कृष्ण सब कुछ में हैं, लेकिन यह सत्य तभी दिखता है जब हम उच्चतम की साधना करें। जगत में सबसे ऊँचे उठने पर ही नीचे का सब स्पष्ट होता है। ब्रह्मविद्या सबसे कठिन है क्योंकि इसमें विरोधाभास है, फिर भी यही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। जो कठिनतम को साध ले, उसके लिए बाकी सब अपने आप सरल हो जाता है।
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Originally published in Rashtriya Hindi Mail
क्या कोई ऐसा भी है जिसके लिए कृष्ण अभिव्यक्त नहीं हैं ? अपनी ओर से तो कृष्ण अभिव्यक्त-ही-अभिव्यक्त हैं, हमारी ओर से अभिव्यक्त नहीं हैं वो। तो ऐसा निश्चित रूप से कोई है जिसके लिए कृष्ण नहीं हैं-वो हम हैं। हमें कृष्णत्व दिखाई दे तो कृष्णत्व है, हमें कृष्णत्व न दिखाई दे तो हमारे लिए तो नहीं है।
चौथा अध्याय, ग्यारहवाँ श्लोक- कृष्ण कहते हैं कि जो मुझे जैसा देखता है, जैसा भजता है, मैं भी उसके लिए वैसा ही हो जाता हूँ। तुम मान लो कि जगत में कृष्ण नहीं हैं तो जगत वास्तव में तुम्हारे लिए कृष्णहीन ही हो जाना है। कृष्णहीन जगत कैसा होगा? आनंदहीन। जो मान ले कि जगत कृष्णहीन है, जगत उसके लिए कृष्णहीन हो जाएगा।
तुम जो मानोगे, तुम्हारा संसार वैसा ही हो जाएगा। और यह कृष्ण की इच्छा है, उन्होंने पूरी मुक्ति दे रखी है जीव को। वो कहते हैं कि मुझे पाना है या नहीं पाना है, तुझे यह मुक्ति भी, यह चुनाव, यह विकल्प भी उपलब्ध है। तू जगत में मुझे देखना चाहे तो देखना चाहता तो मत देख। हाँ, यथार्थ सुनना चाहता है मेरी तरफ का तो मैं बता देता हूँ कि सब कुछ मैं ही हूँ-यह यथार्थ है।




