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योग का वास्तविक अर्थ, और विधि || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम सारे योग के विद्यार्थी हैं और योग का दुनिया में बोल-बाला है। योग के विद्यार्थियों के लिए आपका क्या मार्गदर्शन है? वास्तविकता में योग क्या है?

आचार्य प्रशांत: खंडित मन दुख है और केन्द्र से विस्थापित मन दुख है, दोनो बातें समझनी होंगी।

आमतौर पर मन जैसा हमारा रहता है, बहुत टुकड़ों में बँटा रहता है, कई हिस्से होते हैं उसके। धूप भी होती है, छाँव भी होती है, आकर्षण भी होता है, विकर्षण भी होता है, आशा होती है, निराशा होती है। संकल्प होते हैं और उन्हीं के विरुद्ध विकल्प भी होते हैं। ऐसा होता है मन।

कभी कहता है आगे बढ़ो, कभी कहता है थम जाओ। कभी कहता है उठ भी जाओ, कभी कहता है थोड़ा और सो लो। योग का अर्थ है सबसे पहले ये जो अलग-अलग टुकड़े हैं मन के ये मिटें, ये एक हो जाएँ। ये सब विभाजन समाप्त हो। क्योंकि जितना विभाजन होगा, उतना दुख रहेगा। आप कभी इधर को चलोगे, कभी उधर को भटकोगे। और जिधर को भी चलोगे, पूरी निष्ठा और ऊर्जा से नहीं चल पाओगे क्योंकि एक तरफ़ को चले नहीं कि मन का दुसरा हिस्सा पीछे से आवाज़ देगा।

तो योग का पहला अनिवार्य पक्ष है कि मन के सब खंड एकाकार हो जाएँ। मन अगर किसी दिशा चले तो फिर पूरा-पूरा चले, मन थमे तो पूरा-पूरा थमे, मन समर्पित हो तो पूर्ण समर्पण हो और मन अगर उचटे, विरक्त हो तो फिर वैराग पूरा हो। ऐसा नहीं कि थोड़ा वैराग है और थोड़ी आसक्ति भी, थोड़ा अनुराग भी। ये योग का पहला पक्ष हुआ। लेकिन मन के खंडन का मिट जाना ही काफ़ी नहीं होता।

इतना ही पर्याप्त नहीं है कि मन एकनिष्ठ हो गया क्योंकि मन के साथ एक बड़ी खतरनाक दूसरी सम्भावना भी होती है, वो ये होती है कि मन एकनिष्ठ तो हो जाए पर सत्य के विपरीत किसी दिशा में। मन एकनिष्ठ तो हो जाए पर आत्मा को नहीं अहंकार के प्रति। पूरे तरीके से एकजुट हो जाए किसी की सेवा में, किसी के प्रेम में। पर जिसकी सेवा कर रहा है, जिसके प्रति प्रेम है वो सत्य न हो कुछ और ही हो। ये सम्भावना भी उपस्थित होती है। और न सिर्फ़ उपस्थित होती है बल्कि अक्सर मन इसी सम्भावना को चुन लेता है।

तो फिर योग का दूसरा पक्ष है, मन का सत्य के केन्द्र पर अवस्थित होना। पहली और दूसरी बात को अगर एक साथ समझें तो चित्र कुछ यूँ है, मन माने बिखरे-बिखरे टुकड़े, मन माने तमाम बिखरे हुए टुकड़े। समय के आघात ने तोड़ा है मन को, अनुभवों ने तोड़ा है मन को, संस्कारों ने तोड़ा है मन को, तमाम तरीके की धारणाओं ने खंडित किया है मन को, तो मन माने टुकड़े-टुकड़े। आमतौर पर ये है तस्वीर मन की।

उन टुकड़ों को एकीकृत करना है ये पहला पक्ष हुआ, उन टुकड़ों को एक करना है। और दूसरा पक्ष हुआ कि वो सब टुकड़े जो एक हो जाएँ, उनको ले जाकर के राम के चरणों पर अर्पित कर देना है। सिर्फ़ एक करना भी काफ़ी नहीं होता, उनको एक करके सही जगह पर रख देना भी ज़रूरी है।

तो योग माने आप देख ही रहे हैं दो बातें हुईं, पहले तो मन के अलग-अलग हिस्सों का आपस में योग और दूसरी बात मन का आत्मा से योग, मन का सत्य से योग। योग माने जुड़ना, योग माने मिलना। मिलने की बात प्रासंगिक ही तभी है जब पहले विघटन हो, वियोग नहीं तो योग की क्या बात। चूँकि हम भाँति-भाँति के विभाजन, विघटन, वियोग में जीते हैं इसलिए योग शब्द हमारे लिए उपयोगी है, मूल्यवान है।

