सच्चाई ज़्यादा, शायरी कम || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी मेरा प्रश्न यह है कि मैंने कुछ पुस्तकों में पढ़ा है कि बुद्ध, महावीर जैसे व्यक्तियों ने ईश्वरीय तत्व को फील (अनुभव) किया है। क्या यह सच है? क्या हम भी कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: क्या पूछ रहे हो? पी लिया माने क्या?
प्र: जैसे कहते हैं कि जब बुद्ध को या महावीर को वो परमज्ञान या निर्वाण प्राप्त हुआ था, तो उन्होंने ईश्वर को एक तरीके से फील कर लिया था, महसूस कर लिया था। क्या ऐसा सम्भव है?
आचार्य: यह किसने बताया? बुद्ध के पूरे दर्शन में ‘ईश्वर’ जैसी कोई चीज़ नहीं है। वो खुद ही बोलते रहे कि “यह ईश्वर वग़ैरह तुम क्या कर रहे हो?” और तुम बोल रहे हो फील कर लिया! पी लिया! यह किन किताबों में पढ़ा है? ये शायरी कहाँ से पढ़ी?
कुछ नहीं होता यह पी लिया और यह सब, और न कोई ऐसा विशेष पल होता है जब पी लेते हो। मेहनत का काम होता है। मेहनती लोग थे। दसियों साल तक मेहनत करी, चीज़ें समझी अपने लिए। उसको फिल्मी फैंटसी (कल्पना) मत बनाओ कि साक़ी ज़ाम लेकर आयी और बुद्ध ने पी लिया और झूम उठे! ला पिला दे साक़िया!
ये अध्यात्म में न जाने कहाँ से पिछले कुछ दशकों में नयी चीज़ आयी है– रुमानियत! रोमैंटिक स्प्रिचुलिटी (रुमानी अध्यात्म)! और बहुत सारे पाश्चात्य लेखक भी हैं जो इसके बिलकुल माहिर हो चुके हैं! उनका हुनर इसी में है। वो ऐसा रोमैंटिक विजन(रुमानी दृश्य) खड़ा करते हैं कि आपको लगता है बस अब, पूछो मत! पी लें अभी बस, हम भी पी लें!



