
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।


भक्ति शुरू ही होती है आत्म-आलोचना से, और इस दृढ़ विश्वास के साथ कि यह जितनी बुराइयाँ हैं, यह समाप्त हो सकती हैं। जो अच्छे-से-अच्छा है वह दूर सही, पर प्राप्य है। मिलेगा! तो भक्त एक बड़ी विचित्र बात कहता है। कहता है कि मुझसे बुरा कुछ नहीं; जितनी भर बुराइयाँ थीं वह सब इकट्ठी होकर मुझमें आ गयी हैं। जो कुछ भी अच्छा है, ऊँचा है, शुद्ध है, पावन है, वह मेरे भगवान में निहित है। और साथ ही साथ वह यह भी कहता है कि इतना अंतर होते हुए भी उस भगवान को पा लूँगा मैं।

भक्त पूरी सावधानी रखता है कि वो अपने ऊपर किसी भी तरह का भरोसा न कर बैठे। वो आख़िरी काम है जो उसे करना है, क्या? ख़ुद पर भरोसा; अपनी ही ताक़त या अपने निर्णय पर भरोसा। भक्त कहता है, ‘ये नहीं करना है क्योंकि यही कर-कर के तो अपनी दुर्गति करी है।’ तो भक्त कहता है, ‘अब मेरे सारे निर्णय कौन करेगा? मेरा भगवान करेगा। रास्ता कौन बताएगा? भगवान बताएगा।’



आचार्य प्रशांत: “घूॅंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।” मन के कुछ सिद्धान्त हैं जो इससे एकदम सामने आते हैं उनको समझ लेना है। पहला, प्रत्येक प्राणी प्रेमी है प्राण माने प्रेम; अज्ञान में प्रेम की ही ऊर्जा कुछ और बन जाती है। कुछ और क्या? कामना, भय, ईर्ष्या,




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। वीडियो पर एक कमेंट है। उससे एक प्रश्न है। नाम तो नहीं लिखा है, इनके

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आज अवधूत गीता के बारे में पढ़ा तो पता चला कि उसमें तो गुण और निर्गुण दोनों से परे की बात की गयी है। पर जहाँ मैं हूँ, द्वैत में ही हूँ। तो मुझे अवधूत गीता कैसे मदद कर सकती है? मैं क्या सीख सकती हूँ,…


मुगलां ज़हर प्याले पीते, भूरियां वाले राजे कीते, सब अशरफ़ हिरन चुक कीते, भला उन्हानूं झड़िया ए, रहो-रहो वे इश्क़ मारया ए, कहो किसनूं पार उतारआ ए। ~ बाबा बुल्लेशाह जी
अर्थ: मुगलों ने ज़हर के प्याले पिये हैं। । कम्बलधारियों को राजा बनाया गया है। सभी शरीफ़ लोग चुपचाप…






प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी मेरा प्रश्न यह है कि मैंने कुछ पुस्तकों में पढ़ा है कि बुद्ध, महावीर जैसे व्यक्तियों ने ईश्वरीय तत्व को फील (अनुभव) किया है। क्या यह सच है? क्या हम भी कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: क्या पूछ रहे हो? पी लिया माने क्या?…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जब मन को देख रहा हूँ, वो भी मन का ही हिस्सा है। तो क्या वो देखना केवल एक विधि है बोध तक जाने की?

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज जो भजन सुना, मुझे उस बारे में पूछना था कि क्या यह विधि है? अगर यह एक विधि है तो क्या हमें इसी को

प्रश्नकर्ता: सर, क्या भक्ति सुमिरन है, क्या इसमें ध्यान लगाना चाहिए, भक्ति कैसे करनी है? कई लोग कहते हैं कि आप ध्यान में बैठोगे, वो भक्ति है; या आप सुमिरन कर लोगे, वाहे गुरु, वाहे गुरु जाप कर लोगे, वो है। आप राम-राम कर लो वो है या आप ओम्-ओम्…

आचार्य प्रशांत: “मनै सुरति होवे मनि बुधि।”

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न भक्ति को लेकर है। हमने बचपन से यही सीखा है कि भक्ति ज्ञान की माता है। भक्ति का अर्थ सगुण भक्ति, लेकिन आपने हमें समझाया है कि जानने से प्रेम भक्ति है। तो असल में भक्ति का क्या अर्थ है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके सत्संग, सेशन (सत्र) होते हैं, मन तो यह करता है कि यहीं रहें, लेकिन कार्य और यहाँ में सामंजस्य इसको कैसे बैठाएँ? वहाँ से (जॉब से) तो ये होता है कि भाग लो।




