Lokdesh
29 Oct '22

लिखनी है नई कहानी?

Acharya Prashant

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लिखनी है नई कहानी?
हर युवा के सामने एक चुनाव होता है कि वो आम साँचे में ढली जिंदगी जिए या अपनी नई कहानी लिखे। आँखें खोलकर देखो तो आम जिंदगी में कर्ज, कलह, झूठी खुशी और व्यर्थता के सिवा कुछ नहीं। बदलाव मुमकिन है, पर उसके लिए जागना पड़ेगा, विरोध झेलना पड़ेगा। जिम्मेदारी खुद की है, कहानी भी खुद को लिखनी होगी। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Lokdesh on 29 Oct '22

हर युवक या युवती के जीवन में एक पड़ाव आता ह है जब उसे ये निर्णय लेना होता है कि वे आम साधारण जिंदगी जीना चाहता है या अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। ऐसे में डर, लालच, संशय अक्सर हमारे मन को घेर लेते हैं और सही निर्णय ले पाना असंभव-सा लगता है। ऐसी स्थिति में दो ही चीज काम आती हैं: पहला, आँख खोलकर परिणाम देखते चलो और दूसरा, अपने आसपास के लोगों को देखते चलो।

मेरा एक साथी था, उसके माँ-बाप रात-दिन उसको बोलते रहते थे कि शादी कर ले। उसने एक दिन उनसे कहा, 'तुम दोनों को देखता हूँ, उसके बाद भी तुम्हें लगता है कि मैं शादी कर सकता हूँ?' उसने ये बात मजाक में नहीं कही थी। उसने कहा, 'परिणाम सामने है! अगर शादी का अर्थ ये है जो तुम दोनों मुझे रात-दिन दिखाते हो, और जैसा जीवन तुम दोनों ने जिया है, भले ही मेरे माँ-बाप हो, पर मुझे दिख तो रहा है कि कैसे हो, तो मुझे नहीं करनी शादी।

कहाँ है प्रेम ? निभा रहे हो, वो अलग बात है। लेकिन निभाना प्रेम नहीं है, कर्तव्य पूरा करना प्रेम नहीं है। अगर यह शादी है तो मुझे नहीं करनी शादी।' देखो चारों तरफ कि दुनिया कैसी है। और यही तुम्हारा भी भविष्य है, अगर बचे रहे। यह जो सड़क पर आदमी चलता है जिसको तुम 'आम-आदमी' बोलते हो, उसकी शक्ल ध्यान से देखो। वो तुम हो। और अगर वैसा ही हो जाना है, तो फिर कोई बात नहीं। फिर नई कहानी लिखने जैसा कोई सवाल ही नहीं उठता।

आज आधुनिक जगत में जो एक-के-बगल-एक परिवार बैठे हुए हैं, उसमें माता हैं, पिता हैं, उनके बच्चे हैं, दिन-रात की कलह हैं, संघर्ष हैं, जाओ और उनकी ज़िन्दगी को ध्यान से देखो। वो तुम्हारी ज़िन्दगी है। और अगर वही चाहिए, अगर वही स्वीकार्य है, तो बढ़ो आगे, किसने रोका है? क्योंकि जा तो उसी दिशा में रहे हो, जीवन उसी दिशा में ही बढ़ रहा है और बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। बहुत समय नहीं है अब तुम्हारे पास। तुम्हारी भी कहानी अब वही सब मोड़ लेने वाली है।

बिलकुल तयशुदा कहानी है, उसमें कोई बड़े उतार-चढ़ाव नहीं हैं। उस कहानी में क्या-क्या आता है बता देता हूँ। उस कहानी में आता है कुछ सालों की थोड़ी-बहुत शिक्षा, सात फेरे, मैटरनिटी वॉर्ड, दूध की बोतलें, घर पर बैठना, पैसे को लेकर चिक-चिक, दुनिया की देखा-देखी घर को फर्नीचर से भरना, कर्ज लेकर मकान खरीदना, रोज आईने में देखना कि उम्र बढ़ रही है।

एक दिन पाना कि चेहरे पर झुर्रियाँ आ गई हैं, बीतते हुए जीवन की व्यर्थता देखना, और अपनेआप को भुलावा देना, और जब सच साफ-साफ दिखाई देने लगे तो टेलीविजन में मुँह डाल देना कि बहाना मिल जाए समय काटने का; और जब मन बिलकुल उदास हो तो किसी शॉपिंग मॉल में जाकर बैठ जाना ताकि लगे कि जीवन में कुछ है, ताकि लगे कि जो कमाई कर रहे हैं वो व्यर्थ नहीं है, 'हम इससे कमीज खरीद सकते हैं! प्रेशर कुकर खरीद सकते हैं! नए मॉडल का फ्रिज खरीद सकते हैं! नई कार आ सकती है!' ताकि जीवन को बहाने मिलते रहें आगे बढ़ने के।

तीज-त्यौहारों पर रिश्तेदारों के सामने झूठा चेहरा बनाकर के बधाई दे देना और पीठ-पीछे हिसाब लगाना कि कितना मिला है और हमने कितना दिया है, दूसरों की जिन्दगी से तुलना करना। पति को देखकर यही खयाल उठना कि, 'कहाँ फँस गई हूँ!' लेकिन फिर भी अपने आप को ऐसा बंधन में पाना कि, भाग भी नहीं सकती क्योंकि ये दो छोटे-छोटे बच्चे बैठे हैं, जाऊँ तो जाऊँ कहाँ?'

