
Originally published in Jeevan Dhara on 07 Oct '23
जीवन प्रतिपल संघर्ष है, पर हम यह नहीं जान पाते कि हमारे लिए कौन-सा संघर्ष उचित है। बड़ी लड़ाई वह है, जो अपने खिलाफ लड़ी जाती है, असल संघर्ष वह है, जो मन के विकारों को हटाने के लिए किया जाता है।
हमारा सारा जीवन संघर्ष में ही बीतता है। बचपन में माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष, युवावस्था में नौकरी के लिए भाग-दौड़ और बुढ़ापे में अपने देह को कुछ और वर्षों तक जीवित रखने की चाह। इन चीजों में हम इतना खो जाते हैं कि अपने भीतर चल रहे द्वंद्व को देख ही नहीं पाते।
जीवन प्रतिपल संघर्ष है, पर हम यह नहीं जान पाते कि हमारे लिए कौन-सा संघर्ष उचित है। और फिर हम छोटी लड़ाइयों में उलझकर बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई से चूक जाते हैं। बड़ी लड़ाई वह है, जो अपने खिलाफ लड़ी जाती है, असल संघर्ष वह है, जो मन के विकारों को हटाने के लिए किया जाता है। जैसे-जैसे हमारा मन सुलझता जाता है, हम बाहरी चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सक्षम होते जाते हैं।
अक्सर लोग हमसे एक सवाल पूछते हैं कि क्या हम सांसारिक कर्म कर रहे हैं तो इसका सही जवाब है, नहीं। सांसारिक कर्म हम नहीं कर रहे, बल्कि अपने-आप ही रहे हैं। मूल भ्रम यही है की सांसारिक कर्म करने वाले हम हैं। इंद्रियां, मस्तिष्क, बुद्धि, अंतःकरण, स्मृति, ये सब अपना काम करना बखूबी जानते हैं। शरीर एक स्वापत्त इकाई है, स्वशासित है; वह अपना काम जानता है। हम सो जाते हैं, उसके बाद भी शरीर कैसे चलता रहता है?
हम चल रहे हैं, सामने से अचानक कोई सांप आ जाए, तो हम तुरंत कैसे निर्णय कर लेते हैं और वहां से पीछे हट जाते हैं? तो, सब बातें शरीर को पता है। यहां सब कुछ स्वनिर्धारित है। यह पूरी व्यवस्था प्राकृतिक है। हमारे ऊपर कोई उत्तरदायित्व नहीं है इस व्यवस्था को चलाने का। तो, मेरे हमारा क्या काम है? इस सच पर हमें खुद को मुक्त करना ही हमारा काम है।
जैसे, जब हम किसी का उद्बोधन सुनते हैं, या पूरी तल्लीनता से कोई काम करते हैं, तो पाते हैं कि वह काम बहुत अच्छा होता है और हम बेहद खुशी मिलती है। ऐसा इसलिए होता है कि हम उस काम से आजाद हो गए। इसे ही कहते हैं वर्तमान में जीना यानी डूबकर काम करना
कर्ताभाव से आज़ादी, वर्तमान में जीना, मुक्ति, समाधि सब एक हैं। और ऐसा तभी संभव है, जब हम अनावश्यक चीजों से खुद को हटाकर अपने मन को एकात्म करें, सद्विचारों को अपने अंदर पोषित करें, सकारात्मक बनें, अच्छी संगति करें, सद्गुणों को अपनाएं, सुसंस्कारों पर अमल करें। ऐसा करके ही हम अपने अंदर के दुर्गुणों को दूर कर सकते हैं, नकारात्मकता को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं।
अपने अंदर के अज्ञान, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि कमियों व विकारों से संघर्ष कर उन्हें दूर करना और जीवन को सही दिशा देना ही हमारा असल कर्तव्य है। और जब हम ऐसा कर ले जाते हैं, तो देखते हैं कि अपने जीवन में आने वाली बाहरी चुनौतियों से भी लड़ने में हम सक्षम होते जाते हैं, साथ ही हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमें आनंद आने लगता है, हम आगे बढ़ने लगते हैं, हर कार्य में सफल होने लगते हैं।
मनुष्य का जीवन एक युद्ध के मैदान की तरह है, जहां हम अपने जीवन में चल रहे विभिन्न युद्धों के उतार-चढ़ाव, संघर्षों से जूझते और लड़ते हैं। कभी हम अपने अंदर के विकारों से लड़ते हैं, तो कभी बाहरी चुनौतियों से। लेकिन हम सबके बीच हम सबसे अहम लड़ाइयों का फैसला नहीं कर पाते। जबकि अपने अंदर की कमियों, नकारात्मकता को दूर करना ही असली लड़ाई है।
Originally published in Jeevan Dhara on 07 Oct '23