
Originally published in Lokdesh on 6 jan '24
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
जैसे किसी ने कलेजा भींच रखा हो, और फिर जरा तुम तनाव मुक्त हो जाओ, जरा तुम आश्वस्त और स्वतंत्र अनुभव करो। और जिस चीज़ ने भींच रखा है, उसको तुम छोड़ दो, या वो तुम्हें छोड़ दे। ऐसा है आँसुओं का निकलना। तनाव में शरीर भी कैसा अकड़ जाता है। पाँव का अंगूठा यूँ मुड़ जायेगा, मुट्ठियाँ भिंच जाएँगी। और जब तनाव जाता है, एक सहज सुरक्षा की आश्वस्ति उठती है, तो वो सारी जकड़ खुल जाती है, जरा विश्राम मिल जाता है।
अस्तित्वगत रूप से खूबसूरत बात है आँसुओं का बहना। तुम्हारी मनुष्यता का प्रतीक है, पशु नहीं रोते। लेकिन सांस्कृतिक रूप से रोना एक वर्जना है, अस्तित्व नहीं कहता कि मत रोओ। समाज कहता है, संस्कृति कहती है। कि मत रोओ। और फिर चूंकि वो कहती है मत रोओ, तो रोने के विपरीत जो उसको लगता है उसपर महत्व रखती है।
समाज कहता है कि हर समय, तुम मुस्कुराते नजर आओ। और ये बात भारतीय भी नहीं है, तुम राम को, कृष्ण को मूर्तियों में भी मुस्कुराता नहीं पाओगे। ये बात बड़ी पाश्चात्य है। इन्होंने मुस्कान चिपका रखी होती है। क्योंकि ये डरे हैं, आतंकित हैं, इन्हें रोने से बहुत डर लगता है। और वह रो भीतर रहे हैं। उस रूदन को, उस क्रंदन को, छुपाने के लिए वह मुस्कुराहट का चोला ओढ़ते हैं।
उत्सव का मतलब ही होता है कि भीतर का गुबार हट जाए, साफ हो जाए। शरीर की मैल नहाते वक़्त ही तो पता चलती है। जब नहाने जाते हैं तभी पता चलता है कुछ अच्छा है। उत्सव अपने लिए खाली जगह बनाना चाहता है। बहुत व्यापक होता है वो, साफ होता है। साफ और व्यापक, जैसे आसमान। बड़ा और साफ।
तो वो अपने लिए जगह बनाना चाहता है। उसे किसी भी तरह का अतिक्रमण, पसंद नहीं होता। और भीतर खाली स्थान को पुरानी यादें, भावनायें, वो सब कुछ जो अभी पूरा नहीं हुआ है और पूरा होना चाहता है। भीतर बहुत कुछ होता है जो अधूरा होता है। जैसे उसमें अभी कुछ किया जाना बाकी हो, जैसे कि उसका चक्र अभी अधूरा सा हो। वही सब भीतर ऐसे पकड़ के बैठा रहता है।
फिर यकायक, संयोगवश, या अनुग्रहवश, जीवन में उत्सव का एक पल आ जाते हैं। अब उत्सव आ गया है जैसे घर में दावत दी हो, उत्सव हो, और नाचते गाते हँसते खेलते कूदते, मेहमान आ गए हों। और भीतर क्या पड़ा हुआ है? पुराना कचरा। और वे मेहमान अब किस मन में हैं? किस रौ में हैं? कि हमें तो मस्ती करनी है, और साफ मस्ती।
बेहोशी वाली नहीं। अब ये आ ही गए कि यहाँ हमें तो आव दावत करनी है, और यहाँ कचरा पड़ा है। तो तुरंत उस कचरे की निकाल बाहर करेंगे। भीतर के अँधेरे से आज़ादी मिलती है उत्सव के क्षणों में। इसीलिए आदमी दो मौकों पर अश्रुपूरित हो जाता है। दोनों ही मौकों पर आँखें डबडबा जाती हैं।
तुम्हारे जीवन में दुःख आया, तुम रो पड़ोगे। तुम्हारे जीवन से दुःख जाएगा, तो भी तुम रो पड़ोगे। सामान्य भाषा में इस दूसरे रोने को हम कह देते हैं ? खुशी के आँसू। वो वास्तव में खुशी के आँसू नहीं होते। वो होते दुःख के ही हैं पर वो जाते हुए दुःख के आँसू होते हैं। वो दुःख से मुक्ति के आँसू होते हैं। गाड़ी आती है तो भी दिखती है, और गाड़ी वापस लौटती है तो भी दिखती है।
रोना इसीलिए, जानने वालों ने बड़े स्वास्थ्य की बात कही है। वो कहते हैं कि रोना भली बात है, खूब रोया करो, रोने से आँखें साफ होती हैं, और मन भी। अच्छी बात है रोना। छोटी छोटी बात पर रो लिया करो। और रोने का पीड़ा से कोई संबंध हो ये जरूरी नहीं। कोई कहानी सुनी आँखें छलछला गयी, ठीक है, फिल्म देख रहे हो, फिल्म देखते देखते चार बूंदे लुढ़क गयीं, कोई बुराई थोड़े ही है। ये कमजोरी का लक्षण नहीं है। और न ही ये किसी मानसिक बीमारी का लक्षण है।
यूँ ही कैसे बैठे हो अगर आँखें गीली हो जाएँ तो इसमें कोई हानि नहीं है, ये स्वास्थ्य की बात है। हँसी से ज्यादा गहराई होती है, आँसुओं में। लेकिन मालूम है, हम अकसर रोते वक्त सुन्दर नहीं लगते, जबकि आँसू बहुत सुन्दर होते हैं, आँसुओं में तो कितनी सुंदरता है, आँसुओं पर देखो कितनी कवितायें लिखी गयी हैं। कोई कहता है आँखों से मोती झरे, कोई कहता है ओस की बूँदें हैं।
लेकिन फिर भी हम जब रोते हैं, हम सुन्दर नहीं लगते, आमतौर पर ! क्योंकि हम आँसुओं के विरोध में खड़े हो जाते हैं। हम अपने आप को रोने देते नहीं। तो हमारे चेहरे पर गृहयुद्ध शुरू हो जाता है। आँसू निकलना चाहते हैं और हम आँसुओं को ले कर के शर्मसार रहते हैं। कि मैं रो क्यों दिया ! और उन्हें हम बाधित करने की, अवरुद्ध करने की कोशिश में लग जाते हैं; अब चेहरा कैसा हो जाता है?
