कितने तल, और कितने बंधन || आचार्य प्रशांत, नारद भक्ति सूत्र पर (2014)

लोकोऽपि तावदेव भोजनादि- व्यापारस्त्वाशरी रधारणावधि।।१४
द वर्ल्डली ड्यूटीज़ इन द वेरियस कॉन्ट्रैक्टस आर ऑल्सो टू भी पर्फॉर्म्ड ओन्ली टू दैट एक्सटेंड (सो लॉन्ग एज़ द कॉन्शियसनेस ऑफ़ द एक्सटर्नल वर्ल्ड कंटिन्यूज़ विद अस) बट एक्टिविटीज़ सच एज़ ईटिंग एटˈसेट्रअ, इनडीड विल कंटिन्यू एज़ लोंग एज़ द बॉडी इग्ज़िस्ट।
भिन्न-भिन्न लोकों में सांसारिक क्रियाएँ भी उतनी ही (जितनी मात्रा में बाह्य जगत की चेतना अपने साथ ले जाती है) की जाती हैं, परन्तु भोजन आदि क्रियाएँ तब तक चलती रहेंगी जब तक शरीर है।
~सूत्र १४ (नारद भक्ति सूत्र)
आचार्य प्रशांत: जब तक लग रहा है कि अभी जगत महत्वपूर्ण है तब तक संसार और संसार में मौजूद समाज बना रहेगा और तुम उनको निभाओगे भी। लेकिन जैसे-जैसे तुम्हारे लिए ये सब गैर महत्वपूर्ण होते जाएँगे, तुम्हें निभाने की आवश्यकता भी कम महसूस होगी। अंततः आवश्यकता शून्य हो जानी है।
हमने बात करी थी कि हम तीन तलो पर होते हैं—सामाजिक, प्राकृतिक और आत्मिक। तो यह पहले तल की बात हो रही है। कहा जा रहा है कि “सामाजिक तल से शनै-शनै पूर्णतया मुक्ति मिल जानी है।“ लेकिन साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि “प्राकृतिक तल से पूर्ण मुक्ति तब तक नहीं मिलेगी जब तक शरीर है।“ तो वही लिखा है कि जब तक शरीर है तब तक खाओगे तो है ही, उतनी तो क्रिया रहनी ही है।






