Lokdesh
18 Feb '23

क्यों की जाती है शिवलिंग की पूजा

Acharya Prashant

10 min
1.6k reads
क्यों की जाती है शिवलिंग की पूजा
शिवलिंग निराकार ब्रह्म और साकार सत्य दोनों का प्रतीक है। यह प्रकृति के मध्य अचल और अकंप चेतना का द्योतक है। इस्लामी आक्रान्ताओं और पाश्चात्य विद्वानों ने इसे अश्लील अर्थों में प्रचारित किया, जिससे हम अपने अध्यात्म से दूर हो गए। शिवलिंग का सन्देश है कि संसार में घिरे रहते हुए भी भीतर की चेतना को अकंप और स्वतंत्र बनाए रखें। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

Originally published in Lokdesh

लिंग का जो आध्यात्मिक अर्थ है वो प्रतीक और प्रमाण दोनों होता है। लिंग माने प्रतीक और लिंग माने प्रमाण और इन्हीं दोनों अर्थों के कारण शिवलिंग पूजनीय होता है। एक अर्थ में शिवलिंग द्योतक होता है निराकार सत्य का, वेदों में, अथर्ववेद में स्तंभ का उल्लेख आता है, स्तंभ माने खम्भा और किस अर्थ में स्तंभ का उल्लेख आता है? संभालने वाले के अर्थ में। कि जैसे एक खम्भा होता है उस पर आप काफी कुछ टिका सकते हैं, एक खम्भा होता है वो सहारा बनता है, अवलंब बनता है।

उसपर टिककर खड़े हो सकते हो, उससे कुछ बाँध सकते हैं। उस अर्थ में कहा जाता है, कि ब्रह्म एक स्तंभ की भाँति है, सत्य एक स्तंभ की भाँति है, पूरा संसार ही उसपर आश्रित है। प्रतीक पर है 'स्तंभ'। वही जो स्तंभ है वो आगे चलकर के शिवलिंग हो गया, निराकार ब्रह्म का प्रतीक।

अब इतना पुराना ये प्रतीक है शिवलिंग कि मोहनजोदड़ो की खुदाई हुई वहाँ से भी बहुत सारे शिवलिंग मिले। तो आप समझ लीजिए कि कम-से-कम पाँच से छह हजार साल पुराने शिवलिंगों के तो प्रमाण ही मिलते हैं। कि आप अगर वेदों को लें या शैव मत वालो को लें या लिंगायत मत वालो को लें सबकी थोड़ी-थोड़ी अपनी-अपनी अलग-अलग मान्यताएँ हैं शिवलिंग को लेकर के। पुराण कहानियाँ बताते हैं, उनमें मान्यताएँ नहीं हैं। तो शिव-पुराण में कुछ कहानियाँ हैं, लिंग पुराण में कुछ कहानियाँ हैं।

फिर आधुनिक समय में प्राच्य विद्या विशारद हुए तो उनको जैसा अपनी पाश्चात्य दृष्टि से समझ में आया तो उन्होंने कह दिया- नहीं, ये शिवलिंग तो वास्तव में मानवीय लिंग का ही रूप है, और ये जिस पीठ पर स्थापित है वो मानवीय योनि मात्र है। तो बहुत तरह की उसमें कहानियाँ बना दी गई, प्रचारित कर दी गई लेकिन जो कुल मूल बात है वो ये है कि शिवलिंग निराकार और साकार सत्य दोनों का एक साथ प्रतिनिधित्व करता हैं। निराकार सत्य का इस रूप में कि वो अवलंबन है। याद रखो उसको जो अवलंबन है-अवलंबन माने सहारा-याद रखो उसको जिसके सहारे ये पूरी दुनिया खड़ी हुई है।

जैसे आप एक खम्बे को प्रतीक बना लें कि ये और कोई भी प्रतीक हो सकता था, ये एक बस बात है कि एक स्तंभ को आपने प्रतीक बना लिया। तो इसके सहारे पूरी दुनिया चल रही है, निराकार के सहारे सब साकार चल रहा है। दूसरे तल पर अर्थ हुआ कि पुरुष है जो प्रकृति के बीचों-बीच शांत, स्थिर बैठा हुआ है। योनि प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती है और लिंग पुरुष का। तो इन्हीं दोनों के संयोग से सारी सृजनात्मक शक्ति है।

लेकिन इन दोनों का संयोग इस तरीके से है कि समस्त प्रकृति के मध्य भी पुरुष अस्पर्शित है, अचल है और इसीलिए वो पूजनीय है। जो निराकार को पूजना चाहें उनके लिए शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है, जो साकार को पूजना चाहें उनके लिए शिवलिंग प्रकृति और पुरुष के समुचित संयोग का प्रतीक है। जब आप शिवलिंग को नमन कर रहे हो तो वास्तव में आप पुरुष को अर्थात चेतना को नमन कर रहे हो।

