अध्यात्म आने का नाम नहीं है; अध्यात्म एक अंतिम विदाई का नाम है। अध्यात्म बिलकुल अलग आयाम की बात करता है। वो कहता है ये आने-जाने का कार्यक्रम तो तुम्हारा बहुत चलता रहा, तुम्हारा आना भी झूठा, तुम्हारा जाना भी झूठा।
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Originally published in Dainik Jagran on 29 July '23
अध्यात्म आने का नाम नहीं है; अध्यात्म एक अंतिम विदाई का नाम है। सांसारिक आदमी या देहाभिमानी आदमी इसी चक्कर में लगा रहता है कि वो और आए, और आए, इसी को तो जन्म-मरण का चक्र कहते हैं? प्रकृति आपसे चाहती ही यही है कि आप अपनी प्रजाति के और नमूनें पैदा करते जाएँ। आप जिस भी प्रजाति के हों, प्रकृति की आपसे अपेक्षा ये रहती है कि आप अपनी प्रजाति के ही और सदस्य पैदा करते जाएँगे।
अध्यात्म बिलकुल अलग आयाम की बात करता है। वो कहता है ये आने-जाने का कार्यक्रम तो तुम्हारा बहुत चलता रहा, तुम्हारा आना भी झूठा, तुम्हारा जाना भी झूठा। तुम आते हो जाने के लिए, तुम जाते हो आने के लिए। इस चक्र से ही तुम्हें बाहर आना है। ये आने-जाने का पूरा चक्र ही गड़बड़ है। अध्यात्म में अगर कोई चीज खुशी मनाने लायक होती है, तो वो होती है मोक्ष, मुक्ति, प्रस्थान; आगमन नहीं। तो तुम अपनी मूल-धारणा को देखो, तुम्हारी मूल-धारणा ही गलत है।
चूँकि तुम अपनी मूल-धारणा को पकड़े हुए हो, इसीलिए तुम्हें कामवासना बढ़ी शुभ बात लगती है। तुम कहते हो शरीर का इस दुनिया में आना शुभ है तो फिर कामवासना भी तो अच्छी बात हुई। शरीर का इस दुनिया में आना ही कोई शुभ बात नहीं है। ये बात बहुत लोगों के गले ही नहीं उतरेगी, क्योंकि हम तो अभ्यस्त हैं बच्चे के जन्म पर उल्लास और उत्सव करने के लिए। सबसे बढ़ी खुशी की बात यही होती है, घर में नया बच्चा आ गया।




