
मन सही लक्ष्य से भटक क्यों जाता है? हम सभी लोग जन्म से ही छुपे हुए दर्द में जीते हैं। अगर हमें अपने दर्द का एक प्रतिशत भी ज्ञान हो जाए, तो फूटफूट कर रो पड़ेंगे। ये सब जो हंसते हुए, मुस्कुराते हुए लोग तुम्हें चारों ओर दिख रहे हैं, ये सब मुस्कुरा सिर्फ इसलिए रहे हैं क्योंकि इन्हें अपने दर्द का कुछ पता नहीं है।
तकलीफ है, और तकलीफ के साथ संवेदनशून्यता भी-इंसेंसिटिविटी, नंबनेस। जैसे यह पूरी दुनिया एनेस्थेसिया पर चल रही हो, ताकि दर्द का पता न चले। इसीलिए तो लोग इतना नशे करते हैं, ज्ञान का, संबंधों का, शराब का, दौलत का। ये सब एनेस्थेसिया है, ताकि तुम्हें तुम्हारे दर्द का पता न चले। हम अपने ही प्रति बड़े कठोर और निष्ठुर होते हैं। अपनी हालत से वाकिफ हो जाओगे तो बहुत मुश्किल होगा इधर-उधर भटकना।
फिर मन को केंद्रित करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वो समस्या सिर्फ इसलिए है क्योंकि तुम्हें अपनी ही हालत का ठीक-ठीक संज्ञान नहीं है। अपनी हालत को गौर से देखो तो, चित्त भटकना बंद हो जाएगा। फिर एक ही चीत्कार उठेगा 'आज़ादी, आज़ादी। और कुछ नहीं चाहिए, बस आज़ादी। न बर्गर, न जूता, न लड़की, न लड़का, बस आज़ादी।' खुद से इतना प्रेम होना चाहिए कि एक पल को भी भूले नहीं कि तुम्हारा लक्ष्य क्या है, कुछ और याद ही न आए।
अपनी पीड़ा के प्रति बड़ी संवेदनशीलता होनी चाहिए। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम तड़प रहे हो; बड़े वियोग में हो। अब तुम कुछ और कैसे याद रख सकते हो? छोटी-मोटी क्षुद्र बातों में मन कैसे लगा सकते हो? तुम्हारे प्राण अटके हुए हैं गले में, न जी पा रहे हो, न मर पा रहे हो, तो अब तो तुम बस एक ही आशा कर सकते हो न-राहत की। तुमने पांच-दस आशाएं कर कैसे लीं? निश्चय ही अपने प्रति बड़े निष्ठुर हो, अपनी स्थिति के प्रति तुम में कोई सद्भावना ही नहीं है।
हम जीवन के तथ्यों से एकदम परिचित नहीं होते। इसलिए अपनी हालत का भी कुछ पता नहीं रहता। हम बड़ी अंधेरी दुनिया में जीते हैं। और जहां अंधेरा होता है, वहां बस सपने होते हैं। प्रकाश बुझा नहीं कि सपनों का उदय हो जाता है। जितने अंधेरे में तुम जिओगे, उतने तुम्हारे पास सपने होंगे। जीवन में थोड़ा प्रकाश लाओ और जिंदगी की हकीकत को देखो, फिर मन कभी नहीं भटकेगा। कहना न होगा कि सपनीली जिंदगी से बाहर निकल सकोगे।