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मंत्र और श्लोक - अर्थ तो जानिए || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: (आरती लेते हैं)

(आरती और पूजा की आवाज़ें कुछ दूर से आ रही हैं) ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ, बचपन से ही बहुत पूजाएँ देखीं, पाठ देखे, मंत्रोच्चार देखे। और ये बात मुझे कभी समझ में नहीं आयी कि जिन मंत्रों का अर्थ सुनने वाले को तो छोड़ दो, शायद गाने वालों को भी न पता हो, सुनने वाले को तो निश्चित ही है कि उनका अर्थ नहीं पता है, उन मंत्रों के श्रवण से लाभ क्या हो रहा होगा? बच्चा था मैं, लेकिन उत्सुक बहुत रहता था। जिज्ञासा थी तो मैं पूछ दिया करता पंडितों से कि मतलब तो बताइए। कुछ तो अच्छे थे, वो बता देते, कुछ टाल जाते, कुछ चिढ़ भी जाते।

लेकिन एक बात मैं भली-भाँति जानता हूँ, उपनिषदों के मंत्र, ऋषियों के वचन, शास्त्रों के श्लोक बहुत सुन्दर हैं, बहुत कीमती हैं, आपकी चेतना को बहुत ऊँचाइयाँ दे सकते हैं लेकिन सिर्फ़ तब, जब आपको उनका अर्थ पता हो। अगर अर्थ नहीं पता और आप उनको दोहराए जा रहे हैं, रटे जा रहे हैं, तो ये भूल जाइए कि सिर्फ़ मंत्रों की ध्वनि आपके कान पर पड़ेगी तो आपको बहुत लाभ हो जाएगा, नहीं होने वाला।

भई! अगर ध्वनि से ही लाभ होता तो किसी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया जाता? बस कुछ ध्वनियाँ होती न। पर सब मंत्र, सब श्लोक एक भाषा में हैं। मंत्रों में शब्द हैं, जिनके अर्थ हैं। वो अर्थ इसीलिए हैं न कि उन अर्थों का आपको ज्ञान हो। तो श्लोक बस दोहराया मत करिए भई! वो बहुत ऊँचा, मूल्यवान, श्लोक है, उसका मतलब पता करिए। और ये सब अन्धविश्वास तो बिलकुल ही छोड़ दीजिए कि श्लोकों के मंत्रों के वाइब्रेशन (कंपन) भर से आपको कुछ फ़ायदा हो जाएगा,

भले ही आपको उनका अर्थ नहीं पता। और आपके सामने भी कभी कोई संस्कृत में श्लोक कहे तो तुरन्त हाथ जोड़कर उससे कहिए कि हमें इसका मतलब भी बताओ, अर्थ स्पष्ट करो क्योंकि अर्थ स्पष्ट नहीं है, तो आप रट रहे हो न बस तोते की तरह। हालाँकि अर्थ भी स्पष्ट भर हो जाने से बात नहीं बनती। उसके आगे भी जाना होता है। जो आपने सुना, उसको फिर जीवन में उतारना भी होता है। हम जानते ही हैं श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि तो पूरा अभ्यास होता है। लेकिन ये बात तो, जब मैं पाँच साल का छोटा बच्चा था, तब भी मेरे गले से नहीं उतरती थी कि लोग कैसे दो-दो घंटे श्लोक सुनते रहते हैं, बिना किसी श्लोक का अर्थ जानें। तब भी नहीं समझ में आती थी ये बात, अभी भी नहीं समझ में आती। शायद फिर इसीलिए जीवन ऐसा जिया और अब काम ऐसा कर रहा हूँ कि इन्हीं श्लोकों के अर्थ सबको समझाता रहता हूँ। मेरा सौभाग्य है कि लोगों को उपनिषद पढ़ाता हूँ, लोगो को ऋषियों की बातों के निकट ला पाता हूँ।