तो जो लोग योग में उतरना चाहें सबसे पहले तो उन्हें देखना पड़ेगा कि मन के कितने टुकड़े हैं और कहाँ-कहाँ बिखरे पड़े हैं। हमने कहा पहला पक्ष क्या है? मन के तमाम हिस्सों को एक कर देना। एक करोगे कैसे? काँच गिरता, टूटकर बिखर जाता है, खतरनाक बात है न। एक बड़ा-सा काँच का टुकड़ा गिरे घर में और टूटकर के बिखर जाए ये तो खतरनाक बात होती है न। अब दो वजह से खतरनाक होती है, पहली बात ये कि जहाँ पर वो था वहाँ पर उसकी कुछ उपयोगिता थी, वहाँ से वो हट गया। तो वो जिस उपयोग में आ रहा था वो उपयोग अब नहीं हो पा रहा, पहली गड़बड़ तो ये हुई।

और दूसरी क्या हुई? खिड़की में लगा था काँच, बड़ी खिड़की में काँच लगा था और गिर गया और टूट गया और उसके टुकड़े बिखर गये। तो अभी दो तरह की समस्याएँ हैं, पहली तो ये कि खिड़की की चौखट खाली है। और दूसरी घर में काँच बिखरा हुआ है भाई! तो दो काम करने पड़ेंगे न। पहले क्या करते हो आप ऐसी स्थिति में? काँच समेटते हो। समेटने के लिए क्या आवश्यक है?

श्रोता: झाड़ू

आचार्य: अरे! झाड़ू से क्या होगा अगर यही नहीं पता कि काँच के टुकड़े बिखरे कहाँ हैं? सबसे पहले देखना होगा न कि हम कहाँ-कहाँ बिखरे हुए हैं? तभी तो झाड़ू का प्रयोग करोगे। नहीं तो लेकर के झाड़ू पता चला बिस्तर साफ़ कर दिया। काँच बिखरा है बाहर वाले कमरे में, झाड़ू लग रहा है पीछे वाले कमरे में।

तो सबसे पहले तो पता हो कि हम कितने बिखरे हैं और बिखरकर कहाँ पड़े हुए हैं। ये योग का पहला चरण है, आत्मअवलोकन। पता करो कि कहाँ-कहाँ बिखरे हुए हो तुम, पता करो मन का काँच टूटकर कहाँ-कहाँ छितराया हुआ है। बहुत आसान है न। कहाँ-कहाँ छितराया हुआ है? जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ को छितराया हुआ है तो देखो मन कहाँ-कहाँ को भागता है।

मन पर दृष्टि रखने का अभ्यास करो, बेपरवाह मत हो जाया करो, उन्मुक्त मत छोड़ दो मन को। वो जहाँ जाए, तुम भी साथ जाओ, तुम्हें पता तो हो वो जा कहाँ रहा है। ले रहा है वो दिवास्वप्न, तुम कहीं अंकित तो करो कि वो कहाँ-कहाँ पहुँच रहा था, क्या चाह रहा था, क्या कर आया।

जब देख लोगे कि कैसी-कैसी व्यर्थ जगहों पर मन भागता है और भागकर के समय और ऊर्जा नष्ट करता है। तब आसान हो जाएगा मन के सब टुकड़ों को एक जगह पर ला पाना।

तुम्हें अटपटा-सा लगेगा, मूर्खता प्रतीत होगी, तुम कहोगे ‘ये मैं कर क्या रहा हूँ?’। दिनभर अगर लिख लिया कि आज कहाँ-कहाँ को मन गया, किन-किन दिशाओं में बहका, तो झुंझला जाओगे, लज्जा-सी आएगी, कहोगे ‘ये सब चल रहा है मन में?’ और ज़रा सदमा-सा लगेगा तुम्हें दिखाई देगा कि मन की दुनिया कितनी झूठी है।

जो कुछ तुमने लिखा होगा मन के बारे में, वो ऐसा होगा कि उसे तुम अपने निकटतम सम्बन्धियों को और मित्रों को भी दिखा नहीं पाओगे। जब उसे खुद ही देखने में लज्जा आती है तो किसी और को क्या दिखाओगे? बेटे में कहा-सुनी हो गयी या पति-पत्नी में झगड़ा हो गया, उसके बाद उन्होंने एक-दूसरे के लिए जो सोचा वो सोचा तो है ही, और उसको वो लिख डालें एक कागज़ पर कि आज मैंने ये सोचा अपने पति के लिए या ये सोचा अपनी पत्नी के विषय में। तो उस कागज़ को बड़ा गुप्त रखना पड़ेगा। बाप ने देख लिया तो बेटे को घर से बेदखल कर देगा और बेटे को पता चल गया कि बाप ने ये सब सोचा है तो श्रद्धा-सम्मान सब छूमन्तर हो जाएग।

मन झूठ पर जीता है, एक हिस्सा होगा जो कह रहा होगा कि आज इसको गिरा ही दूँ, हरा ही दूँ, मिटा ही दूँ और दूसरा हिस्सा कह रहा होगा ‘अरे! जो बोलना है धीरे बोलो, बगल के कमरे में ही है कहीं सुन ना लें, और तभी तीसरा हिस्सा बोलेगा ‘अरे वो आ रहा है! बाप है, नमस्कार तो करना पड़ेगा न।’ और जब तुम इन तीनों बातों को कागज़ पर एक साथ लिखा देखोगे, तो मन से तुमने जो तादात्म्य कर रखा है वो छूट जाएगा, बड़ी ग्लानि उठेगी, तुम कहोगे ‘ऐसे हैं? मन के टुकड़े ऐसे हैं?’।

