प्रश्नकर्ता: प्रणाम, गुरुजी। मैं आपसे दो-तीन बार मिल चुका हूँ। आपको जब से सुन रहा हूँ तब से मेरा जीवन काफ़ी हद तक बदल गया है। लेकिन मैं जब ग्रन्थों को पढ़ता हूँ, तो लगता है कि मुझे प्रतिपल साक्षी बनकर ध्यान में रहना चाहिए। लेकिन आचार्य जी, मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि जियें कैसे और सही जीना क्या है?
आचार्य प्रशांत: जीना कैसे है ये तय करना आपका काम नहीं है। जीना बहुत अच्छा हो जाएगा अपनेआप। हमें ये सवाल या ये चिन्ता ही इसलिए उठती है क्योंकि जीना कहीं-न-कहीं गड़बड़ हो रहा होता है, उसमें कोई खराबी आ रही होती है। चूँकि खराबी आ रही होती है इसलिए हम पूछना चाहते हैं कि जियूँ कैसे। आपका सबकुछ अच्छा चल रहा हो — जैसे साँस अच्छी चलती है — तो कभी पूछा है, ‘साँस कैसे लूँ?’ ‘साँस लूँ कैसे?’ पूछा है कभी?
जो कुछ भी ठीक चल रहा होता है उसके विषय में कभी पूछते हो कि साँस लूँ कैसे? पलक झपकाऊँ कैसे? पाँव उठाऊँ कैसे? खाना खाऊँ कैसे? ये सब सवाल आमतौर पर नहीं पूछते न, क्योंकि ये सबकुछ अपनेआप ही पहले से ही ठीक चल रहा है। लेकिन ये हम बहुधा पूछते हैं कि जियूँ कैसे? तो क्या बात पकड़ में आयी? जीवन में कुछ गड़बड़ चल रहा होगा तभी तो पूछना पड़ता है कि जियूँ कैसे। है न?
अगर साँस में कुछ गड़बड़ी हो गयी हो, फेफड़ों में कुछ खराबी आ गयी हो, तो आपको ये भी पूछना पड़ जाएगा कि साँस लूँ, है न? तो अगर हमें बार-बार ये पूछना पड़ रहा है कि जियूँ कैसे, तो माने जीवन में कुछ गड़बड़ चल रही है।
आचार्य: कौन लाया जीवन में वो गड़बड़? कौन लाया?
श्रोतागण: मैं।




