आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न कि मुझे भगवान पर श्रद्धा है, तो ये अभी ऑब्जेक्ट बाउंड फ़ेथ (वस्तु से बँधी हुई श्रद्धा) है। ये कभी श्रद्धा कम होगी कभी बढ़ जाएगी; ऑब्जेक्ट बाउंड फ़ेथ है, ये ट्रस्ट का ही एक फ़ॉर्म है बस।
श्रोतागण: एग्ज़ैक्टली, जब डिस्कशन चल रहा था तो मुझे लग रहा था कि फ़ेथ के साथ ये घटना और बढ़ना शब्द हमें लगाना नहीं चाहिए। कुछ वर्ड्स एब्सोल्यूट हैं, जैसे प्रेम घट रहा है बढ़ रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए। ट्रस्ट ही रखें तो ज़्यादा अच्छा है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, उसमें होगा। दिक्कत क्या है न कि भाषा फिर बहुत सीमित हो जाएगी, अब कबीर साहब का है,
गहरी प्रीत सुजान की बढ़त-बढ़त बढ़ि जाए। और ओछी प्रीत अजान की घटत-घटत घटि जाए॥
वो भी यही कह रहे हैं कि प्रेम, जो सुजान का लव होता है, वो बढ़ता ही जाता है, और, और बढ़ता जाता है। और जो अजान का प्रीत होती है वो ओछी होती है। तो ठीक है, बोल दिया उस तरीके से तो ठीक है। लेकिन ये समझ लो कि, अब भगवान; ये ही उदाहरण ले लो, कि तुमने किसी मूर्ति पर ट्रस्ट कर रखा है। तुम उसको फ़ेथ बोल सकते हो क्योंकि वो जिस चीज़ के लिए खड़ी है वो अननोन (अज्ञात) ही है लेकिन ये फ़ेथ कम-ज़्यादा होती रहेगी, लोगों की होती है।






