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दम हो तो ही इधर आना || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट (संगणक विज्ञान विभाग) से। मेरे मन में एक प्रश्न है, जहाँ पर मैं दुविधा से भरा हुआ हूँ, कि मेरा इस बार अन्तिम वर्ष है और मैं कॉलेज से पास आउट हो (निकल) जाऊँगा। तो मेरी फैमिली ने मुझे यहाँ पर पढ़ाने के लिए काफ़ी संघर्ष किया है और मैंने भी काफ़ी संघर्ष किया यहाँ तक पहुँचने के लिए।

कॉलेज ख़त्म होने के बाद मैं एक आई.टी. कम्पनी ज्वाइन करने जा रहा हूँ नौकरी करने के लिए, जोकि मेरी इस समय की ज़रुरत है और मेरे परिवार की भी यही इच्छा है। मुझे भी इस विषय में काम करना पसन्द है। परन्तु जब मैं देखता हूँ कि इस तरीक़े से क्या मैं एक बड़े सोशल कॉज़ (सामाजिक सरोकार) के लिए काम कर पाऊँगा, तो मुझे ज़वाब यही मिलता है — जैसा आपकी और कई अन्य लोगों की बातें सुनकर मेरा अनुभव रहा है — कि सामाजिक सरोकार में आप अपने काम को उतने ज़्यादा प्रभावपूर्ण तरीक़े से नहीं कर पाएँगे। परन्तु मेरे पास अभी वर्तमान में और कोई चारा भी नहीं है इसके अलावा, तो मुझे आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए और मुझे अपने परिवार को आर्थिक रूप से सहारा भी देना है, जिस वजह से अल्पावधि में मुझे ये कार्य करना है।

परन्तु लम्बे समय में मैं सामाजिक सरोकार के लिए काम करना चाहता हूँ जिससे न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी काफ़ी अच्छा कार्य कर सकूँ, जोकि एक असल मायने में सही काम होगा मेरे लिए। तो इस पर थोड़ा प्रकाश डालिए। आचार्य प्रशांत: देखिए, हम सबसे पहले तो एक शारीरिक इकाई हैं। एक फिज़िकल एन्टिटी (शारीरिक इकाई) हैं हम, और शरीर के रूप में हमारा जन्म दुनिया के लिए कुछ करने के लिए नहीं होता है। आप अपना शरीर लेकर के जन्मते हैं, तो ये आपके जन्म के साथ ही निश्चित होता है कि आप अपने लिए ही सबसे ज़्यादा चिन्तित रहेंगे और अपने ही हित या स्वार्थ के लिए काम करते रहेंगे। ठीक है?

सबसे पहले अपना शरीर आता है। फिर वो शरीर आ जाते हैं जिनसे आपका शरीर आया है, तो इसमें जो आपका परिवार है, वो आ जाता है। तो जब कभी आपको थोड़ी फ़ुर्सत मिलती है अपने शरीर के बारे में सोचने से, तो आपको सोचना शुरू करना ही पड़ेगा उन लोगों के बारे में जो आपके परिवार के लोग हैं। ये भाग्य लेकर के पैदा होता है हर जीव। आप जिस दिन पैदा होते हैं, उसी दिन ये निश्चित हो जाता है कि आपको सब कुछ अपनी ही खातिर, अपने ही छोटे-छोटे स्वार्थों की ख़ातिर करना पड़ेगा। ये बात हमारे शरीर में है, हमारे डी.एन.ए. में लिखी हुई है। इसी चरित्र के साथ प्रकृति ने हमें पैदा करा है।

अब होता क्या है कि हम थोड़े से बड़े होते हैं; तीन, चार, पाँच साल के होते हैं। उसमें फिर हमें शिक्षा मिलनी शुरू हो जाती है। जब शिक्षा मिलनी शुरू होती है और इधर-उधर से भी कुछ ज्ञान आने लगता है, तो उसमें हमारे सामने कुछ बड़े ऊँचे-ऊँचे नाम आते हैं। और वो ऊँचे नाम इसलिए क्योंकि हम देखते हैं कि सब आस-पास वाले उन्हें इज़्ज़त दे रहे हैं, तो वो हमें भी ऊँचे लगने लगते हैं।

