
सच की राह पकड़ते ही अक्सर अपने ही लोग बदल जाते हैं, और हम मान लेते हैं कि शायद हम ठीक से समझा नहीं पा रहे। पर सामने वाला समझ तो रहा होता है, उसे बस सौदा नहीं जँचता। अहंकार लेन-देन से चलता है, इसलिए अकेले तर्क उसे नहीं हिलाते। हमारा अपना अहंकार भी यही करता है: थोड़े-से स्वार्थ के लिए हम झूठे रिश्तों में मिठास का स्वांग करते हैं, मजबूरियाँ गिनाते हैं और पीछे हट जाते हैं। जिसे हम मजबूरी कहते हैं, क्या वह सच में मजबूरी है?

अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।






वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।















कुछ भी के लिए तो हम प्रस्तुत ही नहीं हैं। कुछ भी के लिए तो बड़ी बेधड़क निर्भीकता चाहिए। कुछ भी तो हमसे आगे की बात हो जाती है। हमारे साथ तो वही दो-चार छोटी-मोटी चीज़ें होती है जो रोज़ होती हैं। सुख का पता चलना माने अहंकार का पता चलना, दुख का पता चलना माने अहंकार का पता चलना। मन परिचित ही सबकुछ पकड़े रहता है।


वास्तव में पछतावा और प्रायश्चित दो अलग-अलग शब्द हैं, इनको एक समझ भी मत लेना। प्रायश्चित ज़रा साफ़-सुथरी और प्यारी बात है। पछतावे का मतलब होता है बस बाद में छाती पीटना और जब कोई न दिख रहा हो, दोबारा वही करने में मसगुल हो जाना। ये दिखाये भी जाओ कि हमें तो बड़ा दुख है कि हम गंदे हैं। इसे कहते हैं पछतावा — वो रहे भी आओ, और प्रकट करो जो यूँ रहने में बड़ा अफ़सोस है। प्रायश्चित का मतलब होता है अफ़सोस के ही पार चले जाना, नये हो जाना।





पर ज़रा विनम्रता के साथ आदमी को सदा अपनेआप को ये चेताते रहना होता है कि ज़रूर कई गड्ढे हैं जो हैं तो, पर मुझे नहीं दिख रहे। मेरी दृष्टि सीमित है, मुझे नहीं दिख रहे। और वो गड्ढे कहीं भी हो सकते हैं।


आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’




आचार्य प्रशांत: ये इन सबको रीयल! (वास्तविक) क्योंकि अनरीयल (अवास्तविक) कैसे बोलोगे! भई, तुम जिसे अनरीयल बोलते हो, किस आधार पर बोलते हो? कुछ भी तुम


देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां हसड्भादजस्त्र परिवर्तते धियः। वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्धवेत्तावदसौ भवोद्धव: ।।





प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! आचार्य जी, एक सिचुएशन है। जैसे बाहर कुछ हो रहा है दुख-सुख और वो मेरे पर घट रहा है और पीछे से कोई देख रहा है।और फिर उसको मैं जानना चाह रही हूँ कि वो कौन है। फिर जैसे ही मैं कोई भी चीज़ देख रही



