्थत: कुछ भी नहीं है। भाव और अभाव के रूप में स्वभावत: स्थित पदार्थों का कभी अभाव नहीं हो सकता।
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति कह रही है कि…
~ अष्टावक्र गीता
आचार्य प्रशांत: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा रहे। जिस मुनि…
निर्निमित्तमिदं किंतु
निर्ध्यायेति विचेष्टते॥१८- ३१॥
~ अष्टावक्र गीता
अनुवाद: जीवन्मुक्त का चित्त ध्यान से विरक्त होने के लिए और व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु निमित्त के शून्य होने पर भी वह ध्यान से विरत भी होता है और व्यवहार भी…
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात…
अनुवाद: तत्त्वज्ञ पुरुष तो संसारियों से उल्टा ही होता है, वह सामान्य लोगों जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरुप में न समाधि देखता है, न विक्षेप और न लेप ही।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -…
~ अष्टावक्र गीता
अर्थ: विश्व तुम्हारी चेतना में उभरा हुआ एक चित्र है। विश्व तुम्हारी चेतना में उठती-गिरती एक तरंग है। जिसने जान लिया कि क्या अस्तित्वमान है, और क्या अस्तित्वहीन है वह जन्म मरण के पार चला जाता है। वह…
~ अष्टावक्र गीता (…
~ अष्टावक्र गीता
हे पुत्र! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देखकर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है।
आचार्य प्रशांत: इच्छा को शांत करना कोई…
अष्टावक्र गीता, (अध्याय-2, श्लोक-22)
प्रश्नकर्ता:पहली लाइन तो बार-बार सुनी भी है और शायद उसके कारण हमें लगता है कि "मैं देह नहीं हूँ" पर जो उसकी अगली लाइन है कि "न…
निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…
आचार्य प्रशांत: किसका है यह? क्या करें इसका |
श्रोता: इसमें लिखा हुआ है की मन को नियंत्रित करो |
आचार्य जी: इसमें लिखा है की तुम्हारी जागृति हुई नहीं है और तुमने तरीके अपना रखे…
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥
~अष्टावक्र गीता (अध्याय९, श्लोक १)
To whom does the conflict of duties performed and not performed…
कृता-कृते, कृता-कृते, कृत-अकृते, performed-not performed, done-not done.
To whom does the conflict of duties performed and not performed, and of the pairs…
अज्ञानी तत्त्व का श्रवण कर के भी अपनी मूढ़ता का त्याग नहीं करता| वह बाह्य रूप से तो निसंकल्प हो जाता है, पर उसके मन में विषयों की इक्षा बनी रहती है|
वक्ता: “मूर्ख उस आत्मा को सुन…
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।
आश्चर्य है मुझमें स्थित हुआ जगत वास्तव में मुझमें स्थित नहीं है, इसलिए न मेरा बंध है, न मोक्ष है ऐसे विचार से आश्रय रहित होकर मेरी…