आचार्य प्रशांत: इस तरह की व्यर्थ बातें प्रचलन में इसीलिए रह जाती हैं क्योंकि हिन्दू धर्म और भारतीय गौरव के नाम पर हम इनको कभी ख़ारिज नहीं करते।
हम कहते हैं कि देखो, हमारा धर्म इतना ऊँचा है और हमारा देश इतना ऊँचा है कि बड़े ज़बरदस्त योगी होते हैं हमारे यहाँ। माइनस ट्वेंटी तापमान में वो नंगे घूम रहे हैं। क्या बात है!
फ़लाने योगी हैं, वो मरे ही नहीं, कोई उनकी उम्र की गणना नहीं कर पाया। वो कम-से-कम आठ लाख साल पुराने हैं, कम-से-कम। और अभी नया-ताज़ा निकलकर आ रहा है कि आठ लाख तो कुछ भी नहीं है। क्योंकि उनके एक शिष्य का कहना है कि दस लाख साल तो उसकी ख़ुद की उम्र है, तो योगी बाबा जी की उम्र दस लाख साल से ज़्यादा ही होनी चाहिए, कम नहीं हो सकती। दस-दस साल तक ऐसे योगी हैं, जिन्होंने अन्न का एक दाना नहीं खाया, पानी की एक बूँद नहीं ली। अहाहा! मेरा भारत महान! गौरव तुम्हें हो जाता है पहले।
तो फिर, तुम्हारे इसी गौरव को और ईंधन देने के लिए इस तरह के अन्धविश्वास और फैलाये जाते हैं। और ऐसे ही अन्धविश्वासों का नतीजा है कि भारत को इतना ज़्यादा ग़ुलाम रहना पड़ा, जिसकी कोई इंतेहा नहीं है। जब तुम्हारी नज़र में यथार्थ से ज़्यादा बड़ी कल्पना है, तो तुम मुझे बताओ कि तुम यथार्थ शक्ति पैदा ही क्यों करोगे? तुम क्यों कहोगे कि मुझे आर्थिक दृष्टि से एक समृद्ध राष्ट्र बनना है?
भई, मैं मेहनत करके आर्थिक दृष्टि से समृद्ध क्या बनूँ? एक-से-एक योगी बैठे हैं, मैं जाऊँगा, उनकी शरण लूँगा। वो शूॅं-शाॅं करेंगे और हाथ में स्वर्ण भस्म आ जाएगी। वो मुझसे कहेंगे ले बच्चा, जा!
दुश्मन आक्रमण करने आ रहे हैं, मैं क्या सैन्य शक्ति बढ़ाऊँ? मैं सेना को क्या मज़बूत करूँ? मैं जाऊँगा योगी जी के पास, योगी जी उड़ते हुए साँप