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। बचपन से यही शिक्षा दी जाती है कि पढ़ाई कर लो, अच्छे नंबर लाओगे तो अच्छे बच्चे कहलाओगे या फिर आगे चलकर अच्छी नौकरी मिलेगी तो समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी। तो इन सब में जो एक निष्कामता की जो चीज़ है, वो कहीं-न-कहीं कम ही रहती
युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।
जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।
कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।
यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।
गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।
अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।
आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…
आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी।
अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।
अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन।
यूँ ही कुछ हो नहीं जाता, सब कुछ चुनाव है। बहुत समय तक तुम एक ही चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी भी तुमसे चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा। कोई बाहरी ताक़त आकर तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। तुम्हारा जो कुछ भी है, वो बस तुमसे है।
यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"
तुम्हारे पास सम्यक युद्ध नहीं है लड़ने को तो फिर तुम अपनी परेशानियों से लड़ोगे, क्योंकि युद्धरत तो सबको रहना है। कोई है जो असली लड़ाई लड़ रहा होता है, और जो असली लड़ाई में नही उतरेगा वो फिर नकली लड़ाई लड़ता है। नकली लड़ाई यही होती है, अरे मैं परेशान हूँ! अरे मुझे यह दुःख है!
जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आएँगे, लोकधर्म मुँह की खाएगा, क्योंकि लोकधर्म किससे बना है? कल्पना और भावना से। और कल्पना और भावना, तथ्य से नीचे की बातें होती हैं, विज्ञान तथ्यों पर चलता है। लेकिन विज्ञान से भी ऊपर क्या है? अध्यात्म। क्योंकि विज्ञान, सब कुछ हटा देने के बाद भी कल्पना, भावना, इत्यादि कचरा हटा देने के बाद भी, एक द्वैत में तो विश्वास करता ही है न?
शारीरिक रूप से तो परनिर्भरता रहेगी, लेकिन जब परनिर्भरता मानसिक बन जाती है, तो वह बहुत ख़तरनाक हो जाती है। अगर आप देह हैं, तो परनिर्भरता ठीक है, लेकिन आप देह भर नहीं हैं। जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है — यह बहुत बड़ी ग़ुलामी है। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, तब आपका होना सार्थक हो जाता है, और आप सही तरीक़े से जीने के लिए मुक्त हो जाते हो।
ये इलेक्ट्रॉन पोजिट्रॉन करके आपका दुख दूर होता हो तो कहिए मैं कुछ बोलूँ उसपे फिर। इन चीज़ों से बहुत अच्छा, आज मैंने ये सब कर दिया थोड़ा क़्वांटम थ्योरी वगैरह। इसलिए आप सक्रिय हो गए। मैं इन सबसे बहुत बचता हूँ जहाँ लगता भी है कि यहाँ पर विज्ञान का कोई उदाहरण एकदम समीचीन होगा तो भी उसको दबा देता हूँ थोड़ा। क्योंकि अहम को अपने अलावा किसी और तरफ देखने का बहाना चाहिए। मैं जैसे ही विज्ञान की बात करना शुरू करूँगा तो आप आत्म अवलोकन करने की जगह विज्ञान अवलोकन शुरू कर देंगे।
यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।
मन रहेगा तो तन को खाने दौड़ेगा। वो तन को खाएगा और तन के माध्यम से खाएगा। मन जब तक अपने आप को तन से भिन्न समझेगा वो तन का एक ही उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करेगा — तन को खा लूँ और तन के माध्यम से दूसरे तनों को खा लूँ। अहम् अपने आप को शरीर से भिन्न इसीलिए मानने के ज़िद करता है; कहता है, ‘मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर का स्वामी। शरीर का भोक्ता हूँ। अब मैं शरीर को भोगूँगा और शरीर के माध्यम से और कुछ भोगूँगा।’ जब दिख गया कि शरीर-ही-शरीर हूँ, तो अब क्या भोगूँ! मौज करो। शरीर सरिता है बह रही है, हम भी अपना बस ऐसे ही तिनके की नाई फ़्लोट कर रहे हैं।
मन नहीं चंचल होता, अहम् चंचल है और चंचल होना उसकी मजबूरी है, उसे चंचल होना पड़ेगा। रुककर, टिककर, थमकर तो वो बैठ सकता है न जिसको घर मिल गया हो, जिसको आश्वस्ति मिल गई हो। अहम् को न कोई घर है, न आश्वस्ति है। उसका तो यही है कि कहीं ज़रा सा कुछ खटका हुआ, उसकी नींद खुल जाती है, ‘मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई? मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई!’
अहंकार है, कुछ नहीं भी करो तो भी तुम लगे ही हुए हो, रत हो, उद्यमी हो। और नहीं है अगर अहंकार तो जो करना है करो, तुमने तब भी कुछ नहीं किया।अहंकार रहित कर्तृत्व को ही कहते हैं अकर्तृत्व। अकर्ता और कोई नहीं है; अकर्ता और कर्ता में यही अंतर है कि करते दोनों हैं, एक इसलिए करता है कि कुछ मिल जाएगा और एक बस यूँही करता है।
