प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं से ही उठे हैं क्योंकि हमने कुछ माना है, उसी से हममें विकार उठे हैं। और हम ये भी कह सकते हैं कि जो डर है या और भी तरह की चीज़ें हैं, वो सब भी इसी से सम्बन्धित हैं क्योंकि हमने कुछ माना वो पूरा नहीं हुआ। तो वो विकार उठा उससे।
तो ये बात समझ आती है कि अगर मान्यताएँ हमारी बदल जाएँ तो एक तरह से हमारा जीवन भी बदल जाएगा। एक तरह से हम देख सकते हैं लेकिन मेरा प्रश्न यहाँ पर ये है कि मान्यताओं का बदल जाना सही है या मान्यताओं का ख़त्म हो जाना, उनको छोड़ देना सही है?
आचार्य प्रशांत: एक अन्त है, एक प्रक्रिया है। मान्यता का ख़त्म होना माने जो मानने वाला है वो ख़त्म हो जाए। वो तब ख़त्म होता है जब पहले उसने जो मान रखा है उसे उसकी निरर्थकता या झूठ दिखाया जाए। ठीक है?
तो मान्यता ख़त्म होती है वर्तमान मान्यता को एक-एक करके तोड़ने से, और वो एक प्रक्रिया होती है। आप अभी कोई चीज़ मानते हो, उसको तोड़ने के लिए आपको कोई और चीज़ बतायी जाएगी। पुरानी टूट जाती है, एक नयी आ जाती है। तो जो मानने वाला है उसको ‘मानी’ बोल लो। जो मान रखने वाला है वो बचा रह जाता है। तो एक-एक करके मान्यताएँ जब टूटती जाती हैं, तब अन्ततः मान्यता से फिर पूरी मुक्ति मिलती है।
तो मान्यताओं से मुक्ति मिल सके, इसके लिए भी ज़रूरी है कि मान्यताएँ बदलती रहें, बेहतर होती रहें। और इससे अच्छा तो कुछ हो ही नहीं सकता कि आप मान्यता पर आक्रमण करने की जगह जो मानी है, सीधे उसी का झूठ देख लो। फिर तो एक पल में काम तमाम हो जाएगा। पर उतना ज़्यादातर लोगों के लिए सम्भव नहीं होता। ज़्यादातर लोगों से बोलो, ‘तुम झूठे हो’, तो बिदक जाएँगे।



