आम आदमी के लिए नहीं है वेदान्त? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। कोटि-कोटि नमन। मेरा प्रश्न ‘घर-घर उपनिषद्’ से सम्बन्धित है। ये जो अभियान है, यह मुझे बहुत उत्साह दे रहा है। और मैंने पाया है कि उपनिषदों से आम लोगों का परिचय नहीं है। मेरा ख़ुद परिचय इक्कीस-बाइस की उम्र में हुआ था। और जब कि मुझे बताया गया था कि मैं एक ‘हिंदू’ हूँ।
उपनिषद् पढ़ते हुए मुझे आपके बारे में पता चला और आपको देखने के बाद मैं कृतार्थ हुआ। मुझे उपनिषदों का असली अर्थ समझ आने लग गया और धर्म का भी थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होने लगा।
उपनिषदों में प्रेम के कारण मैंने फिर संस्कृत भाषा सीखना शुरू किया और मैं पिछले चार महीने से संस्कृत में एमए (स्नातकोत्तर) कर रहा हूँ और पार्ट टाइम जॉब कर रहा हूँ। और इसी के चलते मेरी भेंट शास्त्रों के ज्ञाता शास्त्रियों से हुई, जो आचार्य मुझे वेद-वेदांग इत्यादि पढ़ाते हैं। और मैंने पाया कि उनमें से अधिकतरों का ये मानना है कि जो उपनिषद् हैं, वो धर्म का मूल नहीं हैं। क्योंकि वो ये कहते हैं कि उपनिषद् सिर्फ़ मोक्ष का साधन हैं, और आम गृहस्थ के लिए इसका उपयोग नहीं है। और वे बोलते हैं कि धर्म का मूल जो है, वो तो धर्म शास्त्र, पुराण, इतिहास, वेदों में वर्णित ‘कर्मकांड’ है।
इसीलिए मेरा प्रश्न है कि इस भ्रांति को कैसे दूर किया जाए कि 'उपनिषद् धर्म का मूल नहीं हैं’? जिससे घर-घर उपनिषद् पहुँचे और केवल पुराण इत्यादि न पढ़ते रह जाएँ।
आचार्य प्रशांत: ये भ्रांतियाँ नहीं हैं, ये हठ है, ये ढिठाई है। ये ज़बरदस्त अहंकार है जो कहता है कि 'हम जैसे हैं, हम तो वैसे ही रहेंगे। हम जैसे घर चलाते हैं, घर हमें वैसे ही चलाना है। जैसी गृहस्थी है वैसी ही रहे, जैसी दुकान चल रही है वैसे ही रहे, समाज जैसे चल रहा है वैसा ही रहे; हम तो ऐसे ही रहेंगे।'



