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जियें कैसे? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, गुरुजी। मैं आपसे दो-तीन बार मिल चुका हूँ। आपको जब से सुन रहा हूँ तब से मेरा जीवन काफ़ी हद तक बदल गया है। लेकिन मैं जब ग्रन्थों को पढ़ता हूँ, तो लगता है कि मुझे प्रतिपल साक्षी बनकर ध्यान में रहना चाहिए। लेकिन आचार्य जी, मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि जियें कैसे और सही जीना क्या है?

आचार्य प्रशांत: जीना कैसे है ये तय करना आपका काम नहीं है। जीना बहुत अच्छा हो जाएगा अपनेआप। हमें ये सवाल या ये चिन्ता ही इसलिए उठती है क्योंकि जीना कहीं-न-कहीं गड़बड़ हो रहा होता है, उसमें कोई खराबी आ रही होती है। चूँकि खराबी आ रही होती है इसलिए हम पूछना चाहते हैं कि जियूँ कैसे। आपका सबकुछ अच्छा चल रहा हो — जैसे साँस अच्छी चलती है — तो कभी पूछा है, ‘साँस कैसे लूँ?’ ‘साँस लूँ कैसे?’ पूछा है कभी?

जो कुछ भी ठीक चल रहा होता है उसके विषय में कभी पूछते हो कि साँस लूँ कैसे? पलक झपकाऊँ कैसे? पाँव उठाऊँ कैसे? खाना खाऊँ कैसे? ये सब सवाल आमतौर पर नहीं पूछते न, क्योंकि ये सबकुछ अपनेआप ही पहले से ही ठीक चल रहा है। लेकिन ये हम बहुधा पूछते हैं कि जियूँ कैसे? तो क्या बात पकड़ में आयी? जीवन में कुछ गड़बड़ चल रहा होगा तभी तो पूछना पड़ता है कि जियूँ कैसे। है न?

अगर साँस में कुछ गड़बड़ी हो गयी हो, फेफड़ों में कुछ खराबी आ गयी हो, तो आपको ये भी पूछना पड़ जाएगा कि साँस लूँ, है न? तो अगर हमें बार-बार ये पूछना पड़ रहा है कि जियूँ कैसे, तो माने जीवन में कुछ गड़बड़ चल रही है।

आचार्य: कौन लाया जीवन में वो गड़बड़? कौन लाया?

श्रोतागण: मैं।

आचार्य: उसी को पकड़ना है। जीवन में कुछ गड़बड़ चल रही है, कोई तो है न जीवन में जो गड़बड़ लाया है। उसी को ‘मैं’ बोलते हैं। और अगर उसी को ‘मैं’ बोलते हैं तो काहे बोल रहे हो कि मैं तो हूँ ही नहीं? तुम अगर नहीं होते तो ये सवाल पूछने की ज़रूरत ही क्यों होती कि जियूँ कैसे? आप हो, इसीलिए तो आप अपने जीवन को खराब कर रहे हो। आप नहीं हो तो आपके जीवन को खराब करने वाला बचेगा कौन? फिर आपका जीवन आपका रहेगा ही नहीं, फिर जीवन मात्र रहेगा। इन दोनों बातों में अन्तर समझो।

जीवन मात्र का होना और मेरे जीवन का होना, ये दोनों बहुत अलग-अलग बातें हैं। जीवन मात्र एक सहज प्रवाह है और मेरा जीवन एक जन्म पर्यन्त ‘आह’ है।

जीवन को जो रोक रहा है, जीवन के प्रवाह में जो बाधा बन रहा है, उसी को पकड़कर चलना है। उसी का नाम ‘मैं’ है। ठीक है? उसको तब तक पकड़ते चलना है जब तक ये भी लग रहा हो कि मैं नहीं हूँ। अगर ये लग रहा है कि मैं हूँ, तब तो चलो फिर भी आसान है पकड़ लिया, ‘मैं हूँ।’