आचार्य प्रशांत: (आरती लेते हैं)

आचार्य प्रशांत: हम लगातार इसी आधार पर ज़िंदा हैं कि बाहर जो कुछ है, वो असली है। हमारी पहचान, हमारे रिश्ते-नाते, रूपया-पैसा यह सब कुछ जो बाहर है, वो असली है।

लोकोऽपि तावदेव भोजनादि- व्यापारस्त्वाशरी रधारणावधि।।१४

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भजन करते समय मन बहुत शांत हो जाता है पर भजन के समाप्त होते ही यह फिर अशांत होना शुरू हो जाता है। भजन हमेशा कैसे साथ रखूँ?
आचार्य प्रशांत: अंदर भोजन है न! मज़ाक भर की बात नहीं है। भोजन माने वही नहीं होता जो मुँह…

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल है कि श्रद्धा और अंधविश्वास में क्या अंतर है? आपने हमेशा ये सिखाया है कि चीज़ों को बस यूँ ही मान नहीं लेना है। उनको

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से ही संतों का सानिध्य मिला है। मौसी थी हमारी, उनके साथ रहे और उनकी वज़ह से बचपन से ही उस ओर झुकाव हो गया। और बौद्धिक स्तर भी काफ़ी अच्छा हो गया। और धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा सत्संग का पता चला, सत्संग में आने-उठने लगे तो साधना

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। सर्वप्रथम कोटी-कोटी धन्यवाद और आभार, मुझे एक नयी दिशा और ज़िंदगी देने के लिए। जीवन में अब हल्का महसूस करता हूँ। छोटी-छोटी बातें अब उतना परेशान नहीं करती और इसी दिशा में कार्यरत हूँ कि इसी पथ पर आगे बढ़ता जाऊँ।

आचार्य प्रशांत: यहाँ खेल उल्टा है, पता नहीं इसमें भक्त कौन है, भगवान कौन है। आप खड़े हुए हो अकड़कर, तनकर (कमर पर दोनों हाथ रखकर अकड़ने का संकेत करते हुए)। और वह जिसको भगवान कहते हो, सत्य कहते हो, वह एक घुटने पर झुका हुआ है आपके सामने और…

प्रश्नकर्ता: ज्ञान मार्ग पर चलें या भक्ति मार्ग पर, कौनसा मार्ग श्रेष्ठ है?
आचार्य प्रशांत: ये जो मार्ग रहे हैं परंपरागत रूप से, ये दो अलग-अलग तरह की मानसिकताओं के लिए रहे हैं। बदलाव हम सभी चाहते हैं। चाहते हैं न? बदलाव हम सभी चाहते हैं पर बदलाव चाहने के…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी तो लगता है ईश्वर पर भरोसा रखो, वह सब ठीक कर देगा, लेकिन यह भरोसा मैं हमेशा क्यों नहीं रख पाती?


योग से, साधना से, विद्या से, तपस्या से, जो प्राप्ति दुष्कर है, वह भक्ति से सहज ही हो जाती है।
~ बाणी महला
आचार्य प्रशांत: 'बाणी महला' का पाठ किया है प्रश्नकर्ता ने। और फिर वहाँ से जिज्ञासा करी है। एक पद है, जो कहता है कि “योग से, साधना


