
श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।




जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।

प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।




प्रश्नकर्ता: सर, रिलिजन (मज़हब) को मानने का रीज़न (कारण) सिक्योरिटी (सुरक्षा) के अलावा कुछ और...

प्रश्नकर्ता: अगर पृथ्वी बनाने से पहले भगवान आपसे पूछते कि मैं बनाऊँ, आपको ये दृश्य सारा सब दिखा देते, जो समुद्र में हो रहा है, गाय के साथ हुआ है, आप हामी भरते?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अक्सर हम ईश्वर से कुछ माँगते रहते हैं और न मिलने पर दुखी हो जाते हैं। क्या हमें दुखी होना चाहिए?


प्रश्नकर्ता: सर, ये बोला जाता है कि गॉड (भगवान) बहुत अच्छा है, वो बहुत परोपकारी है। लेकिन फिर भी ये दुनिया में इतना बुरा होता रहता है। ऐसा क्यों होता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते। वीडियो पर एक कमेंट है। उससे एक प्रश्न है। नाम तो नहीं लिखा है, इनके

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आज अवधूत गीता के बारे में पढ़ा तो पता चला कि उसमें तो गुण और निर्गुण दोनों से परे की बात की गयी है। पर जहाँ मैं हूँ, द्वैत में ही हूँ। तो मुझे अवधूत गीता कैसे मदद कर सकती है? मैं क्या सीख सकती हूँ,…


मुगलां ज़हर प्याले पीते, भूरियां वाले राजे कीते, सब अशरफ़ हिरन चुक कीते, भला उन्हानूं झड़िया ए, रहो-रहो वे इश्क़ मारया ए, कहो किसनूं पार उतारआ ए। ~ बाबा बुल्लेशाह जी
अर्थ: मुगलों ने ज़हर के प्याले पिये हैं। । कम्बलधारियों को राजा बनाया गया है। सभी शरीफ़ लोग चुपचाप…



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैं आपको कुछ समय से सुन रहा हूँ। मेरे एक मित्र से मेरी बातचीत हो रही थी, जो कि दलित वर्ग से हैं। तो मैंने उन्हें कहा कि, 'आप आचार्य जी की पुस्तकें पढ़ें, वीडियोज़ देखें, वेदांत की तरफ जाएँ; जो मूल शिक्षा है सनातन धर्म


आचार्य प्रशांत: प्रणाम आचार्य जी, पिछले कुछ दिनों में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का फिर से अनादर हुआ। और बुद्धिजीवी और कलाकार क़िस्म के लोगों का जैसे ये पसंदीदा काम हो। वो देवियों की मूर्तियाँ लेते हैं, प्रतिमाएँ लेते हैं और फिर उनका अपने अनुसार दुरुपयोग करते हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सवाल ये था कि भगवान और भूतों का फिर रिश्ता क्या है?

आचार्य प्रशांत: पृथ्वी पर तो जो बड़े-से-बड़ा ज्ञानी होता है, वो मान लो दस हज़ार चीज़ों के बारे में जानता है। इतना भी बड़ा मुश्किल है, पर मान लो। ठीक है? तो उसी बात को आगे बढ़ा कर हम क्या कर देते हैं? हम कहते हैं कि परमात्मा सर्वज्ञ है



प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम! गीता का पाठ संभव कर देने के लिए धन्यवाद। अध्याय ७, १३ और १५ में श्रीकृष्ण प्रकृति, दो प्रकार के पुरुष, और पुरुषोत्तम के बारे में बताते हैं और कबीर साहब ने चार रामों की बात कही है-




प्रश्नकर्ता१: प्रणाम आचार्य जी। अर्जुन हम सब हैं पर कृष्ण नहीं है सबके पास। साथ ही साथ यह भी आभास हुआ कि यदि जीवन की तड़प कृष्ण के ही माध्यम से मिटेगी तो फिर कृष्ण के पास जाने का चुनाव क्यों करना पड़ता है कुछ लोगों को? यह मेंडेटरी क्यों…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न भक्ति को लेकर है। हमने बचपन से यही सीखा है कि भक्ति ज्ञान की माता है। भक्ति का अर्थ सगुण भक्ति, लेकिन आपने हमें समझाया है कि जानने से प्रेम भक्ति है। तो असल में भक्ति का क्या अर्थ है?

प्रश्नकर्ता: मैं एक धार्मिक परिवार से हूँ, छोटी उम्र से ही परिवार में मुझे सत्संग, कीर्तन वगैरह का माहौल मिला। आपसे जाना है कि संगत, शास्त्र, भजन-कीर्तन जीवन को ऊँचा उठाते ही हैं। पर मैं तो अभी भी ख़ुद को बहुत पिछड़ा पाता हूँ जबकि बचपन से ही घर में

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हम आदमी की सत्ता से बड़े किसी सिद्धांत में विश्वास क्यों करें? कोई परम् सत्ता, परमात्मा, भगवत्ता इत्यादि है, इसमें यकीन ही क्यों करें?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, ऐकडेमिक्ली (शैक्षणिक दृष्टि से) मैं एक साइंस बैकग्राउंड (विज्ञान प्रष्ठभूमि) से हूँ लेकिन मैं एक चीज़ नोटिस (ध्यान देना) करती हूँ कि आज आम आदमी के मन में विज्ञान के प्रति बहुत अनादर है। और यह सिर्फ़ भारत में ही नहीं है, भारत के बाहर भी अन्य

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत्।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हर समय परमात्मा याद कैसे रहे?



