एक युवक, जिसे अपने पैजामे और नाड़े पर गज़ब भरोसा था || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: अभी हम ऋषिकेश में हैं, इससे थोड़ा सा आगे पड़ता है कोड़ियाला। तो कोड़ियाला में शिविर हुआ था आज से आठ-एक साल पहले की बात होगी। तो उसमें ज़्यादातर जो आये थे, वो कॉलेज के ही सब थे छात्र-छात्राएँ थे। बड़ी बढ़िया वो जगह थी जहाँ पर हुआ था। वहाँ पर बिजली नहीं थी और ठंड का मौसम था।
लालटेनें दी जाती थीं, लालटेनों के प्रकाश में रात में सारी बातचीत होती थी, चर्चा होती थी। देर रात तक चलती थी और बीच में वो लकड़ियाँ जला देते थे, तो उसी में। कोई सुख-सुविधाएँ वगैरह कुछ भी नहीं थीं वहाँ पर, बस वो टेन्ट होते थे और बिलकुल ख़ाली जगह वहाँ पर, किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं। ऊपर से बहुत नीचे पैदल उतरकर नीचे आना पड़ता था। तो वहाँ आगे बहुत सुन्दर प्रवाह था गंगा का, वैसा बहुत कम देखने को मिलता है।
तो जो वहाँ पर थे कैम्प वाले प्रबन्धक जो थे, उन्होंने तट पर एक भारी खूँटा गाड़ा हुआ था, गहरा। मोटा और गहरा। ठीक है? रोहित (स्वयंसेवक) थे उसमें — ओमकार वाला, याद आ जाएगा तुम्हें। तो खूँटा गाड़ा हुआ था और खूँटे से उसने बाँधी हुई थी बड़ी एक लम्बी और मोटी रस्सी। किस उद्देश्य से? बोल रहे थे कि पता था कि ये सब लड़के हैं, ये सब उतरेंगे और जाएँगे उसमें।
ठीक है, तो जा सकते हो क्योंकि दिन में सूरज आ जाता था तो थोड़ी सी गर्मी हो जाती थी, अब जा सकते हो। लेकिन बोलता था कि ये पकड़कर रखना। क्या, ये रस्सी। और इतनी लम्बी है कि जितने लोग चाहो उतने लोग इसे पकड़ सकते हो। तो जहाँ भी रहो सब अपना पकड़े रहो, बड़ी लम्बी थी। तो ठीक है।
रात में सत्र चलें उसमें सब बिलकुल मग्न हो जाएँ, मस्त हो जाएँ और गा रहे हैं, झूम रहे हैं और बात भी ऐसी और उम्र भी ऐसी। तो सुबह का वक़्त, रात में ठंड भी खूब थी; उठे, बढ़िया सूरज निकला, गर्म-गर्म लगा पानी में जाएँगे। तो उसमें से एक है, उसको देखा वो एकदम आँख बन्द करके पानी में पड़ा हुआ है। और बाक़ी सब लोग अपना रस्से को पकड़े हुए हैं, वो अलग बहता हुआ निकला जा रहा है आगे की ओर। और बिलकुल मस्त है, बिलकुल मस्त है।