आचार्य प्रशांत: जब तुम कह रहे थे 'जय गंगा मैया की', कितने लोग वास्तव में गंगा मैया के प्रति नतमस्तक थे? कितने लोग वास्तव में भक्तिभाव से बोल रहे थे ये? भक्ति का मतलब समझते हो? ‘भगवान में ही मिल जाऍं।‘ 'जय गंगा मैया की' बोलने का अर्थ हुआ कि…
कुछ काम करोगे, कुछ पसीना बहाओगे या सन्तों की वाणी सुनकर के ही तर जाओगे? सन्तजन तुमसे कोई सुनी-सुनायी बात कह रहे हैं? उन्होंने अपने जीवन की कीमत अदा करी है, पूरे जीवन की कुरबानी दी है, पूरी ज़िन्दगी लगायी है। तब वो, वो बात कह पाये हैं जो उन्हें समझ में आयी है। एक ज़िन्दगी होती है उससे फिर सन्त की वाणी उठती है। चूँकि उसने जीवन ऐसा जिया है। ‘अभ्यास’ पर इसीलिए इतना ज़ोर दिया जाता है न। कुर्बानी पर तभी इतना ज़ोर दिया जाता। और ये सब एक ही बात है — अभ्यास, कुर्बानी, समर्पण, तपस्या, साधना। इन सबको एक ही दिशा का मानना।
आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम सारे योग के विद्यार्थी हैं और योग का दुनिया में बोल-बाला है। योग के विद्यार्थियों के लिए आपका क्या मार्गदर्शन है? वास्तविकता में योग क्या है?
आचार्य प्रशांत: खंडित मन दुख है और केन्द्र से विस्थापित मन दुख है, दोनो बातें समझनी होंगी।
आमतौर पर मन…
प्रश्नकर्ता: कबीर साहब ने एक पंक्ति में कहा है कि "कर स्वास की सुमिरनी, जपो अजपा जाप।" तो इस पर प्रकाश डालिए।
आचार्य प्रशांत: ऐसे ही हैं हमारे साहब! निरंतर सुमिरन बना रहे। स्वास माने प्राकृतिक देह। जब तक देह है जैसे-जैसे साँस है, वैसे-ही-वैसे सुमिरन भी होना चाहिए। कोई…
निर्पंथी को भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान। निर्द्वंद्व को मुक्ति है, निर्लोभी निर्वाण।। ~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: चार हिस्से हैं इसके, चारों को अलग-अलग बोलिए। एक आदमी पहले एक ही बोले, फिर अगला दूसरा।
"निर्पंथी को भक्ति है" — क्या अर्थ हुआ?
प्रश्नकर्ता१: सर, यहाँ निर्पंथी से अर्थ होता…
प्रश्न है, आचार्य जी, आपके बहुत सारे वीडियो में मैनें देखा कि आप जीवन के प्रति काफ़ी नकारात्मक सोच रखते हैं। आपने एक वीडियो में…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सपनों में या ध्यान में किसी भी भगवान के दर्शन हो जाने को बड़ा महत्व दिया गया है, लोगों को ध्यान में शिव दिखते हैं और ऐसी बहुत कहानियाँ और भी प्रचलित हैं, ये सब क्या है कृपया स्पष्ट करें?
आचार्य प्रशांत: और शिव का भी वही…
आचार्य प्रशांत: भक्ति का मतलब होता है ये अनुभव, पीड़ा, निश्चित धारणा कि जो कुछ अच्छा है, ऊँचा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूर छिटक आये हैं — पहली बात। जो कुछ ऊँचा है, अच्छा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूरी बन गयी है — कोई होगी वजह,…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आजकल नवरात्रि के दिन चल रहे हैं। और मैं देख रहा हूँ कि बहुत समय से जितने विडियोज़ हैं उनपर नवरात्रि से जुड़े प्रश्न आ रहे हैं लोगों के। उसमें से एक प्रश्न था जो मुझे लगा कि काफ़ी ज़रूरी है आपके सामने उसे रखना। और…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्र: जब मैं कुछ लोगों को सुनता हूँ, जैसे कुछ ज्ञानी लोग, वो लोग बात ये कहते हैं कि आज-कल के युवाओं में हो चाहे जो भी लोगों में, जीवन जिस तरह से वो जिये हैं उनको उनके जीवन में।
आचार्य: आप थोड़ा…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, "इक अलफ़ पढ़ो छुटकारा ए।"
बाबा बुल्लेशाह जी कहते हैं कि बस अल्लाह का नाम लो, उसी में मुक्ति है। जबकि आदि शंकर जी कहते हैं कि दुख का मूल कारण ही अज्ञान है और अज्ञान नेति-नेति से ख़त्म होता है। और बाबा बुल्लेशाह जी कह…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। महाभारत में हम देखते हैं कि युद्ध से पूर्व अर्जुन को आत्यन्तिक पीड़ा होती है अपने सगे-सम्बन्धियों के विरुद्ध युद्ध करने में। उनका मन शोक से भर जाता है, वो नहीं चाहते हैं युद्ध करना। वहीं उनके दूसरे भाई — युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव — तैयार…
विणु गुण कीते भगति न होई। अर्थ: बिना गुण के भक्ति नहीं हो सकती। (जपुजी साहिब)
आचार्य प्रशांत: आप दीवार के पास बैठे हैं और आप ऊँघ जाते हैं और आपके सिर पर दीवार लगती है ज़ोर से। क्या आप दीवार से कहते हो कि कमीनी मेरे ही घर की…
प्रश्नकर्ताः तुलसीदास जी ने कहा है : 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू, राम नाम अवलंबन एकू।' आपका भी वीडियो सुना जहाँ कहीं भी राम नाम का शीर्षक मिला कि राम नाम एक ऐसी चीज़ है जो निराकार और साकार दोनों के बीच का है। तो मैं बच्चों को ये…
आचार्य प्रशांत: जी, स्वागत है! बताइए।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। कल मेरी एक ऑनलाइन प्रतिभागी सोमेश जी से बात हो रही थी, तो मैंने पूछा कि आज की कार्यशाला के लिए उनका प्रश्न क्या है। एक अजीब-सी बात उन्होंने कही कि आचार्य जी ने गीता पर जो चर्चा करी है उससे…
आचार्य प्रशांत: शोभित हैं, कह रहे हैं, 'पूरे दिन में खेलना ही अच्छा लगता है। खेलते समय कोई बहाना नहीं मारता और अगर दिमाग़ में कोई बहाना आता भी है तो भी मैं खेलने लग जाता हूँ। खेल में ऐसा क्या है?'
खेल में कुछ विशेष नहीं है पर खेल…
आचार्य प्रशांत: तुमने इतनी फ़िल्में देखी होंगी, तुम्हें डायलॉग (संवाद) कितनों के याद हैं? और तुम्हें…
आचार्य प्रशांत: माइ मास्टर गेव मी जस्ट वन रूल — ‘फॉर्गेट द आउटसाइड, गो टू द इनसाइड ऑफ थिंग्स’। आइ, लल्ला, टुक दैट टीचिंग टू हार्ट। ऑन दैट डे आ हेव डांस्ड नेकेड। (मेरे गुरु ने मुझे मात्र एक नियम दिया, 'बाहर को भूलो, चीज़ों के भीतर को जाओ'। मैं,…
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य प्रशांत: आप इधर आएँगे या नहीं, यह तो आपकी स्वेच्छा है। आप…
आचार्य प्रशांत: ज्ञान योग यही बताता है आपको कि ज्ञान कितना व्यर्थ है। और क्या करेगा ज्ञान योग! भक्ति योग क्या है? भक्ति योग शुरू होता है विभाजन से। भजना माने बाँटना। और अंत कहाँ होता है उसका?
प्रश्नकर्ता: मिलने में।
आचार्य: मिल जाने में, एक हो जाने में। ज्ञान…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। सात महीने पहले ही अध्यात्म से परिचय हुआ। उसके पहले जीवन में कुछ भी नहीं था। अध्यात्म के जीवन में आने का कारण है कि उसके छः महीने पूर्व तक मौत की चिंता से ग्रस्त रहता था, पैनिक अटैक्स आ जाते थे। तो फिर बहुत इलाज…
प्रश्न: मनुस्मृति से संबंधित सवाल पूछा गया है।
नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि । धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च । ।
“भक्षण करने योग्य प्राणियों को प्रतिदिन खाने वाला किसी दोष से ग्रस्त नहीं होता;क्योंकि इस लोक में खाने वालों और खाए जाने वाले लोगों की रचना ब्रह्मा जी ने ही की…
कार्यकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, ये जो प्रश्न है वो चालीस वर्षीय महिला हैं, उन्होंने भेजा है नॉएडा से। बोल रही हैं कि धार्मिक कर्मकांड का अगर धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है तो ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी क्यों मनाए जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: इस प्रश्न में एक मान्यता है, एज़म्पशन…
भिन्न-भिन्न लोकों…
मेरा प्रश्न आपसे यह था…
प्रश्नकर्ता: मेरा बी.एड. पूरा हो गया है। उससे पहले मेरा भक्ति-भाव में थोड़ा ज़्यादा मन था और जैसे-जैसे समय गुज़रता गया, अब ऐसा हो गया है कि माँ के कहने पर मंदिर चला जाता हूँ। वहाँ पर देखता हूँ कि लोग पानी डाल रहे हैं मूर्ति पर तो मेरे मन…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पृष्ठभूमि यह है कि मैं पिछले एक वर्ष और दस महीनों से रोज़ सुबह ध्यान करता हूँ, और मैं यूट्यूब पर आध्यात्मिक प्रवचन इत्यादि भी सुनता हूँ, और मैं कुछ आध्यात्मिक विधियों का भी पालन करता हूँ।
स्थिति यह है कि सब करने के बाद भी…