ज्ञान और भक्ति में क्या श्रेष्ठ? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

निर्पंथी को भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान। निर्द्वंद्व को मुक्ति है, निर्लोभी निर्वाण।। ~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: चार हिस्से हैं इसके, चारों को अलग-अलग बोलिए। एक आदमी पहले एक ही बोले, फिर अगला दूसरा।
"निर्पंथी को भक्ति है" — क्या अर्थ हुआ?
प्रश्नकर्ता१: सर, यहाँ निर्पंथी से अर्थ होता है किसी धर्मविशेष पर विश्वास न रखने वाला, स्वधर्म पर चलने वाला। जो अपनी समझ से अपने धर्म को चुनता है, वही भक्ति कर पाएगा।
आचार्य: पंथ में क्या दिक्क़त होती है?
प्र१: सर, पंथ दूसरों का दिया हुआ होता है। बाहर से आता है, वो सभी के लिए एक जैसा नहीं हो सकता।
आचार्य: हम जिनको आमतौर पर इज़्म बोलते हैं, वो क्या है? आपने अपने विद्यार्थियों को इज़्म पर कोई जवाब दिया था अभी, वो क्या था? वो धर्म था कि पंथ था?