तो आपके सामने फिर नाम आ गया — मान लीजिए स्वामी विवेकानन्द का नाम आ गया; ठीक है? या आपके सामने चन्द्रशेखर आज़ाद का नाम आ गया। तो इनका नाम जब आ जाता है, और आप देखते हैं, ‘अरे! इनकी प्रतिमाएँ लगी हुई हैं, इनके नाम पर सड़कें हैं, इन्हें माल्यार्पण हो रहा है, इन्हें सम्मान मिल रहा है,’ तो आपको लगता है, ‘हम भी इनके जैसे क्यों नहीं बन जाते।’ और चूँकि इनके नाम बहुत आम हो चुके हैं, हर एक की ज़ुबान पर हैं, बहुत प्रचलित हैं, तो हमको लगता है ये लोग भी कुछ आम ही थे, क्योंकि सबको इनके बारे में पता है। तो सब लोग ऐसे कहते हैं, ‘हाँ, स्वामी विवेकानन्द, हाँ, स्वामी विवेकानन्द। बगल की इमारत में ही तो हैं।’

वो करोड़ों में किसी एक के साथ घटना घटती है कि वो अपने क्षुद्र स्वार्थों से आगे जाकर के कुछ कर पाये। वो करोड़ों में किसी एक में ये संकल्प और साहस होता है कि उतनी बार क़ीमत चुका पाये कि, ‘मुझे बस अपना पेट नहीं भरना है, अपने परिवार की ख़ातिर नहीं जीना है। मैं प्रकृति से आगे जाकर भी कुछ कर सकता हूँ।’ लेकिन हम इस बात को समझते नहीं। हममें वास्तव में महान व्यक्तित्वों के प्रति भी इतना सम्मान नहीं होता कि हम ये स्वीकार कर पायें कि हम उनसे बहुत-बहुत-बहुत-बहुत-बहुत-बहुत पीछे हैं। हम ये मान नहीं पाते। तो फिर हम ये पूछना शुरू कर देते हैं कि, ‘मैं भी तो वही करना चाहता हूँ जो उन्होंने करा। मैं कैसे कर लूँ?’ आप उतनी बड़ी क़ीमत देने को तैयार हैं क्या? आप उतनी बड़ी क़ीमत देने को तैयार हों, आप भी कर सकते हैं। लेकिन हम कभी क़ीमत वाले पक्ष की बात नहीं करते। जब क़ीमत देने की बात आती है, तो हम मजबूरी का रोना शुरू कर देते हैं अपनी जवानी में ही, कि, ‘मैं तो मजबूर हूँ। मैं क्या करूँ?’ आप मजबूर हैं, इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं हैं। मजबूरियों के साथ तो हमें प्रकृति ने ही पैदा करा है। बिलकुल आपकी कोई ग़लती नहीं है। लेकिन अगर आपको अपनी मजबूरियों की ही बात करनी है, तो फिर महानता के सपने लेना छोड़ दें।

आप दोनों काम एक-साथ नहीं कर सकते, कि ये भी कहते रहें कि, ‘मुझे अपना पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्य निभाने हैं और मुझे अपने लिए कुछ पैसा वगैरह भी कमाना है। और कम-से-कम एक तल की तो लाइफ स्टाइल होनी चाहिए न। और जब दस-पन्द्रह साल मैं नौकरी वगैरह कर लूँगा, उसके बाद मैं देखूँगा कि दुनिया, समाज, जहान के लिए क्या किया जा सकता है।’ आप ऐसी बातें करना चाहते हों और उसके साथ आप ये बोलें कि मुझे कुछ बहुत ऊँचा, कुछ बहुत विरल करके दिखाना है, तो दोनो चीज़ें एक साथ सम्भव नहीं हैं।