चोर खुद ही छाती बजाकर घोषणा कर रहा था कि मैं हूँ, तो आसानी हो गयी थोड़ी, उसको पकड़ लिया। चोर कई बार साज़िश करता है। हमें ये एहसास दिलाता है कि वो नहीं है। तब हमारा काम क्या हो जाता है? आप तो पुलिसवाले हैं न? तो आपका काम क्या हो जाता है जब चोर आपको ये एहसास दिलाए कि चोर नहीं है? आप कहते हैं, ‘इसका मतलब ये नहीं है कि चोर नहीं है, इसका मतलब ये है कि चोर शातिर है!’

चोर है इसका प्रमाण ये है कि चोरी हुई है भाई। चोरी तो हुई है न? तो कोई लाख कहे कि चोर नहीं है, मैं कैसे मान लूँ कि चोर नहीं है? चोरी ही प्रमाण है चोर के होने का। इसी तरीके से हमारे जीवन के कष्ट और उलझाव ही प्रमाण हैं ‘मैं’ और ‘अहम्’ के होने का। वही तो चोर है।

चोरी क्या है? ज़िन्दगी में लूट मची हुई है। क्या लूट मची हुई है? कोई तुम्हारा आनन्द चुरा ले गया, कोई तुम्हारी मुक्ति चुरा ले गया, कोई तुम्हारा चैन चुरा ले गया, चोरी हो गयी न? तो चोर कैसे नहीं होगा? काहे को बोल रहे हो मैं नहीं हूँ? ये सारी चोरियाँ किसने करी हैं?

वही, आदत ही नहीं है एक बार में एफआइआर लिखने की। मानते ही नहीं कि चोरी हुई है। उसको इधर-उधर करते हैं कि नहीं हुई नहीं है, ऐसा है, वैसा है, वो बेचारा इधर-उधर हो रहा है। चोरी हुई है भाई, तो चोर होगा। दिखाई नहीं पड़ रहा तुमको — तो फ़िर दोहरा रहा हूँ — दिखाई नहीं पड़ रहा तुमको चोर तो इसका मतलब ये नहीं है कि चोर नहीं है, इसका मतलब है कि चोर शातिर है।

अब और मज़ा आएगा उसको पकड़ने में। यही तो अध्यात्म का मज़ा है। वो छुप रहा है, छुप रहा है, छुप रहा है, तुम्हें उसे पकड़ना है। और कई बार पता चलता है कि पकड़ में इसीलिए नहीं आ रहा था क्योंकि वो उधर नहीं है (बाहर की तरफ़ इशारा करते हुए), इधर है (स्वयं की तरफ़ इशारा करते हुए)। खोज कहाँ रहे थे? बाहर। अभी-अभी लिख लिए एफआइआर (प्राथमिकी) और सब खोजने निकले बाहर, ‘चोर कहाँ है, चोर कहाँ है, चोर कहाँ है? चलो।’

सब-इंस्पेक्टर (उप-निरीक्षक) पीछे है, उसके पीछे चार सिपाही, पूरा दस्ता निकला है चोर पकड़ने। पकड़ में ही कभी नहीं आता, बताओ क्यों? वो थाने में बैठता है, पकड़ में कहाँ से आएगा? वो बिलकुल सबसे ऊँची कुर्सी पर बैठता है थाने में। उसका नाम ‘अहम्’ है, ‘अहम्’। वो राज करता है और तुम उसे खोजने निकलते हो बाहर कहीं, वो पकड़ में नहीं आएगा। और जब बाहर पकड़ में नहीं आता तो तुम क्या बोल देते हो बड़ी आसानी से? चोर नहीं है। चोर है, जहाँ हो वहीं देखो, वहीं पर है।

समझ में आ रही है बात?