जब हमारा दमन होता है तब जिस ऊर्जा का दमन हो रहा होता है, वह ऊर्जा हममें सड़ने लगती है। वही ऊर्जा जो एक फूल बन सकती थी, काँटा बन जाती है। जिस ऊर्जा से विकास हो सकता था, वह थम कर बदबू देना शुरू कर देती हैl ऊर्जा को…
हमारी समस्या ये है कि हमें समस्याएँ चाहिए। हम ऐसे अभ्यस्त हो गये हैं। कोई समस्या न हो तो हम खड़ी करेंगे। तनाव रहता है तो कम-से कम जीवन को उद्देश्य मिला रहता है। सुबह उठे हैं, उद्देश्य है, आज किसी का सिर फोड़ना है या उद्देश्य है कि आज अपनी तशरीफ़ बचानी है। प्रेम हम जानते नहीं। प्रेम भी एक बड़ा उद्देश्य होता है पर वो तो है नहीं हमारे पास। तो हमारे पास तो जीने का एक ही उद्देश्य होता है, या तो बचानी है या बजानी है। दोनों ही काम हिंसा के हैं — बचाना और बजाना।
‘मैं’ अपने बचे रहने के लिए जो ग़लत चीज़ है उसको अपने जीवन से कभी जाने देगा नहीं क्योंकि ग़लत विकल्प भी अगर चला गया तो ‘मैं’ मिट जाएगा। ‘मैं’ अपने बचे रहने के लिए सही विकल्प को भी अपने जीवन से कभी जाने देगा नहीं क्योंकि सही भी अगर चला गया तो ‘मैं’ मिट जाएगा। एक द्वंद चाहिए होता है 'मैं' को जीवित रहने के लिए, तभी तो मज़ा आता है। कभी धूप, कभी छाँव; दोनों को बनाए रखता है।
अमर होने का अर्थ यह है कि मैंने एक ही जीवन में हज़ार जीवन जी लिए। अमर होने का अर्थ है प्रतिपल मरना। हर पल मरता हूँ; हर पल नया जन्म होता है। एक ज़िन्दगी में कई ज़िंदगियाँ जी ली हैं क्योंकि मेरे एक नहीं, हज़ार चेहरे हैं।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अभी बैंक में जॉब कर रहा हूंँ, लगभग सात-आठ साल हो गये हैं। शुरुआत तो मैंने आजीविका के लिए करी थी; जैसे परिवार जो सोचता है कि आप पढ़ो और काम करो, उस हिसाब से।
लेकिन अभी, मतलब पिछले कुछ तीन से चार सालों में…
मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित…
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…
आचार्य प्रशांत: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य प्रशांत: क्या करना है, क्या नहीं करना है। क्या होना है, क्या नहीं होना है। दिशा कौनसी लेनी है, नहीं लेनी है इसका निर्णय अहंकार ही करता है। और आप ये नहीं कह सकते कि अहंकार ने अपने लिए गलत निर्णय करा। कोई और देखें, तो कह देगा कि…
प्रश्नकर्ता: जो इमैजिनेशन (कल्पना) है।
आचार्य प्रशांत: इमैजिनेशन का पैमाना क्या होता है? आप कह रहे हैं कि जो काल्पनिक…
“ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्। विज्ञानमकामुरुधेव विभाति माया स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प:।।“
“यह जगत् मन का विलास है, दीखने पर भी नष्टप्राय है, अलातचक्र (लुकारियों की बनेठी)– के समान अत्यन्त चंचल है और भ्रम मात्र है— ऐसा समझे। ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित एक ज्ञानस्वरूप आत्मा…
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतना आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में…
गुणानुरक्त्तं व्यसनाय जन्तो: क्षेमाय नैर्गुण्य मथो मन: स्यात्। यथा प्रदीपो घृत्वर्तिमश्रन् शिखा: सधूमा भजती ह्यन्यदा स्वम्।। पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मन: श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम्।।
विषयासक्त मन जीव को संसार-संकट में डाल देता है विषयहीन होने पर वही उसे शान्ति में मोक्ष पद प्राप्त करा देता है। जिस प्रकार घी से भीगी हुई…
श्री भगवान् उवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:। सत्त्वेननान्यतमौ हन्यात् सत्त्वेन चैव हि।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम — यह तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्त्व के द्वारा रज और तम — इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर…
प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गये। हो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टीशर्ट पहने हो, थोड़ी देर में उतार दोगे, तो हो गया परिवर्तन। परिवर्तन क्या है? दायें को अटके…
आचार्य प्रशांत: हम जैसे जीते हैं, हमारे लिए दो हैं, एक संसार और एक हम। संसार और एक हम, कुछ हम संसार की बात करते हैं, कुछ हम अपनी बात करते हैं। जब हम अपनी बात करते हैं तो भी हम अपने आप को देखते उन्हीं उपकरणों से और उसी…
तत्व क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते। अहं कर्ता च भोक्ता च जीवनमुक्त: स उच्यते।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच तत्वों से बना ये शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाश से परे अहंकार ही क्षेत्रज्ञ है। ये ‘मैं’ ही समस्त कर्मों का कर्ता और कर्म फलों का भोक्ता है, इस…
प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
प्रश्नकर्ता: जैसे मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और हाॅस्पिटल, कुछ मेडिकल और कुछ सेवाएँ हैं जहाँ सेवा चलते रहती है और लाभ उठाने वाले जो लोग हैं, क्या उन सेवाओं से उन पर दुष्परिणाम हो रहा है? जहाँ से फ्री (मुफ़्त) में जो उठा रहे हैं सेवा का लाभ और क्या इन…