कि आँसू तो निकल रहे हैं, पर तुम कोशिश कर रहे हो कि ना निकलें। नहीं मैं थोड़े ही रो रहा हूँ। मस्त हो के रोओ, चेहरा भी फिर आँसुओं जैसा ही सुन्दर दिखेगा। हमने मन में ये गलत समीकरण बैठा लिया है कि आँसू का संबंध दुःख से है, अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है।
जो आदमी जितनी मुस्कुराहट पहने घूम रहा हो, जान लेना कि भीतर उसके घोर व्यथा है। अगर आप सहज हो, तो ना आपको उत्तेजना में हँसने की ज़रूरत है, ना ही उत्तेजना में रोने की ज़रूरत है। फिर आपका हास्य भी, सहज, सुमधुर, सरल, सूक्ष्म होगा, और आपके आँसू भी उतने ही सहज होंगे। कभी हँस दिए, कभी रो दिए। कौन सी बड़ी बात है? आप आवश्यक नहीं समझोगे, कोई एक भाव अपने चेहरे पर ढोना। आप ये नहीं कहोगे कि मेरी जितनी भी तसवीरें आयें, वो सब ? हँसती हुई आयें। हँसती हुई आ गयी तो ठीक, हँसती हुई नहीं आई, तो भी ठीक। और रोती हुई आ गयी तो भी बराबर ही ठीक।
हम अपने ही आँसू देख कर के घबरा जाते हैं, और हम दूसरों के आँसू देख कर के भी घबरा जाते हैं। कोई रो रहा होगा तो या तो उसे कोशिश करेंगे चुप कराने की ! कोई हँस रहा हो तो उसे चुप कराते हो? कोई रोता हो, तो लग जाएँगे, कोई उसको रुमाल दे रहा है, कोई उसको ढांढस बंधा रहा है, कोई छाती से लगा रहा है, कोई ज़बरदस्ती उसकी पीठ ठोक रहा है, कोई पानी ले के खड़ा हो गया है। उसको लग रहा है, क्या आपदा आ गयी है, क्या हो गया ?
किसी ने एक सौ एक डायल कर दिया। एम्बुलेंस खड़ी हो गयी है। फायर ब्रिगेड, पुलिस, एम्बुलेंस, सब बुला लो। कोई रो रहा है। नतीजा ये है कि बहुत लोग, बहुत शुष्क, बहुत पाषाण, बहुत रेतीले हो गए हैं। उनसे रोया ही नहीं जाता। और उनको रोने की बहुत सख्त ज़रूरत है। देखे हैं ना ऐसे लोग? ये तथ्य तो हटा दो कि वो रोएँगे, ये कल्पना करना भी मुश्किल है कि वो रोते हुए कैसे लगेंगे ? उनसे रोया जाएगा ही नहीं। वो मुर्दा हो गए, वो रेत और पत्थर हो गए। रेत भी रात में जरा नम हो जाती है। जब ओस पड़ती है। वो कभी भी नम नहीं होते। ऐसे लोग मर गए।
तुम यदि रो नहीं सकते, तो तुम जीवित भी नहीं हो। तुम्हारी आँखें अगर कभी भीगती नहीं तो अब आँखें नहीं हैं ये। रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून। उन्होंने, वो बात नहीं कही थी पर फिर भी उनकी बात गौर तलब है। पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून। जीवन में पानी का होना बहुत जरूरी है। कबीर कहते हैं, आठ पहर भीजा रहे, प्रेम कहावे सोय। जरा नमी, जरा गीलापन, थोड़ी आद्रता। वो नहीं है तो कौन सी आध्यात्मिकता, कौन सा प्रेम, कौन सा सत्य? भीजा होना बहुत जरूरी है। ये भीजापन, ये भीगापन जीवन की निशानी है।
Originally published in Lokdesh on 6 jan '24