ये सब किताबी बातें जल्दी से अपने ऊपर लागू मत कर लिया करो, भूला मत करो कि बात किससे कही गयी है। किताब गलत नहीं है, चूक मत कर लेना। किताब को हमारा पढ़ने का तरीका असावधानी और अहंकार भरा है।

हम बिलकुल भूल जाते हैं कि अष्टावक्र किससे बात कर रहे थे। किससे बात कर रहे थे? जनक से बात कर रहे थे। ये चीज़ ध्यान में रखकर पढ़ो न अष्टावक्र को। अगर जनक कह देते हैं कि हे! मुनि, आपको सुनने के बाद मुझे स्पष्ट हो गया है कि मैं तो हूँ ही नहीं। तो ये उद्बोधन किसका है?

जनक का है बाबा, तुम्हारा थोड़े ही हो गया है। तुम क्यों इतने पुलकित हो गये बेकार में कि जो बात जनक को हुई मुझे भी हो गयी? तुममें निष्ठा है अष्टावक्र के प्रति जो जनक में थी, बोलो? जनक राजा थे, उसके बाद भी अष्टावक्र के सामने जा रहे हैं और अष्टावक्र उम्र में जनक के आधे नहीं तो चौथाई रहे होंगे। उम्र में भी कम, दिखने में भी विकृत, ऐसे ही मुनि हैं एक जंगल में फ़िरते, कोई सम्पदा नहीं, कुछ नहीं। ऐसी कोई बहुत विशिष्ट उनकी ख्याति भी नहीं थी।

पर जनक की मुमुक्षा ऐसी थी कि परवाह ही नहीं कर रहे कि मेरे सामने जो है वो उम्र में मुझसे कितना छोटा है। ख्याति में और सम्पदा में और प्रभाव सम्पन्नता में कितना छोटा है। तुममें अष्टावक्र के प्रति है वैसी निष्ठा क्या? हम तो अष्टावक्र के नाम पर क्या करते हैं? अष्टावक्र गीता पढ़ लेते हैं, वो भी कहीं बीच से दो श्लोक इधर से पढ़ लिये, चार श्लोक उधर से पढ़ लिये। तो हम पर अष्टावक्र का वो प्रभाव नहीं पड़ेगा जो प्रभाव अष्टावक्र का पड़ा था जनक पर।

तो अगर कभी अष्टावक्र हमारे सामने होते तो हमसे वो बात नहीं बोलते जो उन्होंने बोली थी जनक से। हम बहुत गड़बड़ कर ले जाते हैं। जो बात जनक के लिए बोली गयी है, जो बात सिर्फ़ जनक पर लागू होती है, जिस बात को सुनने के अधिकारी सिर्फ़ जनक हैं, वो बात हम ऐसा मान लेते हैं कि हमसे कही गयी है। ऐसी सी बात है कि जैसे मैकग्रा बॉलिंग कर रहा है, सचिन ने छक्का मार दिया और हम टीवी के सामने सोफ़े पर बैठे हैं प्लास्टिक का बल्ला लेकर के, हमने भी यूँ बल्ला घुमा दिया (हाथों से बल्ला घुमाने का इशारा करते हुए)।

ये क्या है? छक्का ही तो मारना था, जैसे अभी सचिन ने किया। वो इतनी सी स्क्रीन है उस पर ऐसे (छोटा सा) दिखाई देता है। स्क्रीन में देखा है न, कैसा दिखाई देता है? बॉल यूँ गयी, यूँ आयी और यूँ कर दिया। वीडियो गेम की तरह ही लगता है। कैसा लगता है? ऐसे बॉल गिरी-उठी, यूँ ऐसे पुल मारा छः रन चले गये, हम भी कर देंगे।

कभी देखा है टीवी पर मैच चल रहा होता है तो देखने वाले बता रहे होते हैं, ‘अरे यार! थोड़ा सा ऑफ़ की तरफ़ कर न वहाँ गैप है उधर फ़ील्डर्स में। पूरा खाली पड़ा है उधर, मिड-ऑफ और कवर्स के बीच में बस एक है, वहाँ से निकाल न।’

बात समझ रहे हो?

