कुछ काम करोगे, कुछ पसीना बहाओगे या सन्तों की वाणी सुनकर के ही तर जाओगे? सन्तजन तुमसे कोई सुनी-सुनायी बात कह रहे हैं? उन्होंने अपने जीवन की कीमत अदा करी है, पूरे जीवन की कुरबानी दी है, पूरी ज़िन्दगी लगायी है। तब वो, वो बात कह पाये हैं जो उन्हें समझ में आयी है। एक ज़िन्दगी होती है उससे फिर सन्त की वाणी उठती है। चूँकि उसने जीवन ऐसा जिया है। ‘अभ्यास’ पर इसीलिए इतना ज़ोर दिया जाता है न। कुर्बानी पर तभी इतना ज़ोर दिया जाता। और ये सब एक ही बात है — अभ्यास, कुर्बानी, समर्पण, तपस्या, साधना। इन सबको एक ही दिशा का मानना।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आपने पिछले सत्र में बताया कि जीवन यदि सही है तो ध्यान की किसी विधि की अलग से ज़रूरत नहीं होती। अभी मेरे दिन का ज़्यादातर हिस्सा काम के अलावा ‘ओशो’ के प्रवचन सुनने और उनकी विधियों के अभ्यास की कोशिश में व्यतीत हो रहा है। कृपा करके समझाने की अनुकम्पा करें कि दिनचर्या को किस तरह से रूपान्तरित किया जाए जिससे वह समझ बन सके जो अभी नहीं है।
आचार्य प्रशांत: जो प्रवचन इत्यादि तुम सुनते हो विषि (प्रश्नकर्ता), वो तुम काम से जो घंटे बच गये, उनमें सुनते हो न? काम क्या है और क्यों कर रहे हो, इस पर तो तुम कोई बात ही नहीं करना चाहते। तुम कह रहे हो, ‘काम कर लेता हूँ, काम के अलावा समय बचता है तो उसमें कुछ प्रवचन वगैरह सुन लेता हूँ।’ काम का मतलब समझते हो? एक ही जायज़ काम है, एक ही असली काम है। बँधे हुए को कोई दूसरा काम शोभा नहीं देता बेड़ियाँ तोड़ने के अलावा।
तो उसके अलावा न जाने कौनसा काम कर रहे हो, और उसमें कितना तुम समय बिता रहे हो। फिर जो उससे इक्का-दुक्का घंटे बच जाते हैं, उनमें तुम कहते हो कि ध्यान करते हो, ध्यान की विधियों का अभ्यास करते हो।




