प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम सारे योग के विद्यार्थी हैं और योग का दुनिया में बोल-बाला है। योग के विद्यार्थियों के लिए आपका क्या मार्गदर्शन है? वास्तविकता में योग क्या है?
आचार्य प्रशांत: खंडित मन दुख है और केन्द्र से विस्थापित मन दुख है, दोनो बातें समझनी होंगी।
आमतौर पर मन जैसा हमारा रहता है, बहुत टुकड़ों में बँटा रहता है, कई हिस्से होते हैं उसके। धूप भी होती है, छाँव भी होती है, आकर्षण भी होता है, विकर्षण भी होता है, आशा होती है, निराशा होती है। संकल्प होते हैं और उन्हीं के विरुद्ध विकल्प भी होते हैं। ऐसा होता है मन।
कभी कहता है आगे बढ़ो, कभी कहता है थम जाओ। कभी कहता है उठ भी जाओ, कभी कहता है थोड़ा और सो लो। योग का अर्थ है सबसे पहले ये जो अलग-अलग टुकड़े हैं मन के ये मिटें, ये एक हो जाएँ। ये सब विभाजन समाप्त हो। क्योंकि जितना विभाजन होगा, उतना दुख रहेगा। आप कभी इधर को चलोगे, कभी उधर को भटकोगे। और जिधर को भी चलोगे, पूरी निष्ठा और ऊर्जा से नहीं चल पाओगे क्योंकि एक तरफ़ को चले नहीं कि मन का दुसरा हिस्सा पीछे से आवाज़ देगा।
तो योग का पहला अनिवार्य पक्ष है कि मन के सब खंड एकाकार हो जाएँ। मन अगर किसी दिशा चले तो फिर पूरा-पूरा चले, मन थमे तो पूरा-पूरा थमे, मन समर्पित हो तो पूर्ण समर्पण हो और मन अगर उचटे, विरक्त हो तो फिर वैराग पूरा हो। ऐसा नहीं कि थोड़ा वैराग है और थोड़ी आसक्ति भी, थोड़ा अनुराग भी। ये योग का पहला पक्ष हुआ। लेकिन मन के खंडन का मिट जाना ही काफ़ी नहीं होता।
इतना ही पर्याप्त नहीं है कि मन एकनिष्ठ हो गया क्योंकि मन के साथ एक बड़ी खतरनाक दूसरी सम्भावना भी होती है, वो ये होती है कि मन एकनिष्ठ तो हो जाए पर सत्य के विपरीत किसी दिशा में। मन एकनिष्ठ तो हो जाए पर आत्मा को नहीं अहंकार के प्रति। पूरे तरीके से एकजुट हो जाए किसी की सेवा में, किसी के प्रेम में। पर जिसकी सेवा कर रहा है, जिसके प्रति प्रेम है वो सत्य न हो कुछ और ही हो। ये सम्भावना भी उपस्थित होती है। और न सिर्फ़ उपस्थित होती है बल्कि अक्सर मन इसी सम्भावना को चुन लेता है।