थ्रो मार रहा होता है फील्डर स्टम्पस पर, वो मिस (चूक) हो जाता है तो बोलते हैं, ‘ये तो मैं भी मार देता, रन आउट चूक गये!’ अरे भाई! वहाँ जो रहा है वो बड़े लोगों के बीच हो रहा है, तुम बहुत दूर से देख रहे हो। टीवी पर जो लोग देख रहे हैं उनमें तो इतनी भी योग्यता नहीं है कि उस मैदान पर उतर भी सकें। ठीक? पर टीवी पर देख करके हमको लगता है कि हम भी छक्का मार देते, एक यॉर्कर ही तो मारनी थी, उड़ा दे गिल्लियाँ इसकी।

उसी तरीके से अष्टावक्र-जनक संवाद हम दूर से देखते हैं तो हमें लगता है, ‘हाँ-हाँ, बहुत आसान बातें तो हो रही हैं।’ ये आसान बातें नहीं हो रही है, उन बातों के पीछे एक तरह का ज़बरदस्त तनाव है, एक भीषण साधना है।

तुम समझ ही नहीं रहे हो कि कैसे-कैसे जंजालों से होकर, आग की नदियों से होकर के ये दोनों व्यक्तित्व गुज़रे हैं। तुम तो बस उनके संवाद का क्षण देख पा रहे हो कि वो आमने-सामने हैं, उन्होंने आपस में कुछ बातें करीं, वो बातें तुम्हारे सामने अष्टावक्र गीता के रूप में आ गयीं। तुम बस ये देख पा रहे हो।

तुम देख ही नहीं पा रहे हो अष्टावक्र कि यात्रा को पूरी। तुम देख ही नहीं पा रहे हो कि जनक के भीतर कितनी रौद्र विकलता रही होगी जो अपना राज्य छोड़कर के जंगल में आकर अष्टावक्र के सामने खड़े हो गये। तुम वो देख ही नहीं पा रहे, क्यों? क्योंकि वो बातें लिखी ही नहीं हैं गीता में; लिखी नहीं हैं, पर कुछ तुम अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल करोगे या नहीं करोगे?

थोड़ा समझो तो कि ये जो बात हो रही है इसके नेपथ्य में क्या है। ये बात यूँही थोड़ी शुरू हो गयी कि एक थे अष्टावक्र, एक थे जनक, यूँही आमने-सामने पड़ गये, हो गयी बात शुरू, जैसे बर्तनों में खनक। ऐसे थोड़े ही होता है?

विम्बलडन का फ़ाइनल चल रहा हो, दो खिलाड़ी खेल रहे हैं, पर तुम ये समझ भी रहे हो कि ये दोनों खिलाड़ी फ़ाइनल तक पहुँचे कैसे हैं? तुम्हें बस क्या दिखाई दे रहा है? दो खिलाड़ी खेल रहे हैं। पहली बात तो ये समझो कि सबको विम्बलडन में खेलने को ही नहीं मिलता। फ़ाइनल की बात नहीं कर रहा हूँ मैं, मैं मेन ड्रा की बात कर रहा हूँ। उतरने को ही नहीं मिलता उनको।

किनको उतरने को मिलता है? जो दुनिया के शीर्ष बत्तीस या पचास खिलाड़ियों में होंगे उनको सिर्फ़ उतरने को मिलेगा। एक-आध दो होते हैं उनको वाइल्ड कार्ड मिल जाता है, कोई बात नहीं। दुनिया के जो ज़्यादातर पेशेवर खिलाड़ी हैं प्रोफ़ेशनल सर्किट में, एटीपी सर्किट में, उनको तो विम्बलडन में उतरने को ही नहीं मिलेगा। उसके बाद जो उतर भी गये, कोई फ़र्स्ट राउंड से आगे नहीं बढ़ रहा, कोई सेकंड राउंड से आगे नहीं बढ़ रहा, कोई थर्ड राउंड से आगे नहीं बढ़ रहा है। क्वार्टर फ़ाइनल है, सेमी फ़ाइनल है, फ़िर फ़ाइनल है।