आप कहते कि आप दस-बीस साल कॉर्पोरेट (निगमन) में नौकरी करके, आई.टी. जॉब करके उसके बाद आप सोचेंगे समाज के लिए क्या कर सकते हैं। आप जिस समय सोचना शुरू करेंगे आपके मुताबिक, उतनी उम्र मे तो स्वामी जी अपना काम ख़त्म करके विदा हो चुके थे। और आप कह रहे हैं कि उस उम्र में आप सोचना शुरू करेंगे कि अब मैं दूसरी पारी खेलूँगा। ऐसे नहीं होता है। और जितनी आपकी आज उम्र है, उतनी उम्र में भगत सिंह फन्दा चूम चुके थे, आपकी ही उमर में। आप कह रहे हैं, ‘अभी तो मैं अपने पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करूँगा।’ और मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि परिवार कर्तव्यों का निर्वाह करने में कोई बुराई हैं। इसीलिए मैंने अपने वक्तव्य की शुरुआत में ही कह दिया कि हम तो पैदा ही होते हैं अपनी देह की ख़ातिर और अपने परिवार की ख़ातिर। दुनिया का हर जीव, हर पशु, हर पक्षी पैदा ही इसलिए होता है कि वो सर्वप्रथम अपने स्वार्थ का ही चिन्तन करे। आपको दर्द होता है; आपके बगल वाले को थोड़े ही दर्द होगा। हम रचे ही ऐसे गये हैं। आपको अभी चोट लग जाए; बगल वाला कितनी भी संवेदना, सहानुभूति रखे, लेकिन वो आपकी चोट का अनुभव नहीं कर सकता। चोट तो आपको ही सहनी पड़ेगी। तो ये भूलिए नहीं आपको किस अवस्था में प्रकृति ने जन्म दिया है। आपको प्रकृति ने स्वार्थी बनाकर ही जन्म दिया है और प्रकृति के अनुशासन को तोड़ना, प्रकृति के नियम को तोड़ना बहुत साहस, बहुत संकल्प माँगता है।

और ये कोई बस संयोग की बात नहीं कि मैंने अभी जिन दो व्यक्तित्वों का नाम लिया, वो भरी जवानी में ही विदा हो गये। इतनी बड़ी क़ीमत देनी पड़ती है। एक इसलिए विदा हुए क्योंकि उन्होंने स्वयं मृत्यु का वरण करा। बोले, ‘अगर अभी मैं मर जाता हूँ, तो मेरी कहानी से देशभर में आग लग जाएगी। और अगर मैं जीता रहूँगा, तो मेरा जीवन बेकार हो जाएगा। मेरे लिए ज़्यादा ज़रूरी है कि मैं अभी ही विदा हो जाऊँ। फिर मैं एक किंवदन्ती बन जाऊँगा। फिर मैं सदा के लिए एक आदर्श बन जाऊँगा और मेरी कहानी से न जाने कितने जवान लोग प्रेरणा लेते रहेंगे।’ और दूसरे ऐसे थे कि इन्होने इतनी मेहनत करी, इतनी मेहनत करी — पहले तो विदेशों में मेहनत करते रहे, फिर भारत में आकर भारत-भ्रमण करते रहे — इतनी मेहनत करी कि चालीस की उम्र आते-आते उनका शरीर जवाब दे गया, उनको जाना पड़ा। ऐसी क़ीमत चुकानी पड़ती है। जो ऐसी क़ीमत चुकाने को तैयार हो, उसके लिए है वो दूसरा रास्ता। नहीं तो हम सब पैदा ही होते हैं बस प्रकृति वाले पहले और एकमात्र रास्ते पर चलने के लिए। कृपा करके कोई ये न सोचे कि वो दूसरा रास्ता सभी के लिए है, और मैं साथ-ही-साथ ये भी कहा करता हूँ कि दूसरा रास्ता निसंदेह सभी के लिए है। है सभी के लिए, पर है बस उनके लिए जो उस पर चलने का मूल्य चुकाने का संकल्प करें। मूल्य हमें इतना बड़ा लगता है कि हम कहते हैं, ‘मुझसे नहीं चुकाया जाएगा। मुझसे नहीं होगा, मुझसे नहीं होगा, मेरे बस की नहीं है। हाँ, मेरे बस की नहीं है।’ हम एकदम दम तोड़ देते हैं। ये अलग बात है कि जिन्होंने मूल्य चुका लिया, उन्हें फिर धीरे-धीरे समझ में आने लगता हैं कि, ‘मूल्य बहुत छोटा था। बहुत सस्ते में मिल गई चीज़।’ लेकिन जिसने नहीं चुकाया, उसको न चुकाने के कारण ही बड़ा डर सा लगता है। उसको लगता है, ‘बाप रे बाप! पता नहीं क्या हो जाएगा, पता नहीं क्या हो जाएगा, पता नहीं क्या हो जाएगा।’