प्रश्नकर्ता: मुझे बचपन से सच्चे प्रेम की तलाश थी। मैंने कई आध्यात्मिक ग्रन्थ पढ़े। ख़ुद के साथ बैठने का प्रयास किया और जाना भी कि सच्ची शान्ति अपने में ही है। मैंने अलग-अलग दर्शन, अलग-अलग आध्यात्मिक साधना,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं किसी भी मूर्ति के सामने सर नहीं झुका पाता हूँ, जैसे मेरी आत्मा इजाज़त नहीं देती इसके लिए। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: यहाँ कोई ऐसा नहीं है जो मूर्ति-पूजक न हो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सतनाम को याद करने का क्या मतलब है?



आचार्य प्रशांत: ‘भक्ति’ शब्द के मूल में ही विभाजन है। वहाँ पर दो का होना पक्का है। एक 'मैं' और मेरे द्वारा रचा गया पूरा संसार, और दूसरे 'तुम'। जो पहला है इसके केंद्र पर 'मैं' बैठा हूँ, और इसका पूरा संसार मेरा है। संसार में जो भी कुछ मैं

प्रश्नकर्ता: आखिरी सवाल है। वह यीशु मसीह के शूली चढ़ने को लेकर, उस विषय पर है। सवाल बिलकुल वह नहीं है पर वो जिस परिवेश में है, उस परिवेश के बारे में मैं आपसे जानना चाहूँगा। ईसाईयों में, या जो लोग यीशु मसीह को या ईसाई धर्म को भी मानते

अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।
ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।
मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।
वक्ता: इसका जवाब देना बहुत आसान हो जाता अगर तुमको वाकई पता ही ना होता, अगर पहले ये शब्द कभी सुन ही न रखा होता। अगर कोई बिल्कुल साफ़ स्लेट के साथ ये सवाल पूछे, ‘भगवान का क्या मतलब है?’ तो इसका जवाब देना…
बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।
आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न…
आचार्य प्रशांत: नहीं! देखिए, थोड़ा–सा मैं इसमें मुझे अनुमति दीजिएगा, मैं इसमें विस्तार से बोल सकूँ। ये…
आचार्य प्रशांत: यहाँ चल रहे हैं उपनिषद् और उसके (एक श्रोता की ओर संकेत) दिमाग में खाना और खटिया है। ये आदमी घटिया है। सब घटिया है। किसी एक की नहीं बात हो रही है आदमी ही घटिया है।‘आचार्य जी, आप तो मनुष्यमात्र के गौरव की ज़रा भी परवाह…
प्रश्नकर्ता: मुझे ईश्वर में विश्वास करना कठिन लगता है। मैं क्यों मानूँ कि कोई महान या संचालक सत्ता कहीं है या सब कुछ चला रही है।
अगर मैं नास्तिक हूँ और ईश्वर में विश्वास नहीं करता, तो क्या मैं आध्यात्मिक नहीं हो सकता?
आचार्य प्रशांत: अच्छा मुद्दा है, सबके काम…
प्रश्न है, आचार्य जी, आपके बहुत सारे वीडियो में मैनें देखा कि आप जीवन के प्रति काफ़ी नकारात्मक सोच रखते हैं। आपने एक वीडियो में…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सपनों में या ध्यान में किसी भी भगवान के दर्शन हो जाने को बड़ा महत्व दिया गया है, लोगों को ध्यान में शिव दिखते हैं और ऐसी बहुत कहानियाँ और भी प्रचलित हैं, ये सब क्या है कृपया स्पष्ट करें?
आचार्य प्रशांत: और शिव का भी वही…
आचार्य प्रशांत: भक्ति का मतलब होता है ये अनुभव, पीड़ा, निश्चित धारणा कि जो कुछ अच्छा है, ऊँचा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूर छिटक आये हैं — पहली बात। जो कुछ ऊँचा है, अच्छा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूरी बन गयी है — कोई होगी वजह,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हाल ही में वीडियो प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है — “हिन्दू इतने देवी-देवताओं को क्यों पूजते हैं?” तो उसमें भी आपने यही समझाया था कि पूजन या पूजा तो देवी-देवताओं की ही हो सकती है, क्योंकि ब्रह्म की हम पूजा कर नहीं सकते। उसी सिलसिले में…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, बहुत लम्बे समय तक कई वर्ष मैंने ध्यान की विधियों का प्रयोग करा, उसके बाद ईश्वर ने मुझे ओशो जी के पास भेज दिया और अन्ततः ओशो जी से ईश्वर ने मुझे आपके पास भेज दिया। तो अब आप ही मुझे बताइए कि मुझे ईश्वर कैसे मिलें।…
इसी तरीक़े से…
आचार्य प्रशांत: जी, स्वागत है! बताइए।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। कल मेरी एक ऑनलाइन प्रतिभागी सोमेश जी से बात हो रही थी, तो मैंने पूछा कि आज की कार्यशाला के लिए उनका प्रश्न क्या है। एक अजीब-सी बात उन्होंने कही कि आचार्य जी ने गीता पर जो चर्चा करी है उससे…
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि बहुत सारी कहानियों में, जैसे राम और कृष्ण की कहानी हम पढ़ते हैं या कोई और भी। इन अवतारों को बचपन से ही बहुत ऐसे दिखाया जाता है कि इनमें बचपन से ही सारे गुण थे, या ये बचपन से ही अच्छे थे, निपुण…
चार राम हैं जगत में, तीन राम…
प्रश्नकर्ता: भगवान हैं या नहीं हैं?
आचार्य प्रशान्त: मन को ही सुलझा लेने का नाम भगवान है। फ़िल्म आयी थी न, उसमें बोलता है, 'अपुनिच(मैं ही) भगवान है। कभी-कभी अपुन को लगता है, अपुनिच भगवान है।' तो भगवान अगर तुम्हारी कहानी का एक किरदार है तो फिर तुम ही भगवान…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। आज का विषय लोगों को बड़ा रोमांचक लगने वाला है। जिस विषय पर हम बात करने जा रहे हैं वो है — धर्म। ये विषय सुर्खियों में रहता है, इसी पर बहुत चर्चा हो रही है, बहुत सारी बातें चल रही हैं।
तो ये जो हंगामा है…
आचार्य प्रशांत: शोभित हैं, कह रहे हैं, 'पूरे दिन में खेलना ही अच्छा लगता है। खेलते समय कोई बहाना नहीं मारता और अगर दिमाग़ में कोई बहाना आता भी है तो भी मैं खेलने लग जाता हूँ। खेल में ऐसा क्या है?'
खेल में कुछ विशेष नहीं है पर खेल…
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य प्रशांत: किसी और की ख़ातिर आप नहीं यकीन करेंगे, अपनी ख़ातिर करना पड़ेगा। क्योंकि अगर आप ही…
जिस प्रकार अनेक नदियों का जल समुद्र में निरन्तर प्रविष्ट होता रहता है, किन्तु समुद्र उससे विक्षुब्ध नहीं होता अर्थात् बढ़ नहीं जाता, इस प्रकार आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित जिस योगी के मन में विषय की चिन्ताएँ प्रविष्ट होकर…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले छः महीने से सुन रही हूँ और मेरा प्रश्न पहले सत्र से जुड़ा हुआ है। तब आपने कहा था और मैं मानती भी हूँ कि जो ब्रह्म है वही सत्य है। और जो निराकार है, जिसे हम ईश्वर भी कहते हैं, सामान्य भाषा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ‘नाम’ के बारे में समझाइए, क्योंकि कबीर साहब बोलते हैं सद्गुरु नाम है। और कोई बोलते हैं कि सोऽहं ये नाम है, कोई बोलते हैं कि सुनने वाला जो नाद है वही नाम है। तो कृपा करके नाम के महत्व को समझाइए और बताइए कि नाम क्या…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर कौन है और उसने संसार कि रचना क्यों करी?
आचार्य प्रशांत: ठीक है, बैठो। तो यह बड़ा महत्वपूर्ण सवाल है क्योंकि सत्य में या ब्रह्म में हमारी कोई रुचि हो-न-हो लेकिन ईश्वर में सबकी रुचि होती है और धर्म का सम्बन्ध ही ज़्यादातर ईश्वर से जोड़कर…
सन्तों ने नाम सुमिरने पर बहुत ज़ोर दिया है। वो कोई विशेष नाम नहीं है, किसी ख़ास नाम की बात…
आचार्य प्रशांत: देखो जो बिल्कुल मूल, फंडामेंटल (मौलिक) बात है वेदांत की, उसको समझो। "सत्य एक है, वह अपनी मर्ज़ी से, अपनी लीला से, अपनी मुक्ति से, अपनी स्वेच्छा से अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता है; कोई कारण नहीं है, अकारण ही, यूँ ही।" अभिव्यक्ति उसकी मौज है, इसी तरीके…
◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।
◾ मिथ्याचारी वह है जो आगे के लालच में अच्छा काम करता है।
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम ये बात करते हैं कि बेड़ियाँ काटनी हैं या पुराने ढर्रों से बाहर निकलना है। तो जैसा कि आपने गीता के सत्र में कहा था कि जब कृष्ण कहते हैं कि, "या तो मेरी सुन ले या मेरी माया की सुन ले।" तो हमें ऐसा…