लेकिन तुम फ़ाइनल देख रहे हो सीधे। फ़ाइनल क्या है? अष्टावक्र-जनक मैच। फ़ाइनल क्या है? अष्टावक्र और जनक आमने-सामने हैं। तुम सिर्फ़ फ़ाइनल देख रहे हो। तुम कह रहे हो, ‘हाँ-हाँ, ठीक है, ठीक है। अभी इसने ऐसा करा, अभी इसने ऐसा करा। ओके-ओके, ठीक है। नडाल की सर्विस थी, फेडरर ने रिटर्न मार दिया, ठीक है, ऐसा ही तो (रैकेट को हवा में घुमाने का इशारा करते हुए), इतना ही तो करा है।’

टीवी स्क्रीन पर इतना ही तो दिखाई देता है, इतना ही तो करा है बस। और सर्विस बस ऐसे दिखाई पड़ती है, ‘हाँ, ‘ये कर दी, ठीक है, एक-सौ-साठ की स्पीड थी बस, क्या हो गया।’ वो वहाँ तक पहुँचे कैसे हैं ये तो समझो। वो सब हम नहीं समझते। हम बस ऐसे कहते हैं, ‘हाँ, ये दो लोग बात कर रहे हैं।’ वो फ़ाइनल है विम्बलडन का। या सॉकर का वर्ल्ड कप होता है न, उसका जो फ़ाइनल होता है उसकी तैयारियाँ मालूम है कितने दिन पहले से हो रही होती हैं?

उसकी तैयारियाँ दो साल पहले से हो रही होती हैं। पहले कॉन्टिनेन्ट लेवल पर मैचेज होते हैं, फ़िर ये होता है, फ़िर वो होता है, उससे सिर्फ़ ये तय होता है कि वर्ल्ड कप में कौन-कौनसी टीमें खेलेंगी। कौन-कौन सी टीमें खेलेंगी उसके लिए पहले बहुत ज़बरदस्त संघर्ष होता है। उसके बाद वो टीमें उतरती हैं, फिर वो आपस में भिड़ती हैं, भिड़ती हैं। अब फ़िर फ़ाइनल हो रहा है, फ़ाइनल हो रहा है, ब्राज़ील और जर्मनी के बीच में।

तुम कह रहे हो, ‘हाँ, ठीक है। ब्राज़ील और जर्मनी का फ़ाइनल हो रहा है, ठीक है।’ हम बहुत हल्के में ले लेते हैं किताबों को, इसीलिए हमें समझ में नहीं आतीं। इसीलिए हम उनसे कुछ सीख नहीं पाते।

इसीलिए परम्परा रही है कि किताबों को उतना ही आदर दो जितना एक जीवित गुरु को दिया जाता है। गुरुद्वारे जाओ किसी, वहाँ देखो गुरु ग्रन्थ साहिब को कैसे आदर देते हैं जैसे जीवित ही हों गुरु अभी। हल्की चीज़ नहीं है किताब।

कुछ समझ में आ रही है बात?

प्र आचार्य जी, ऋषि अष्टावक्र जी का वक्तव्य है कि विषयों को विष की तरह छोड़ दो और क्षमा, दया और सरलता का अमृत की तरह पान करो। मेरी समझ से जितना मैं समझा उतना मैं क्षमा, दया और सरलता का भाव रख रहा हूँ। लेकिन ये विषयों को छोड़ने वाली बात मुझे स्पष्ट नहीं है कि विषयों को छोड़ूँ कैसे?