एक टुकड़ा कह रहा है ‘बुरा हो इसका, नर्क में जाए ये’ और ठीक उसी वक्त दूसरा टुकड़ा कह रहा है कि दरवाज़ा खुला, वो अन्दर आ रहा है, चलो नमस्ते करो। ये दोनों मन से ही आवाज़ें उठ रही हैं न। और एक साथ उठ रही हैं, तो तुम कहोगे ‘कितना झूठा है ये मन।’ ये टुकड़े बचे ही इसीलिए रहते हैं क्योंकि हम इन्हें देखते नहीं। न देखकर के हम इनका समर्थन कर देते हैं, इनको जीवन दे देते हैं, पोषण दे देते हैं।

तुमने ज्यों ही साफ़-साफ़ देखना शुरू किया कि मन का यथार्थ क्या है, त्यों ही तुम मन को समर्थन देना बन्द कर दोगे। तुमने समर्थन देना बन्द किया नहीं कि झाड़ू लग गयी। सबकुछ जो बिखरा-बिखरा था वो इकट्ठा हो गया। एक केन्द्रीयकरण हो गया। ये एक तरह से ‘नेति-नेति’ की प्रक्रिया है। ये विरक्ति की प्रक्रिया है।

मन का जो हिस्सा जिधर को गया था उधर को वो गया ही इसीलिए था क्योंकि उसे उधर कुछ आकर्षण था, तुमने उस आकर्षण को काट दिया, मन की पोल खोल दी, मन का झूठ पकड़ लिया। तो जो कुछ जिधर को भी भागा हुआ था उधर से वापिस आ गया, एकीकृत हो गया, सब इकट्ठा हो गया। लेकिन मन के आकर्षणों को काट देना ही काफ़ी नहीं होता। क्योंकि मन तो एक बेचैनी है, उसे चैन चाहिए। सारे आकर्षण भी इसीलिए प्रभावी होते हैं क्योंकि कहते हैं कि आओ मेरी ओर, मैं चैन दूँगा तुमको।

जिधर को जा रहा था मन उधर से तुम उसे वापिस ले आये, उसकी सारी आशाएँ तोड़ दीं। पर चैन तो उसे अभी भी चाहिए न? तो उसके लिए इस पूरे एकीकृत माल को, इस पूरे एकीकृत पिंड को उठाकर के तुमको सच्चाई की ओर ले जाना पड़ेगा। तुम्हें मन से कहना होगा देखो, ये तो बात साफ़ हो गयी कि जहाँ तुम आराम खोज रहे थे, जहाँ तुम शान्ति खोज रहे थे वहाँ तो नहीं ही मिलेगी। आओ अब तुमको वहाँ को ले चलता हूँ जहाँ मिलेगी। गन्दा पानी पी रहे थे तुम, गन्दे पानी को दूर कर दिया मैंने तुमसे, पर प्यास तो अभी भी है न?

सिर्फ़ गन्दे पानी से बच जाना काफ़ी नहीं है, साफ़ पानी भी तो चाहिए। तो पहला चरण है गन्दे पानी को दूर करने का और दूसरा चरण है साफ़ पानी की तरफ़ बढ़ने का, जहाँ प्यास वास्तव में बुझ सके। ये योग है।

समझ रहे हैं? ज्ञान से शुरू होता है, अवलोकन से शुरू होता है, नेति-नेति से शुरू होता है और भक्ति और समर्पण और प्रेम पर जाकर के समाप्त हो जाता है। शुरूआत के लिए तो अवलोकन चाहिए, पैनी दृष्टि चाहिए, एक निर्ममता चाहिए। बिना निर्ममता के झूठ को छोड़ पाना सम्भव नहीं। और दूसरे चरण में श्रद्धा चाहिए, समर्पण चाहिए, ये योग है।

दो पक्ष हैं, पक्ष माने? पंख समझ लो जैसे। दो पक्ष हैं योग के, ज्ञान और भक्ति। दोनों आवश्यक हैं। अब आपने कहा कि योग किन रूपों में आज के समय में विकृत हो गया है? अनेक रूपों में विकृत हो गया है। पर विकृतियों की चर्चा कोई बहुत आवश्यक नहीं है। अगर हमें ये पता हो कि वास्तविक योग क्या है? तो इतना पर्याप्त है। विकृतियाँ तो हज़ार तरह की हो सकती हैं। योग शब्द इतना प्रचलित हो गया है, इतना फ़ैशन में आ गया है कि पचासों-सैकड़ों तरह के योग बाज़ार में दिखाई दे रहे हैं, पर योग वास्तव में क्या है? उसकी बात अभी हमने करी।

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