प्रश्नकर्ता: सर, क्या भक्ति सुमिरन है, क्या इसमें ध्यान लगाना चाहिए, भक्ति कैसे करनी है? कई लोग कहते हैं कि आप ध्यान में बैठोगे, वो भक्ति है; या आप सुमिरन कर लोगे, वाहे गुरु, वाहे गुरु जाप कर लोगे, वो है। आप राम-राम कर लो वो है या आप ओम्-ओम् करते जाओ, वो है। आप एक ओंमकार बोलते जाओ, वो भक्ति है। भक्ति क्या है? उसको बुद्धि के साथ जोड़ना तो है, मगर करनी कैसे है, क्या है?
आचार्य प्रशांत: आप, जो भी जपें वही भक्ति है, बस एक छोटी-सी शर्त के साथ — आप वाहे गुरु जाप करें, भक्ति है। आप हरे राम हरे कृष्ण बोलें, आप मौन धारण करें, आप ओम् का, ओंमकार का जप करें, सब भक्ति है — शर्त क्या है छोटी-सी? शर्त यह है कि जिसका करें बस उसका करें। एक के दो नहीं होने चाहिए। भक्ति के मूल में है — एकनिष्ठा।
एकनिष्ठा। भारत ने इसी को कहा है — एकव्रता होना। और उसी बात को थोड़ा किसी अन्य संदर्भ में कह दिया गया है, पतिव्रता होना कि एक को छोड़कर दूसरे की तरफ़ हम देखते नहीं। यह है भक्ति। ‘मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'। इतना ही कहना काफ़ी नहीं है कि मेरो तो गिरधर गोपाल। वो जो आगे की बात है, वो बराबर की, बल्कि और ज़्यादा ज़रूरी है — "दूसरो न कोई।"
दूसरा जब तक हटा नहीं तब तक भक्ति नहीं हो पायेगी। इसीलिए भक्ति के साथ-साथ ज्ञान अनिवार्य है—अभी हम चर्चा कर रहे थे न—ज्ञान चाहिए दूसरे को विदा करने के लिए। दूसरा विदा नहीं हुआ, तो आप जब राम-राम भी भज रही होंगी, तो मन में तो दूसरे घूम ही रहे होंगे न। फिर राम मुस्कराकर दूर ही खड़े रहते हैं, वो कहते हैं, ‘अभी तो तुमने मेरे कई प्रतिद्वंदी खड़े कर रखे हैं।'
और राम एक हैं, सत्य एक है। उसका कोई प्रतिद्वंदी तो हो नहीं सकता। और आप जप रहे हो या ध्यान में बैठो हो और एक ध्येय के अतिरिक्त कोई और आ गया आपके ज़हन में, तो आपका ध्यान व्यर्थ गया। देखिए, समझिएगा मेरी बात को। (प्याली दिखाते हुए) इसमें चाय है बहुत सारी, बहुत सारी। हज़ारों बूँद चाय है इसमें। इसमें और आप कितनी भी चाय डाल दो, यह बेहतर तो नहीं हो जायेगी। या हो जायेगी? चाय तो चाय ही रहेगी। चाय में चाय जुड़ी क्या मिला?