आचार्य: विषय के साथ जो उम्मीद लगी है उसको छोड़ना है। विषय कैसे छोड़ोगे, पहला विषय तो ये शरीर ही है, इसको कैसे छोड़ दोगे? अब वो हाथ में माइक है, उसके साथ उम्मीद लगा लो कि तुम सवाल किसमें पूछ रहे हो, माइक में पूछ रहे हो न? तो माइक जवाब भी दे देगा। इसको छोड़ना है।

माध्यम ही अन्त बन सकता है ऐसी उम्मीद को छोड़ना है। वो माइक क्या है? माध्यम है। हम कैसे जीते हैं? कि हम माध्यम से ही उम्मीद लगा लेते हैं कि ये ही हमें अन्त तक पहुँचा देगा या यही अन्त है — अन्त माने समझते हो न? अल्टीमेट , जो सबसे ऊँचा है, अन्तिम, उच्चतम।

तो ऐसी सी बात है कि कोई माइक लिये हुए है और कह रहा है, ‘सवाल माइक से ही तो पूछा है। सबसे पास कौन था जिससे सवाल पूछा? कौन था? माइक था। तो जवाब भी कौन दे देगा? माइक दे देगा।’ नहीं देगा न। ये छोड़ना होता है। माइक विषय है, अब उसको छोड़ नहीं सकते। क्योंकि छोड़ दिया तो क्या होगा? कुछ गड़बड़ हो जाएगी। उसका अभी कुछ व्यावहारिक उपयोग है, तो उस विषय को नहीं छोड़ना है। विषय को छोड़ोगे तो जो व्यावहारिक उपयोग है वो रुक जाएगा। माइक नहीं छोड़ना, लेकिन माइक से जो उम्मीद लगा रखी है कि माइक ही मेरे सवालों का जवाब दे देगा, वो उम्मीद छोड़ देनी है।

हम ये ही करते हैं न? कोई भी चीज़ मिल जाती है, हमें लगता है उस चीज़ से हमें कुछ मिल जाएगा। नहीं, वो चीज़ अधिक-से-अधिक एक माध्यम हो सकती है आपको वहाँ पहुँचाने का जहाँ आपको कुछ मिल जाए। चीज़ों का सही इस्तेमाल करना सीखना है, गलत इस्तेमाल छोड़ना है।

तो जब कहते हैं अष्टावक्र, “विषयों को विष के सम त्याग दो”, तो विषय को त्यागने से मतलब समझो। क्योंकि ये तो साधारण सी बात है, कैसे त्याग दें सब विषयों को? हवा भी तो विषय है न, वो तो फेफड़ों में जा ही रहा है। पानी भी तो विषय है, पी ही रहे हो, कैसे त्याग दोगे? तो निश्चित रूप से पानी को त्यागने की बात तो नहीं हो रही है, कुछ और बात है। क्या बात है? क्या त्यागना है? विषयों से जो हमने अनुचित, असम्यक उम्मीदें लगा रखी हैं, अपेक्षाएँ, उनको छोड़ना है।

हमेशा अपनेआप से पूछते रहो, ‘कोई विषय ज़िन्दगी में इतना महत्वपूर्ण तो नहीं हो रहा जितनी उसकी हैसियत ही नहीं?’ दिमाग में कोई चीज़ चक्कर काट रही है, घन-घन, चकरघिन्नी। पूछो अपनेआप से, ‘इस चीज़ की इतनी कीमत, हैसियत, इसका इतना मूल्य है कि ये मेरे दिमाग पर चढ़कर बैठ ही जाए?’ अगर है मूल्य तो चढ़ने दो।

पर लाख में से कोई एक विषय ही ऐसा होगा जिसका वास्तव में इतना मूल्य है कि तुम उसे अपने सिर पर चढ़ा लो। लाख में से कोई एक होगा ऐसा विषय। और हम व्यर्थ की चीज़ों को दिमाग पर चढ़ने देते हैं। वो दिमाग पर चढ़ गयी हैं और घम-घम, घम-घम, घम-घम, घूम रही हैं। ऐसी चीज़ों के बारे में, ऐसे विषयों के बारे में कह रहे हैं अष्टावक्र, “विषयों को विष सम त्याग दो।” तो त्यागो, छोड़ो।