फिर एक दिन पाना कि मैं प्रौढ़ हो गई हूँ, फिर पाना कि शरीर में बीमारियाँ हो गई हैं, कैल्शियम की कमी हो रही है। फिर जाकर चेक करवा रहे हो कि कहीं कैंसर तो नहीं है, क्योंकि रहना तो इसी शहर में है न। तुम्हारी कहानी में शामिल है इसी शहर में पड़े रहना जहाँ की हवा गन्दी, जहाँ का पानी गन्दा, जहाँ का खाना गन्दा, जहाँ की मिट्टी गन्दी। और यही तुम्हारा सपना है कि किसी बड़े शहर में रहें और बड़े शहर का मतलब भी नहीं समझते तुम। बड़े शहर का अर्थ है कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियाँ। पर तुम कैंसर के लिए तैयार रहोगे क्योंकि तुमने मेडिकल इन्शुरेंस कराया होगा।

तुम इतने समझदार हो न! तुम मेडिकल इन्शुरेंस कराते ही इसलिए हो क्योंकि कैंसर होना पक्का है। बीच-बीच में पैसे बचाकर छुट्टियाँ मनाने चले जाना और बड़ा खुश महसूस करना कि दार्जिलिंग घूम आए, ऊटी घूम आए, और थोड़ा पैसा ज्यादा हो तो मॉरिशस घूम आए। और अपनी सारी फोटो को फेसबुक और ट्विटर पर लगाना ताकि दुनिया को यह भ्रम हो जाए कि तुम खुश हो। जानते सिर्फ तुम हो कि तुम क्या हो। पति के साथ, बच्चे के साथ अपनी फोटो लगा देना ताकि दुनिया को ये लगे कि तुम बहुत खुश हो।

तीस दिन काम करोगे, किसलिए? कि एक दिन तनख्वाह मिल जाए। तनख्वाह मिलेगी एक दिन और तीस दिन क्या करोगे? इंतजार। खड़े रहोगे अपने बॉस के सामने जैसे वो अपने बॉस के सामने खड़ा रहता है, और बॉस अपने बॉस के सामने और बॉस का बॉस अपने बॉस के सामने। इसी को लोग कहते हैं, 'हमारा सुनहरा भविष्य !'

कल्पना से कहानी नहीं बता रहा हूँ। लोग आते हैं मेरे पास और यही पूरी दुनिया की कहानी है, और अगर यही तुम्हें अपनी कहानी बनानी है तो देख लो।

दुखद बात ये है कि हम सब इसी ओर बढ़ रहे हैं, तेजी से बढ़ रहे हैं, जैसे पहाड़ी ढलान है और गाड़ी न्यूट्रल में है, और ब्रेक फेल हैं। पूरी तैयारी कर ली गई है तुम्हें इसमें धकेलने की।

लेकिन इसी बीच मैं तुम्हें एक चुनौती दे रहा हूँ, क्या जिन्दगी इस सब के अलावा भी कुछ हो सकती है? और इसके साथ आश्वासन भी दे रहा हूँ, 'हाँ! हो सकती है अगर तुम्हें अपने आप से प्यार है तो।'

जिंदगी निश्चित रूप से इसके अलावा भी हो सकती है, पर जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम्हें जगना पड़ेगा, तुम्हें चेतना पड़ेगा, तुम्हें इस कहानी को बदलना पड़ेगा। और उसमें डर है, और उसमें तुम्हें विरोध बहुत मिलेगा, उसमें बहुत लोग तुम्हारे सामने खड़े हो जाएँगे कि, 'नहीं तुम चुपचाप वो करो जो हम तुमसे कह रहे हैं!', 'बड़ी होशियार हो गई है! बहुत बोलना आ गया है!'

इन विरोधों को झेलने को तैयार हो, तो कुछ कोई दूसरी संभावना है, नहीं तो बस यही है। सवाल जिंदगी का है, उससे जरा भी छोटा नहीं। सवाल जीवन-मरण का ही है। इससे हटकर जो कहानी होगी, उसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। वो नई कहानी होगी, जो तुम लिखोगे। इसलिए वो बहुत प्यारी होगी क्योंकि बिलकुल ताजी, एकदम नई होगी। अब चुनौती तुम्हारे सामने हैं, तुम देख लो कि तुम्हें नई कहानी लिखनी है या उसी पुरानी स्क्रिप्ट पर चलते रहना है।

Originally published in Lokdesh on 29 Oct '22

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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