तो मैं क्या जवाब दूँ बेटा आपकी बात का? आप कह रहे हो कि आर्थिक स्थितियाँ हैं या कई और कारण हैं जिसकी वजह से आपको आई.टी. जॉब करनी है और आपको परिवार की ज़रूरतों का ख़्याल रखना है। मैं आपके साथ हूँ। आप करिए, बिलकुल वही करिए जो आपको समझ में आता है। आपको अभी यही लग रहा है कि आपको अपनी और परिवार की ज़रूरतों का ख़्याल रखना है, तो आप रखिए। कोई पाप नहीं हो गया। बस इतना है कि जो ऊँची-से-ऊँची चीज़ आपको मिल सकती थी, वो नहीं मिलेगी — पर कोई ज़रूरी भी नहीं है कि मिले। आप इसलिए थोड़े ही पैदा होते हैं कि आपको मुक्ति मिल ही जाए। आप इसलिए पैदा होते हैं कि खाएँ, पीयें, मौज करें, एक दिन मर जाएँ। वो सब आपको भी मिल जाएगा। उसमें दिक़्क़त क्या है? तो मैं बिलकुल नहीं कह रहा हूँ कि पाप हो गया अगर आप एक साधारण जीवन बिता रहे हैं। जाइए, कोई कॉर्पोरेट जॉब करिए। उसमें भी कुछ सुख, कुछ दुख आते हैं, कुछ ऊँच, कुछ नीच। सुविधाएँ मिल जाती हैं। जीवन आराम से कट जाता है, ‘अपेक्षतया’। भीतर एक बेचैनी बनी रहती है। कहीं-न-कहीं पता रहता है कि ज़िन्दगी बर्बाद जा रही है, पर ठीक है। जब ऐसा लगे ज़िन्दगी बर्बाद जा रही है, तो जाकर शॉपिंग कर लो, मूवी देख लो। तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता। इसका तो बस मूल्य हो सकता है और मूल्य आपको चुकाना है। आप चुकाते हो तो चुकाइए, नहीं चुकाते हो तो मत चुकाइए। कोई ज़बरदस्ती आपसे नहीं करा सकता।

और प्रकृति में पाप-पुण्य जैसा कुछ होता नहीं। आप घटिया-से-घटिया जीवन जी रहे हों, तो भी ऐसा नहीं होगा कि हवा आपको ऑक्सीजन देने से इनकार कर देगी, सूरज आपको रोशनी देने से इनकार कर देगा, नदी आपको पानी देने से इनकार कर देगी। ऐसा कुछ नहीं होता। आप कैसा भी जीवन जी रहे हों, प्रकृति की नज़रों में सब एक बराबर हैं। बल्कि कई बार जो महापापी होते हैं, जिन्होंने एकदम घटिया जीवन जिया होता है, वो और लम्बा जीते हैं, नब्बे-नब्बे, सौ-सौ साल। और जिन दो चरित्रों का मैंने नाम लिया, उनमें से एक तेइस में, एक चालीस में चल बसे। तो प्रकृति बिलकुल नहीं चाहती है कि आप कोई ऊँचा रास्ता पकड़ें। ऊँचा रास्ता पकड़ोगे, तो बहुत तरह की तकलीफ़ें देगी प्रकृति। प्रकृति को ही माया कहते हैं। जो ऊँचा रास्ता पकड़ते हैं, अब वो नहीं हैं, तो आप उन्हें बहुत सम्मान दे लो, बहुत ऊँची-ऊँची उनके बारे में बातें कर लो। जब वो थे, तब आपने उनके लिए क्या कर लिया? कुछ नहीं कर लिया। जब वो रहते हैं, तब तो दुख ही भोगते हैं।

