दम हो तो ही इधर आना || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं हंसराज कॉलेज का छात्र हूँ, कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट (संगणक विज्ञान विभाग) से। मेरे मन में एक प्रश्न है, जहाँ पर मैं दुविधा से भरा हुआ हूँ, कि मेरा इस बार अन्तिम वर्ष है और मैं कॉलेज से पास आउट हो (निकल) जाऊँगा। तो मेरी फैमिली ने मुझे यहाँ पर पढ़ाने के लिए काफ़ी संघर्ष किया है और मैंने भी काफ़ी संघर्ष किया यहाँ तक पहुँचने के लिए।
कॉलेज ख़त्म होने के बाद मैं एक आई.टी. कम्पनी ज्वाइन करने जा रहा हूँ नौकरी करने के लिए, जोकि मेरी इस समय की ज़रुरत है और मेरे परिवार की भी यही इच्छा है। मुझे भी इस विषय में काम करना पसन्द है। परन्तु जब मैं देखता हूँ कि इस तरीक़े से क्या मैं एक बड़े सोशल कॉज़ (सामाजिक सरोकार) के लिए काम कर पाऊँगा, तो मुझे ज़वाब यही मिलता है — जैसा आपकी और कई अन्य लोगों की बातें सुनकर मेरा अनुभव रहा है — कि सामाजिक सरोकार में आप अपने काम को उतने ज़्यादा प्रभावपूर्ण तरीक़े से नहीं कर पाएँगे। परन्तु मेरे पास अभी वर्तमान में और कोई चारा भी नहीं है इसके अलावा, तो मुझे आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए और मुझे अपने परिवार को आर्थिक रूप से सहारा भी देना है, जिस वजह से अल्पावधि में मुझे ये कार्य करना है।
परन्तु लम्बे समय में मैं सामाजिक सरोकार के लिए काम करना चाहता हूँ जिससे न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि समाज के लिए भी काफ़ी अच्छा कार्य कर सकूँ, जोकि एक असल मायने में सही काम होगा मेरे लिए। तो इस पर थोड़ा प्रकाश डालिए। आचार्य प्रशांत: देखिए, हम सबसे पहले तो एक शारीरिक इकाई हैं। एक फिज़िकल एन्टिटी (शारीरिक इकाई) हैं हम, और शरीर के रूप में हमारा जन्म दुनिया के लिए कुछ करने के लिए नहीं होता है। आप अपना शरीर लेकर के जन्मते हैं, तो ये आपके जन्म के साथ ही निश्चित होता है कि आप अपने लिए ही सबसे ज़्यादा चिन्तित रहेंगे और अपने ही हित या स्वार्थ के लिए काम करते रहेंगे। ठीक है?
सबसे पहले अपना शरीर आता है। फिर वो शरीर आ जाते हैं जिनसे आपका शरीर आया है, तो इसमें जो आपका परिवार है, वो आ जाता है। तो जब कभी आपको थोड़ी फ़ुर्सत मिलती है अपने शरीर के बारे में सोचने से, तो आपको सोचना शुरू करना ही पड़ेगा उन लोगों के बारे में जो आपके परिवार के लोग हैं। ये भाग्य लेकर के पैदा होता है हर जीव। आप जिस दिन पैदा होते हैं, उसी दिन ये निश्चित हो जाता है कि आपको सब कुछ अपनी ही खातिर, अपने ही छोटे-छोटे स्वार्थों की ख़ातिर करना पड़ेगा। ये बात हमारे शरीर में है, हमारे डी.एन.ए. में लिखी हुई है। इसी चरित्र के साथ प्रकृति ने हमें पैदा करा है।