ये तुम खोपड़े में घुमा रहे हो, इससे तुम्हें क्या मिल रहा है? पर तुम घुमा रहे हो तो तुम्हें तो लग रहा है कुछ मिल रहा है, नहीं तो रखा क्यों होता सिर पर। मतलब तुम्हारी जो उम्मीद है उस विषय से, वो उम्मीद नासमझी की है। तुमने जाँचा नहीं है, परखा नहीं है। तुमने यूँही भ्रम में, बेहोशी में किसी चीज़ को जीवन में, मन में बहुत महत्वपूर्ण बना लिया है। वो उतने महत्व के लायक नहीं हैं, अधिकारी नहीं हैं। योग्यता नहीं है उसकी कि तुम्हारे जीवन में वो इतना अधिकार, इतनी जगह रखे, हटाओ उसको। और जब उसको हटाओगे तभी तो जगह बनेगी न कि सही चीज़ दिमाग में आ सके? आगे क्या बोलते हैं? आर्जव, क्षमा, तोष, सत्य, यही हैं न? इनका कर पान तू।

प्र: हाँ।

आचार्य: इनका पान करने को क्यों बोलते हैं? बात समझो। जो कुछ भी तुम्हारे दिमाग में घूम रहा है न, उसका सम्बन्ध आमतौर पर इनके विपरीत से होता है। तुम्हें किसी से दुश्मनी निकालनी है, वो चीज़ दिमाग में घूमती रहेगी। ‘इसने मेरा अपमान किया, पलटवार कैसे करूँ? बदला कैसे लूँ?’

तो जैसे ही क्षमा तुमने पकड़ी, वैसे ही दिमाग में जो घूम रहा था वो हट जाएगा। दिमाग में घूमती चीज़ों को हटाने का तरीका है ये, आर्जव माने सरलता। अब तुम जीवन में कुछ जटिलता चाहते हो कि ऐसे टेढ़ापन कर दूँ, वैसे कर दूँ, ये कर दूँ, वो कर दूँ। और टेढ़ी-मेढ़ी चीज़ें ही दिमाग में घूमती हैं। जहाँ तुमने आर्जव को पकड़ा, सरलता को पकड़ा, सीधाई को पकड़ा, वैसे ही वो सब जो तुमने टेढ़ा-मेढ़ा दिमाग में भरा हुआ था उसको विदा होना पड़ेगा।

‘सन्तोष’, ‘तोष’ कहते हैं न, सन्तोष। अब दिमाग में उम्मीदें घूम रहीं हैं, महत्वाकांक्षाएँ घूम रही हैं, आगे के लिए इच्छाएँ घूम रही हैं, ‘ये इकट्ठा कर लूँ, वो पा लूँ।’ जैसे ही तुमने तोष को पकड़ा वैसे ही उन इच्छाओं को अपनेआप विदा होना पड़ेगा। तो वो दिमाग में बेकार का मसाला घूमता रहता है, उस मसाले को साफ़ करने के लिए फिर आगे अष्टावक्र ये तीन-चार चीज़ें और बताते हैं।

उसको बोलते हैं, ‘वो विष है’, इसको बोलते हैं, ‘सुधा है।’ सुधा माने अमृत। किस अर्थ में अमृत है? कि ये तुमको मृत्यु से छुड़ा देगी। कौनसी मृत्यु? आखिर में जो मरोगे, अस्सी साल की उम्र में, उस मृत्यु से छुड़ा देगी? अगर तुम क्षमाशील हो तो मरोगे नहीं? शरीर तो मरेगा। किस मृत्यु से तुमको मुक्ति मिल जाएगी?

वो जो रोज़ मर रहे हो, प्रतिपल मर रहे हो, लगातार, एक-एक पल, जो मौत झेलनी पड़ रही है, उससे मुक्ति मिल जाएगी अगर जीवन में सन्तोष, क्षमा, आर्जव, ये सब आ गये तो, सत्य आ गया तो।

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