Rashtriya Hindi Mail
22 Jan '23

जो कठिनतम है उसे साध लो, बाकी अपने आप सध जाएगा

Acharya Prashant

5 min
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जो कठिनतम है उसे साध लो, बाकी अपने आप सध जाएगा
कृष्ण सब कुछ में हैं, लेकिन यह सत्य तभी दिखता है जब हम उच्चतम की साधना करें। जगत में सबसे ऊँचे उठने पर ही नीचे का सब स्पष्ट होता है। ब्रह्मविद्या सबसे कठिन है क्योंकि इसमें विरोधाभास है, फिर भी यही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। जो कठिनतम को साध ले, उसके लिए बाकी सब अपने आप सरल हो जाता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Rashtriya Hindi Mail

क्या कोई ऐसा भी है जिसके लिए कृष्ण अभिव्यक्त नहीं हैं ? अपनी ओर से तो कृष्ण अभिव्यक्त-ही-अभिव्यक्त हैं, हमारी ओर से अभिव्यक्त नहीं हैं वो। तो ऐसा निश्चित रूप से कोई है जिसके लिए कृष्ण नहीं हैं-वो हम हैं। हमें कृष्णत्व दिखाई दे तो कृष्णत्व है, हमें कृष्णत्व न दिखाई दे तो हमारे लिए तो नहीं है।

चौथा अध्याय, ग्यारहवाँ श्लोक- कृष्ण कहते हैं कि जो मुझे जैसा देखता है, जैसा भजता है, मैं भी उसके लिए वैसा ही हो जाता हूँ। तुम मान लो कि जगत में कृष्ण नहीं हैं तो जगत वास्तव में तुम्हारे लिए कृष्णहीन ही हो जाना है। कृष्णहीन जगत कैसा होगा? आनंदहीन। जो मान ले कि जगत कृष्णहीन है, जगत उसके लिए कृष्णहीन हो जाएगा।

तुम जो मानोगे, तुम्हारा संसार वैसा ही हो जाएगा। और यह कृष्ण की इच्छा है, उन्होंने पूरी मुक्ति दे रखी है जीव को। वो कहते हैं कि मुझे पाना है या नहीं पाना है, तुझे यह मुक्ति भी, यह चुनाव, यह विकल्प भी उपलब्ध है। तू जगत में मुझे देखना चाहे तो देखना चाहता तो मत देख। हाँ, यथार्थ सुनना चाहता है मेरी तरफ का तो मैं बता देता हूँ कि सब कुछ मैं ही हूँ-यह यथार्थ है।

और फिर उपाय बताया है उन्होंने स्वयं को पाने का। उपाय यह है कि जो कुछ इस जगत में उच्चतम है, तू उसको पाने की साधना कर। है तो इस जगत में जो कुछ भी, वह मेरी ही अभिव्यक्ति है, लेकिन यह बात तुझे दिखाई नहीं देगी। यह बात दिखाई देने का उपाय क्या है?

कि जो कुछ भी ऊँचे-से-ऊँचा है जगत में, उसे पाने निकल। जब ऊँचाई की साधना करेगा तो कृष्ण को पा लेगा। तो यह बात दोतरफा हो गई है। कुछ विरोधाभासी हो गई है, इसको समझना पड़ेगा। जुए में भी कृष्ण हैं, जो निकृष्टतम छल चल रहा है, उसमें भी कृष्ण हैं। इस जगत के पातालों में, गड्ढों में, गंदी और नारकीय जगहों में भी कृष्ण ही हैं।

लेकिन कृष्ण हैं उन सब जगहों में, यह तुम्हें अगर जानना है तो तुम्हें उन जगहों को छोड़ना पड़ेगा, तुम्हें उठना पड़ेगा उच्चतम की ओर, जैसे कि कोई अगर पहाड़ के शिखर पर चढ़ जाए तो उसे बहुत दूर तक सब साफ़ दिखाई देने लग जाता है, जैसे कि कोई हवाई जहाज पर बैठ जाए तो उसे नीचे का पूरा परिदृश्य स्पष्ट हो जाता है।

दुनिया में कृष्ण ही हैं, कृष्ण की ही दुनिया है, लेकिन यह बात समझोगे तब, जब तुम दुनिया से ऊपर उठोगे। जो दुनिया में ही रंजित हैं, जो दुनिया से ही लिपटा हुआ है, उसे कभी समझ में नहीं आएगा कि यह दुनिया चीज़ क्या है। 'दुनिया क्या है?', अगर यह समझना है तो दुनिया से ऊपर उठो।

इसीलिए कृष्ण एक तल पर यह कहते हैं कि मैं ऋग्वेद हूँ, यजुर्वेद हूँ, सामवेद हूँ और फिर यह भी कहते हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, यह क्या बात है? अभी तो कह रहे थे कि चारों वेद मैं ही हूँ और अब कह रहे हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, यह क्या बात है? सब कुछ वहीं हैं, लेकिन सब कुछ वही हैं, यह जानने का उपाय है ऊपर उठना। जो ऊँचे-से-ऊँचा है, उसकी ओर जाओ, नीचा अपने-आप समझ में आ जाएगा। जो कठिनतम है, उसको साध लो, बाकी सब अपने-आप आसान हो जाएगा।

ब्रह्मविद्या को कठिनतम कहा गया है। कहा गया है कि जो बिल्कुल समझ में न आने वाली चीज़ है, वह ब्रह्मविद्या है। जैसे यही कि मैं सब कुछ हूँ लेकिन सब चीज़ों में जो ऊँचे-से-ऊँचा है, वह मैं हूँ। मैं गोरैया भी हूँ, मैं कौवा भी हूँ, मैं तोता भी हूँ, मैं मैना भी हूँ। और फिर कहते हैं कि मैं तो पक्षियों में गरुड़ हूँ। थोड़ी देर पहले तो कह रहे थे मैं तोता हूँ, मैना हूँ, कोयल हूँ, कौआ हूँ और अब क्या बोल रहे हैं? मैं तो जी गरुड़ हूँ।

तो विद्याओं में सबसे विलक्षण और सबसे कठिन ब्रह्मविद्या है क्योंकि दिमाग को झंझोर डालती है। यह सामान्य तर्क पर चलती ही नहीं, इसमें विरोधाभास है। बाकी सब ज्ञान के जो क्षेत्र हैं, वो तार्किक होते हैं, उनमें अंतर्विरोध नहीं होते। दो और दो कभी चार और कभी पाँच नहीं हो सकता, यह नहीं कहेंगे आप कि पिछले अध्याय में दो और दो चार था, इस अध्याय में दो और दो पाँच हो गया। गीता में बात पलट जाती है।

सातवें अध्याय में कुछ और है और नौवे, दसवें में कुछ और है। और बातें दोनों ही सही हैं। जो विरोधाभास को साथ लेकर चल सके, वह मानवों में उच्चतम है। नहीं तो आदमी कहता है कि बता दो यह सफेद है या काला, या तो सफेद होगा या काला होगा। जो यह समझ पाए कि सफेद होकर भी काला है और कालेपन में ही सफेदी है, वह समझ लो आदमियों में सर्वश्रेष्ठ हो गया, नरश्री हो गया।

जिसने ब्रह्मविद्या सीख ली है, उसको बाकी सब चीज़ें बड़ी आसानी से आ जाती हैं, वो किसी भी कला में पारंगत हो जाएगा, वह किसी भी विज्ञान को बड़ी आसानी से सीख लेगा। उच्चतम को पा लिया नीचे वाले तो सब सध ही जाते हैं।

Originally published in Rashtriya Hindi Mail

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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