प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो। जहाँ ध्येय है, वहाँ ध्यान है। क्या आपके पास कोई ध्येय नहीं है कभी भी? जीवन में कोई पल ऐसा आता है क्या जब बिलकुल ही लक्ष्य मुक्त, ध्येय मुक्त हो पाते हो? नहीं न। तो ध्यानी तो सब हो, बस ध्यान किसी छोटी सी चीज़ का कर रहे हो।
और सूत्र यह है कि जिसका तुम ध्यान करते हो, वैसे तुम हो जाते हो।
जिसका ध्यान करोगे, वैसे हो जाओगे। तो तीन तरह के ध्यानी होते हैं: एक वो जो निकृष्ट विषयों का ध्यान करते हैं, एक वो जो उत्कृष्ट विषयों का ध्यान करते हैं और तीसरे ध्यानी वो होते हैं जो निर्विशेष का ध्यान करते हैं। जो विषय ही नहीं है उसका ध्यान करते हैं, वह ब्रह्मलीन हो जाते हैं।
समझ रहे हो बात को?
तुम किसी मुद्रा में, किसी आसन में, किसी जगह बैठ जाओ, पर अगर तुम ध्यान उसी वस्तु का, व्यक्ति का, विचार का कर रहे हो जो तुम्हारे मन को सुहाता है, तो तुम अपने मन से आगे नहीं निकल पाओगे, बिलकुल आगे नहीं निकल पाओगे। वहीं पर जाकर के अटक जाओगे बार-बार।