भगत सिंह जब मरे थे, तो उनके मरते ही उनकी लाश को किसी भारतीय ने ही सौ टुकड़ों में काटा और फिर एक बोरे में भरकर उनको ले जाया गया, अलग कहीं दूर जला दिया गया। ये हम उनके साथ व्यवहार करते हैं। जो पब्लिक प्रोसेक्यूटर (सरकारी वकील) थे, जिन्होंने ये निश्चित किया कि उन्हें फाँसी की सजा मिले, वो भारतीय ही तो थे। जो जज के सामने चिल्ला-चिल्लाकर बोल रहे थे, ‘इनको तीनों को सज़ा होनी चाहिए, फाँसी होनी चाहिए, फाँसी होनी चाहिए।’ सब भारतीय थे। तो जब वो ज़िन्दा रहते हैं, तो बहुत कष्ट मिलता है और बड़े दाम चुकाने पड़ते हैं। बोलो, मैं किस मुँह से आपसे कह दूँ कि आप वो रास्ता पकड़ो? वो रास्ता तो उनके लिए है जिनका हृदय उन्हें उस रास्ते पर ढकेल दे। मैं किस ज़िम्मेदारी से आपसे कह दूँ कि उस रास्ते पर चलो? बात कुछ समझ में आ रही है? क्योंकि कोई हल्की बात नहीं है। सीधे-सीधे जीवन दाँव पर लगाना पड़ता है।

और तब तो फिर भी आसान था, क्योंकि सामने स्पष्ट था कि कौन है जो आपको गुलाम बना रहा। आप उससे जाकर के भिड़ सकते हो, उनकी असेम्बली (विधानसभा) में बम डाल सकते हो। आज का समय तो और कठिन है। आज आपको जो ग़ुलाम बना रहा है, उसके चेहरे पर नक़ाब है, वो फ़ेसलैस (चेहराविहीन) है, अनाम। वो दूर कहीं छुपकर के आपको कठपुतली की तरह नचाता है। उससे लड़ना आज और मुश्किल और जोख़िम भरा है।

आपको जोख़िम उठाना है। मैं आपको कैसे कह दूँ कि जाओ और जोख़िम उठाओ? क्योंकि कल जो नुक़सान सहोगे, आप सहोगे। और फिर आप नुक़सान सहो और कहो कि ये इन्होंने मुझे बोलकर के ढकेल दिया, तो मैं क्या करूँगा फिर? ये काम तो उनके लिए है जो व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हों। जो कहें, ‘मेरा फैसला, मैंने लिया। अब अच्छा होगा तो अच्छा, बुरा होगा तो बुरा। जो होगा, मैं सहूँगा।’ क्रान्ति के पथ पर कैरियर गाइडेंस (आजीविका मार्गदर्शन) थोड़े ही मिलती है; या मिलेगी? कि कैरियर काउंसलिंग (आजीविका परामर्श) कराने गये हैं, ‘क्या साहब, क्रान्तिकारी बनना है। बनें कि नहीं बनें? स्कॉलरशिप मिलेगी क्या? क्रान्तिकारी बनना है, जीवन में कुछ ऊँचा करना है।’ ये काम कैरियर काउंसिलिंग के नहीं होते। ये काम एक जलते हुए दिल के होते हैं। जिसके पास हो, वो आगे बढ़े। जिसके पास नहीं हो, चुपचाप बैठा रहे। कौन आपको ज़बरदस्ती कर रहा है? बात आ रही है समझ में।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। मेरा सवाल ये है कि जैसे हम लोग अभी बात कर रहे हैं बाहर समाज में कुछ परिवर्तन करना है, लेकिन मुझे लगता है कि अभी मैं ही ख़ुद उन चीज़ों उतना सीखा या समझा नहीं हूँ जितना ज़रूरी है।

तो मैं बाहर परिवर्तन करूँ या ख़ुद का ज्ञान बढ़ाऊँ, साहित्य पढ़ूँ, दर्शन पढ़ूँ? ये पहला सवाल है, और दूसरा सवाल ये है कि जैसे आपने एक वीडियो में बात किया था कि प्लेटो की एक अवधारणा थी ‘दार्शनिक राजा’ की। तो जैसे जो दर्शन से सम्बन्धित लोग हैं, अध्यात्म से सम्बन्धित लोग हैं, उन लोगों को राजनीति में या फिर नौकरशाही में जाकर सिस्टम को बदलने की कोशिश करनी चाहिए या फिर बाहर से बदलाव करने की कोशिश करनी चाहिए?

आचार्य: नहीं। सिस्टम इसलिए थोड़े ही बना है कि तुम उसके अन्दर आकर के उसको बदल दोगे। कोई सिस्टम इसलिए निर्मित नहीं होता। सिस्टम में सेल्फ प्रिज़र्वेशन (आत्म-सरंक्षण) निहित होता है। तुम सिस्टम को ही अगर तोड़ने लग गये, तो सिस्टम बचा कहाँ ?

