प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी तो लगता है ईश्वर पर भरोसा रखो, वह सब ठीक कर देगा, लेकिन यह भरोसा मैं हमेशा क्यों नहीं रख पाती?
आचार्य प्रशांत: कोई भरोसा वगैरह मत कर लेना। तुम तो भरोसा भी अपनी योग्यतानुसार और अपने पैमानों पर ही करोगे। तुम कहोगे कि अगर तुमने इस-इस तरह की योग्यता और पात्रता दिखाई, तब तू मेरे भरोसे के काबिल है। तूने मुझे सुख दिया, तूने मुझे आराम दिया, तुझसे मेरी इच्छाएँ पूरी हुईं, तो तू मेरे भरोसे के काबिल है।
सत्य पर भरोसा करना भी उतनी ही बड़ी भूल है, जितनी बड़ी भूल है उस पर भरोसा न करना। जो सत्य में यकीन रखते हैं वह उतने ही अँधेरे में गिरते हैं, जितने कि वह जो सत्य में यकीन नहीं रखते। तुम्हें किसी पर भरोसा नहीं करना है, भरोसा करना तो बस मानसिक गतिविधि है।
हर भरोसे, हर विश्वास के पीछे कारण होगा और कारण तुम्हारे अहम् और तुम्हारे स्वार्थ से जुड़ा हुआ होगा। सत्य पर भरोसा नहीं किया जाता, सत्य के सामने नमन किया जाता है। भरोसा करके तो तुम सत्य को क्षुद्र बनाए दे रहे हो। यह कभी मत कहना कि मुझे सत्य पर, कि ईश्वर पर, कि ब्रह्म पर भरोसा है, भरोसा तो बहुत छोटी बात है।
विश्वास और श्रद्धा में अंतर होता है। श्रद्धा की कोई वजह नहीं होती, श्रद्धा कोई विचार नहीं होता, श्रद्धा का कोई कारण नहीं होता, श्रद्धा का कोई वजूद ही नहीं होता। विश्वास के पीछे कारण भी होता है, विश्वास के आगे परिणाम भी होता है, विश्वास में अपेक्षा भी होती है और विश्वास की एक निश्चित अवधि भी होती है।
विश्वास तुम्हारा होता है, श्रद्धा के तुम होते हो। विश्वास तुमसे छोटा होता है, श्रद्धा तुमसे बहुत बड़ी होती है। और श्रद्धा का अर्थ होता है, हम मूक हो जाएँगे, हम कुछ कह ही न पाएँगे, हम तुम्हारे बारे में विचार ही न कर पाएँगे। तुम इतने बड़े हो कि हम यह भी न कह पाएँगे कि तुम बहुत बड़े हो। ‘बड़ा’ शब्द भी तुम्हारे आगे निरर्थक है, ‘बड़ा’ शब्द भी तुम्हारे आगे असंगत है, ‘बड़ा’ शब्द भी तुम्हारे आगे छोटा है। हम मुँह ही न खोलेंगे, हम मन को यह धृष्टता करने ही न देंगे कि हम तुम पर भरोसा भी करें।




