हर युवा के सामने एक चुनाव होता है कि वो आम साँचे में ढली जिंदगी जिए या अपनी नई कहानी लिखे। आँखें खोलकर देखो तो आम जिंदगी में कर्ज, कलह, झूठी खुशी और व्यर्थता के सिवा कुछ नहीं। बदलाव मुमकिन है, पर उसके लिए जागना पड़ेगा, विरोध झेलना पड़ेगा। जिम्मेदारी खुद की है, कहानी भी खुद को लिखनी होगी।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Lokdesh on 29 Oct '22
हर युवक या युवती के जीवन में एक पड़ाव आता ह है जब उसे ये निर्णय लेना होता है कि वे आम साधारण जिंदगी जीना चाहता है या अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। ऐसे में डर, लालच, संशय अक्सर हमारे मन को घेर लेते हैं और सही निर्णय ले पाना असंभव-सा लगता है। ऐसी स्थिति में दो ही चीज काम आती हैं: पहला, आँख खोलकर परिणाम देखते चलो और दूसरा, अपने आसपास के लोगों को देखते चलो।
मेरा एक साथी था, उसके माँ-बाप रात-दिन उसको बोलते रहते थे कि शादी कर ले। उसने एक दिन उनसे कहा, 'तुम दोनों को देखता हूँ, उसके बाद भी तुम्हें लगता है कि मैं शादी कर सकता हूँ?' उसने ये बात मजाक में नहीं कही थी। उसने कहा, 'परिणाम सामने है! अगर शादी का अर्थ ये है जो तुम दोनों मुझे रात-दिन दिखाते हो, और जैसा जीवन तुम दोनों ने जिया है, भले ही मेरे माँ-बाप हो, पर मुझे दिख तो रहा है कि कैसे हो, तो मुझे नहीं करनी शादी।
कहाँ है प्रेम ? निभा रहे हो, वो अलग बात है। लेकिन निभाना प्रेम नहीं है, कर्तव्य पूरा करना प्रेम नहीं है। अगर यह शादी है तो मुझे नहीं करनी शादी।' देखो चारों तरफ कि दुनिया कैसी है। और यही तुम्हारा भी भविष्य है, अगर बचे रहे। यह जो सड़क पर आदमी चलता है जिसको तुम 'आम-आदमी' बोलते हो, उसकी शक्ल ध्यान से देखो। वो तुम हो। और अगर वैसा ही हो जाना है, तो फिर कोई बात नहीं। फिर नई कहानी लिखने जैसा कोई सवाल ही नहीं उठता।




