प्रश्नकर्ता: मेरा बी.एड. पूरा हो गया है। उससे पहले मेरा भक्ति-भाव में थोड़ा ज़्यादा मन था और जैसे-जैसे समय गुज़रता गया, अब ऐसा हो गया है कि माँ के कहने पर मंदिर चला जाता हूँ। वहाँ पर देखता हूँ कि लोग पानी डाल रहे हैं मूर्ति पर तो मेरे मन में उसके प्रति विद्रोह उठता है।
फिर बाद में ऐसा लगता है कि भगवान बुरा मान जाएँ भक्त पर और द्वंद-सा रहता है। पहले माँ के कहने पर व्रत कर लिया या भजन कर लिया, अब बिलकुल भी रुचि नहीं रहती उसमें। ऐसा तो नहीं चलेगा।
आचार्य: समस्या क्या है?
प्र: समस्या यही है कि मन इनको माने कैसे?
आचार्य: भक्ति का अर्थ कुछ मानना नहीं होता। तुम कुछ मानो, तुम कुछ ना मानो, इससे भक्ति का क्या लेना देना? भक्ति कोई धारणा थोड़े ही है, कोई विश्वास थोड़े ही है। भक्ति का अर्थ होता है — सर्वप्रथम अपने यथार्थ को जानना और उस यथार्थ को पीछे छोड़ देने, उससे मुक्त होने की तड़प से गुज़रना।
इसको मान लिया, उसमें विश्वास रख लिया, इसका भक्ति से क्या लेना देना? और बिलकुल ठीक कह रहे हो, लोग भक्ति के नाम पर कहीं दूध बहा रहे हैं, कहीं पानी बहा रहे हैं। वो सब तो यूँ ही हैं, उनका अपना मनगढ़ंत सिद्धांत, उनका अपना निजी व्यापार; अपने-अपने तौर-तरीक़े, अपनी-अपनी मान्यताएँ, अपनी-अपनी धारणाएँ, अपने आग्रह, अपने विश्वास; वो भक्ति थोड़े ही हो गई भाई।