आप ऐसी चेतना को नमन कर रहे हो जो है तो प्रकृति के मध्य लेकिन फिर भी अपनी स्वतंत्र सत्ता अक्षुण्ण रखे हुए है। वो प्रकृति में लीन या लिप्त नहीं हो गया, वो वहाँ होते हुए भी अलग है। वहाँ होना तो अनिवार्यता है। संसार में चेतना का होना हमेशा संसार के बीचों-बीच ही होगा, इंसान में चेतना का होना हमेशा इंसानी शरीर के बीचों-बीच ही होगा। तो वो तो अनिवार्यता है।

प्रकृति नहीं तो पुरुष नहीं और जीव नहीं तो जीव की चेतना नहीं लेकिन प्रकृति के होते हुए भी, शरीर के होते हुए भी आपकी जो चेतना है वो शिवलिंग की भाँति ही अटल रहे, अचल रहे, उसमें कोई कम्पन नहीं हो रहा है, उसमें कोई राग-द्वेष, कोई लहरें नहीं उठ रही हैं इसलिए शिवलिंग पूजनीय है। तो चाहो तो उसको निराकर सत्य मान लो और चाहो तो उसको अर्धनारीश्वर का प्रतीक मान लो, चाहो तो उसको निर्गुण ब्रह्म का प्रतीक देख लो और चाहो तो उसको इस बात का प्रमाण मान लो कि इस सगुण दुनिया में भी चेतना अक्षुण्ण रह सकती है। और शिवलिंग ऊँचे सत्य का द्योतक है।

प्रतीकों का अर्थ करते समय दो बातों से बचना चाहिए। पहली बात ये कि कोई अर्थ किया ही नहीं और प्रतीक को ही सत्य समझ लिया। और दूसरा, कि जो उसमें अर्थ निहित है ही नहीं तुमने वो भी निकाल लिया। ये जो अति है, अतिरिक्त अर्थ करने की, इससे बचना जरूरी है क्योंकि आप अतिरिक्त अर्थ, अतिशय विवेचना करते ही इसीलिए हो ताकि जो सीधी, सरल, प्रत्यक्ष बात है उससे बच सको। सीधी बात ये है कि संसार में रहना है लेकिन संसार से अस्पर्शित रहकर। और इस बात से थोड़ा हमें और बचना है। देखिए जिन लोगों को समझ में नहीं आया कि शिवलिंग किस चीज का प्रतीक है उन्होंने बहुत अपमान किया है उसका और वो जो अपमान है वो बहुत हद तक आज के जो पढ़े-लिखे सनातनी हिन्दू हैं उन्होंने भी स्वीकार कर लिया है।

अब इस्लाम में उदाहरण के लिए मूर्ति-पूजा का निषेध है। तो जब इस्लामी आक्रांता भारत आए, उन्होंने जगह-जगह शिवलिंग को देखा तो उन्होंने लोगों से पूछा, 'ये क्या चीज है?' अब उसमें जो गूढ़ और सुक्ष्म अर्थ निहित है वो तो समझाने वाले ना समझा पाए, समझने वाले ना समझ पाए। उनको तो बस ये लगा कि ये जो लिंग है ये जैसे पुरुषों के शरीर में लिंग होता है वैसा लिंग है और ये लिंग जिस चीज पर आरूढ़ है, स्थापित है वो स्त्री के शरीर में जैसी योनि होती है वैसी ही योनि है। तो उन्होंने कहा कि 'ये तो गंदी भद्दी चीज है, इसको तोड़-ताड़ दो।' तो शिवलिंग खूब तोड़े गए और चूँकि वो चीज गंदी और भद्दी मानी गई तो इसीलिए उसको तोड़कर के फिर उनकी जगह पर नई इमारतें खड़ी की गई या नए पूजा स्थल खड़े किए गए, मस्जिदें वगैरह खड़ी की गई।

और फिर भारत में अंग्रेज आए। उन्होंने कहा कि कि ये भारतीय दर्शन क्या है, भारतीय धर्म क्या है। तो फिर प्राच्य विद्या विशारद आए जिनका काम यही था कि जाओ और इनके ग्रंथों को पढ़ो, इनके प्रतीकों और इनकी सभ्यता को देखो। तो उन्होंने और शोर मचाया, उन्होंने कहा कि 'यहाँ तो अश्लीलता बहुत है, ये देखो ये जिन देवता की सबसे ज्यादा पूजा करते हैं वो ही लिंग के रूप में पूजे जाते हैं।' अब वहाँ जो विक्टोरियन मोरालिटी थी पश्चिम में उसके लिए ये बात बहुत विचित्र थी और अस्वीकार्य थी कि लिंग की पूजा हो रही है। तो उन्होंने जो पढ़ा-लिखा भारतीयों का वर्ग था उनके सम्पर्क में, उनमें ये भावना डाल दी कि 'देखो तुम्हारा तो जो पूरा अतीत ही है वो अश्लिलता से भरा हुआ है।'

