शिवलिंग निराकार ब्रह्म और साकार सत्य दोनों का प्रतीक है। यह प्रकृति के मध्य अचल और अकंप चेतना का द्योतक है। इस्लामी आक्रान्ताओं और पाश्चात्य विद्वानों ने इसे अश्लील अर्थों में प्रचारित किया, जिससे हम अपने अध्यात्म से दूर हो गए। शिवलिंग का सन्देश है कि संसार में घिरे रहते हुए भी भीतर की चेतना को अकंप और स्वतंत्र बनाए रखें।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Lokdesh
लिंग का जो आध्यात्मिक अर्थ है वो प्रतीक और प्रमाण दोनों होता है। लिंग माने प्रतीक और लिंग माने प्रमाण और इन्हीं दोनों अर्थों के कारण शिवलिंग पूजनीय होता है। एक अर्थ में शिवलिंग द्योतक होता है निराकार सत्य का, वेदों में, अथर्ववेद में स्तंभ का उल्लेख आता है, स्तंभ माने खम्भा और किस अर्थ में स्तंभ का उल्लेख आता है? संभालने वाले के अर्थ में। कि जैसे एक खम्भा होता है उस पर आप काफी कुछ टिका सकते हैं, एक खम्भा होता है वो सहारा बनता है, अवलंब बनता है।
उसपर टिककर खड़े हो सकते हो, उससे कुछ बाँध सकते हैं। उस अर्थ में कहा जाता है, कि ब्रह्म एक स्तंभ की भाँति है, सत्य एक स्तंभ की भाँति है, पूरा संसार ही उसपर आश्रित है। प्रतीक पर है 'स्तंभ'। वही जो स्तंभ है वो आगे चलकर के शिवलिंग हो गया, निराकार ब्रह्म का प्रतीक।
अब इतना पुराना ये प्रतीक है शिवलिंग कि मोहनजोदड़ो की खुदाई हुई वहाँ से भी बहुत सारे शिवलिंग मिले। तो आप समझ लीजिए कि कम-से-कम पाँच से छह हजार साल पुराने शिवलिंगों के तो प्रमाण ही मिलते हैं। कि आप अगर वेदों को लें या शैव मत वालो को लें या लिंगायत मत वालो को लें सबकी थोड़ी-थोड़ी अपनी-अपनी अलग-अलग मान्यताएँ हैं शिवलिंग को लेकर के। पुराण कहानियाँ बताते हैं, उनमें मान्यताएँ नहीं हैं। तो शिव-पुराण में कुछ कहानियाँ हैं, लिंग पुराण में कुछ कहानियाँ हैं।