सिस्टम आपको अधिक-से-अधिक ये अनुमति दे सकता है कि आप सिस्टम को चमका दो, आप सिस्टम को सिस्टम द्वारा ही अनुमत तरीक़े से और आगे बढ़ा दो। लेकिन कोई व्यवस्था आपको ये अनुमति नहीं देगी कि आप उसको तोड़ दो। वरना वो व्यवस्था कैसी फिर? तो इस तरीक़े का जो आप लोगों का विचार होता है कि हम व्यवस्था के अन्दर जाकर व्यवस्था को बदल देंगे, ये बड़ा हास्यास्पद विचार होता है।

ये ऐसी सी बात है कि आप कहें कि, ‘मैं ट्रेन के भीतर बैठकर ट्रेन की स्पीड बदल दूँगा। मैं सिस्टम के भीतर बैठकर के सिस्टम बदल दूँगा। मैं ट्रेन के भीतर बैठकर ट्रेन की पटरी बदल दूँगा।’ बदल सकते हो? पर आपको यही लगता है, और ऐसा लगने के पीछे भी निहित स्वार्थ है। स्वार्थ ये है कि सिस्टम में चले जाओ न, सिस्टम इतनी सुख सुविधाएँ देता है, वो लेलो न; और साथ-ही-साथ ये कहने का गौरव भी बचा रहे कि हम यहाँ सिस्टम में मज़े मारने नहीं आये हैं, सिस्टम को बदलने आये हैं।

यू.पी.एस.सी. के साक्षात्कार मे हर व्यक्ति यही बोल रहा होता है। इसी तरह के झूठों से तो मैं ऊब गया था। मैंने कहा, ‘रहना ही नहीं इसमें।’ जिससे पूछो वो यही चल रहा होता है — ‘क्यों आ रहे हो?’

‘मैं सिस्टम मे रहकर के और बहुत कुछ बेहतर करने आ रहा हूँ।’ अरे! वो सिस्टम तुमने बनाया है क्या? तुम कौन हो उसको बदलने वाले? जिन्होंने बनाया, उन्होंने तुम्हें अनुमति ही नहीं दी है उसको बदलने की। तुम कैसे बदल लोगे?

ट्रेन में बैठकर के ट्रेन की पटरी बदल दूँगा। कैसे बदल लोगे भाई? हाँ, थोड़ा-बहुत कुछ कर सकते हो, इन्क्रीमेन्टल (अतिरिक्त)। उस थोड़े-बहुत से अगर तुमको तृप्ति हो जाती है, तो ठीक है। पर अगर कोई मूलभूत, फ़ंडामेन्टल बदलाव लाना चाहते हो, तो वो किसी व्यवस्था के भीतर रहकर के नहीं हो सकता।

हर व्यवस्था एक प्रकार की सोच से उठी है, और उस व्यवस्था के हारने में दोष उसी सोच का है। तुम्हें एक दूसरी सोच ही चाहिए। पुरानी सोच से तुम्हें आगे बढ़ना है। और पुरानी सोच से तुम्हें आगे बढ़ना है, तो पुरानी सोच से निर्मित व्यवस्था के भीतर रहकर के कैसे आगे बढ़ लोगे भाई? बोलो।

एक व्यवस्था है जिसकी डिज़ाइन ही है कि ये सौ से ज़्यादा की गति से आगे नहीं चलेगी। तुम उसके भीतर बैठकर के गति बढ़ा लोगे? तुम एक कार में बैठे हो। उसके सामने स्पीडोमीटर है। उसमें वो अधिकतम गति क्या दर्शा रहा है, कितनी होती है आमतौर पर? मान लो दो-सौ। और तुम कह रहे हो, ‘मैं इसके भीतर बैठकर के इसको छः-सौ पर उड़ा दूँगा।’ तुम कैसे उड़ा दोगे छः-सौ पर? उसका डिज़ाइन क्या है? मारे और जाओगे छः-सौ पर उड़ाओगे तो। ठीक है?

तो ये सब बाते थोड़ी सुनने में हीरोइक (वीरतापूर्ण) वगैरह लगती हैं, पर इनमें हीरोइस्म (वीरता) कम है और कम्फ़र्ट (आराम) ज़्यादा है; सोलैस (मन बहलाव) है, कॉन्सोलेसन (सांत्वना) है।

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