और वो बात, वो झूठा सिद्धांत, वो एकदम हास्यास्पद जो मान्यता है वो आजतक न सिर्फ चली आ रही है बल्कि बहुत लोगों में वो फैल गई । हमारा हमारे वास्तविक अध्यात्म से बहुत कम संबंध रह गया है, वेदांत से हमारा कोई परिचय नहीं। हम रूढ़ियों, प्रथाओं, परम्पराओं में जी रहे हैं बिना उनका अर्थ जाने। हम प्रतीकों की अंधी पूजा कर रहे हैं बिना ये समझे कि ये प्रतीक इशारा किधर को कर रहा है। वो बहुत ऊँची जगह की ओर इशारा कर रहा है पर उस ऊँची जगह से हमें कोई सम्बन्ध नहीं, प्रेम नहीं। उसका ये नतीजा निकलता है कि बहुत लोग होते हैं फिर जो अध्यात्म से अपनी निष्ठा खोते जाते हैं और जो लोग धर्म के साथ जुड़े भी रह जाते हैं वो सिर्फ अंधभक्ति में जुड़े रह जाते हैं। उन्हें समझने से कोई मतलब नहीं होता, वो बस पुरानी परम्पराओं को रटकर दोहरा रहे होते हैं।

अगली बार जब आप शिवलिंग को देखें तो और कुछ आप समझते हों या ना समझते हों, ये ध्यान रखें कि, 'मुझे भी ऐसे ही अकंप, निश्चल, तन कर खड़ा रहना है दुनिया के आवेगों के बीच, संसार के थपेड़ों के बीच, संसार के आकर्षण-विकर्षण के बीच। दुनिया मुझे ऐसे ही चारों तरफ से घेरे रहेगी (जैसे शिवलिंग घिरा रहता है) ऐसे ही घेरे रहेगी और मैं यहाँ से छूट कर भाग नहीं सकता, घिरा हुआ हूँ घिरा ही रहूँगा लेकिन घिरे-घिरे भी अपनी शान में तना खड़ा रहूँगा।'

घिरे रहना तो उसी दिन तय हो गया था जिस दिन पैदा हुए थे। जिस दिन तुम पैदा हुए थे उसी दिन वेदांत कहता है कि आत्मा पाँच कोषों से घिर गयी थी। कहते हैं सत्य अनंत है, आत्मा अनन्त लेकिन तुम पैदा हुए नहीं कि जो अनंत है वो भी एक नहीं पाँच कोषों से घिर जाता है, ये कैसे ह सकता है? यही तो माया है कि जो अनंत उसके ऊपर भी कुछ बिलकुल छिलके की तरह चढ़ जा रहा है। तो जो मुझे घेरे हुए है उससे पीछा छुड़ा नहीं सकता। हाँ, उसका रूप-रंग बदल सकता है ज्यादा मैं हाथ-पैर चलाऊँगा तो, पर उससे हमें कोई सांत्वना नहीं।

हमें इस बात की कोई आशा नहीं है, हम ऐसी कोई गलतफहमी नहीं है कि एक भी दिन ऐसा आने वाला है कि हम शरीर धरे-धरे भी पूर्णतया मुक्त हो जाएँ। अरे, शरीर से थोड़े हैं मुक्त हो गए, पूर्णतया मुक्त कैसे हो जाओगे शरीर घरे-धरे? तो वो जो योनि ने एक परीधि स्थापित कर रखी है, जो एक घेरा डाल रखा है वो त रहेगा-ही-रहेगा लेकिन तुम्हें उसके बीच भी अपना शिवत्व कायम रखना हैं, तुम्हें उसके बीच भी अपना सत्य कायम रखना है।

अगर शिवलिंग आपके भीतर ऐसी भावना, ऐसा विचार प्रेरित कर देता है तब तो समझिए कि आपका लिंग के समक्ष जाना सफल हुआ अन्यथा अगर आ वहाँ जाकर के वो परिक्रमा कर रहे हैं और दूध चढ़ा रहे हैं और प्रणाम कर रहे हैं तो इससे किसी को कोई लाभ नहीं होने वाला।

भारत में धर्म दर्शन से उठा है। 'दर्शन' माने समझदारी, विचारणा। विचार इतनी दूर तक गया और इतना गहरा गया है कि वो निर्विचार में बदल गया है। विचार इतना गहरा गया है कि वो जिंदगी में, जीवन में बदल गया है। सोच इतनी ईमानदार रही है कि इंसान को उसको जीना पड़ा है कि जब इतना सोच लिया, इतनी गहराई तक बात चली गई तो जो सोचा है उसको तो अब जीना भी तो पड़ेगा। तो बिना सोचे, बिना समझे अगर आप धर्म का पालन करने निकले हैं तो आपका धर्म कोई धर्म नहीं। भारत में 'धर्म' का मतलब विश्वास नहीं है, मान्यता नहीं है।

Originally published in Lokdesh

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories