हम ईश्वर की बात क्यों करते हैं? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आज अवधूत गीता के बारे में पढ़ा तो पता चला कि उसमें तो गुण और निर्गुण दोनों से परे की बात की गयी है। पर जहाँ मैं हूँ, द्वैत में ही हूँ। तो मुझे अवधूत गीता कैसे मदद कर सकती है? मैं क्या सीख सकती हूँ, अवधूत गीता से?
आचार्य प्रशांत: बस यही कि द्वैत मैं फँसे रहना ज़रूरी नहीं है। द्वैत से आगे द्वैत से बढ़कर भी कुछ है या हो सकता है। क्या है द्वैत से आगे या क्या है गुणों से आगे इसकी बहुत परवाह मत करिए। मत पूछिए कि अद्वैत क्या होता है? अद्वैत में कैसे पहुँच जाऍं? गुणों से निर्गुण में कैसे जाऍं और फिर निर्गुण से भी आगे कैसे बढ़ें? ये सब प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं।
आपसे जब भी बात की जाती है पार की, बियॉन्ड की वो इसलिए नहीं की जाती है कि आप पार या बियॉन्ड में पहुँच ही जाऍं। अपना जो गुणात्मक खेल है, जीवन है, इसको लॉंघ करके। लाँघना बहुत बाद की बात है। कौन जाने लाँघने जैसा कुछ होता भी है कि नहीं होता है।
हमारे लिए तो इतना ही काफ़ी है कि एक ख़याल भी आ जाए कि जिन चीज़ों में हम फँसे हुए हैं, जो चीज़ें हमें इतनी ज़्यादा ज़रूरी लगती हैं। जो बातें हमारी ज़िन्दगी ही बन गयी हैं, वो आख़िरी नहीं हैं, वो उच्चतम नहीं हैं, उनसे आगे भी कुछ है या हो सकता है, ‘क्या है उनसे आगे?’ हटाओ न ये बात! ये धारणा टूटी कि हम जो कुछ कर रहे हैं वही आख़िरी है, शीर्ष है, इतना ही कम है क्या? बोलिए?
आप फँस गये हों; मान लीजिए, इसी जगह पर जहाँ आप हैं। ठीक है? तो इतना ही काफ़ी है न कि आपको कोई आकर फुसफुसा दे कि खिड़की भी है, दरवाज़े भी हैं, पीछे अभी ट्रेन जा रही है, इतना हौसला काफ़ी होगा न? आयाम ही बदल गया। या आप पूछोगे कि वो ट्रेन जाती कहाँ को है या पूछोगे कि इस दरवाज़े से बाहर निकल जाऍंगे, तो बाहर का नक्शा क्या है?



