सच्चे आँसू दुख के नहीं, भीतर की जकड़ से मुक्ति के प्रतीक हैं। समाज ने रोने को कमजोरी मान लिया है, लेकिन अस्तित्व कभी रोने से नहीं रोकता। आँसू बहाना मनुष्यता की निशानी है, इससे मन और आँखें दोनों साफ होती हैं। जो रो नहीं सकता, वह भीतर से सूख चुका है। भीजापन ही जीवन की असली निशानी है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Lokdesh on 6 jan '24
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
जैसे किसी ने कलेजा भींच रखा हो, और फिर जरा तुम तनाव मुक्त हो जाओ, जरा तुम आश्वस्त और स्वतंत्र अनुभव करो। और जिस चीज़ ने भींच रखा है, उसको तुम छोड़ दो, या वो तुम्हें छोड़ दे। ऐसा है आँसुओं का निकलना। तनाव में शरीर भी कैसा अकड़ जाता है। पाँव का अंगूठा यूँ मुड़ जायेगा, मुट्ठियाँ भिंच जाएँगी। और जब तनाव जाता है, एक सहज सुरक्षा की आश्वस्ति उठती है, तो वो सारी जकड़ खुल जाती है, जरा विश्राम मिल जाता है।
अस्तित्वगत रूप से खूबसूरत बात है आँसुओं का बहना। तुम्हारी मनुष्यता का प्रतीक है, पशु नहीं रोते। लेकिन सांस्कृतिक रूप से रोना एक वर्जना है, अस्तित्व नहीं कहता कि मत रोओ। समाज कहता है, संस्कृति कहती है। कि मत रोओ। और फिर चूंकि वो कहती है मत रोओ, तो रोने के विपरीत जो उसको लगता है उसपर महत्व रखती है।