धर्म का अर्थ होता है जानना, समझना, बोध। धर्म का अर्थ अन्धा अनुकरण नहीं होता। धर्म का मतलब होता है कि नासमझी हटे आपके भीतर से और भीतर होश पैदा हो, समझ, बोध पैदा हो, ये धर्म है। चुपचाप पुरानी परिपाटी को, परम्परा को दोहराए जाने का नाम धर्म नहीं है। जो बात श्लोक में कही गयी है, वो आज के युग में भी बहुत ज़रुरी है, बहुत प्रासंगिक है। इसीलिए वो बात आज की भाषा में कही जानी चाहिए।

अगर आप चाहते हैं कि वो बात आज का मन समझे तो उस बात को तो आज की भाषा में अनुवाद करके समझिए। भाषा भी आज की हो, संदर्भ भी आज का हो, उपयोगिता भी आज की हो, तब आएगा मज़ा। क्योंकि सच तो कालातीत होता है न, माने वो हर समय का होता है, हर समय का। अगर सच आज का भी है तो उपनिषदों के श्लोक भी आज के भी है न। आज के भी हैं अगर उपनिषदों के श्लोक, तो आज आप उन्हें समझते क्यों नहीं है? आपने क्यों उनको जैसे किसी संग्रहालय की, म्यूजियम की वस्तु बना दिया? कि कोई पुरानी चीज़ है, दूर से देखो कभी-कभार, उसके निकट मत जाओ, उसे अपने जीवन का हिस्सा मत बनाओ। उसे रोज़मर्रा उपयोग में लाने वाली आवश्यकता मत बनाओ।

भई! म्यूज़ियम की चीज़ को आप रोज़ थोड़े ही इस्तेमाल में लाते हो। कभी-कभार जाते हो, दूर से देख लेते हो। हमने ऐसा ही बना दिया है उपनिषदों को। नहीं! उन्हें रोज़ के लिए अपने जीवन में उतारना है और वो तभी हो पाएगा, जब आप उनका मतलब समझें और समझें कि वो आज भी आपके लिए कैसे उपयोगी हैं। आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने कभी थे और आज से दस हजार साल बाद भी उतने ही उपयोगी होंगे जितने आज हैं। क्योंकि मन तो मन है न, वो सारे श्लोक मन के बारे में है, मन नहीं बदला है आदमी का,

आदमी की मूल वृतियाँ नहीं बदली हैं।

पहले भी आदमी ईर्ष्यालु था, आज भी ईर्ष्यालु है। आप पहले भी डरते थे, आज भी डरते हैं। दस हज़ार साल पहले भी लड़ाइयाँ होती थी, आज भी होती हैं। भ्रम और क्रोध आज से हज़ारों साल पहले भी थे, आज भी हैं, तो वो बीमारियाँ पहले भी थीं, वो बीमारियाँ आज भी हैं। उन बीमारियों का जो इलाज और इलाज से पहले, उन बीमारियों का जो डायग्नोसिस (जाँच) और जो निदान तब बताया गया था, वो आज भी उपयुक्त है। समझिए।

इससे ग़लत और इससे ज़्यादा दुर्भाग्य की कोई बात नहीं हो पाएगी कि उपनिषद और उनके श्लोक किसी बीते हुए ज़माने की याद भर बन कर रह जाएँ, कि उनका बस एक सेरेमोनियल (अनुष्ठानिक, औपचारिक) इस्तेमाल बस हो, कोई वास्तविक इस्तेमाल नहीं। उपनिषदों के श्लोक कोई सेरेमोनियल इस्तेमाल भर करने के लिए नहीं है। सेरेमोनियल इस्तेमाल आप समझते हैं न, कभी-कभार, किसी ख़ास अवसर पर, किसी त्यौहार पर उसका इस्तेमाल कर लिया। नहीं! उनको रोज़ समझना होगा। उन्हें ज़िन्दगी में उतारना होगा।

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