जो सफल लगते हैं, वो कितने सफल हैं? || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू

आचार्य प्रशांत: सही लक्ष्य क्या होता है? सही लक्ष्य वो होता है जो आपके भीतर की कमज़ोरियों को तोड़े। आपके भीतर जो कुछ ऐसा है कि ख़त्म होना चाहिए, लक्ष्य बनाओ जो उसे ख़त्म ही कर दे। मेरे ख़याल से कार्ल जंग का है — या आप लोग जाँच लीजिएगा कि ये उक्ति है किसकी — कुछ ऐसा है कि व्हेयर योर फ़ीयर इज़, देअर इज़ योर टास्क (तुम्हारा काम वहीं पर है जहाँ तुम्हारा डर है)।
तो पहले क्या देखना है? कि मेरे भीतर का डर, माने मेरी कमज़ोरी, मेरी गन्दगी, मेरे झूठ, ये सब कहाँ पर हैं। और उनको देख लिया, तो उससे निर्धारित हो जाता है कि तुम्हारा काम कहाँ पर है, वही लक्ष्य बनेगा। काम वो चुनना है जो तुम्हारे भीतर की कमज़ोरियों को तोड़ दे। ठीक है?
अब आते हैं ‘सफलता’ पर। सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि आपने अपने लक्ष्य की तरफ़ क़दम किन चुनौतियों का सामना करते हुए बढ़ाया है। आपके सामने दिक्क़तें क्या थीं, किन दिक्क़तों के ख़िलाफ़ आपने अपनी यात्रा करी है, वो चीज़ तय करेगी कि आप सफल हैं कि असफल हैं।
बात समझ रहे हो?
उदाहरण दे देता हूँ — सिर्फ़ समझाने के लिए है उदाहरण, मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि आइआइटी में प्रवेश पाना जीवन का सबसे ऊँचा लक्ष्य है, पर कुछ समझाना है इसलिए दे रहा हूँ। जब आइआइटी पहुँचा तो ये देखकर हैरानी हुई मुझे कि इतने सारे दिल्ली वाले क्यों हैं यहाँ पर। देश की जनसंख्या का कुल डेढ़ प्रतिशत बहुत कहोगे, एनसीआर ले लोगे पूरा तो दो प्रतिशत रहता है दिल्ली में, एनसीआर में। लेकिन उन्नीस-सौ-पंचानवे में आइआइटी के बीटेक बैच में कुछ नहीं तो पन्द्रह प्रतिशत, बीस प्रतिशत, शायद पच्चीस प्रतिशत दिल्ली वाले थे।
इतने सारे हैं, और उनमें से बहुतों की रैंक



