
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।
















आचार्य प्रशांत: आनंद फ़िल्म में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की जो आपसी नोंक-झोंक होती थी, बड़ी दिलचस्प थी — कि ज़िंदगी तुमको बड़ी चाहिए कि लंबी चाहिए। ‘बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी चाहिए या लंबी चाहिए?’



आचार्य प्रशांत: सुनिकेत जोशी हैं दोहा, कतर (देश) से। कह रहे हैं, ‘पिछले सत्र में मुझे समझ आया कि जीवन ही गवाही देगा अध्यात्म पथ पर सही चलने की। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है। तो आचार्य जी, किससे पूछे या कैसे पता चले कि सही जीवन जी रहे




प्रश्नकर्ता: सर, रिलिजन (मज़हब) को मानने का रीज़न (कारण) सिक्योरिटी (सुरक्षा) के अलावा कुछ और...

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) डर को लेकर है। अभी तीन दिन मैंने यहाँ वालंटियरिंग (स्वयं सेवा) की; दिन अच्छे गुजरे; मज़े में निकल गये। लेकिन अभी ‘मीट द मास्टर’ के लिए यहाँ पर मैसेज (संदेश) रिकॉर्ड करना था।मेरा काफ़ी मन था आगे आकर बोलने का




आचार्य प्रशांत: तो अपना झूठ स्वीकार करना, अपनी चोरी भी स्वीकार करना, अपनी कमज़ोरी भी स्वीकार करना उसी के लिए सम्भव हो पाता है, जिसने जीवन में कुछ ऊँचा अर्जित भी किया हो। इसीलिए आप पाएँगे, जिन लोगों ने जीवन में वाकई ऊँचाईयाँ छुई, वो बड़ी आसानी से अपनी कमज़ोरियाँ

प्रश्नकर्ता: सर (महोदय), ये मेरा प्रश्न अपमानित करने के लिए नहीं है। तो जब आप कहते हैं कि— हमने शुरू में ही बात की थी कि


प्रश्नकर्ता:(प्रश्नकर्ता को हकलाने की समस्या है) गुरूजी को सादर प्रणाम। शुरू से लोगों से बात करने पर बहुत ज़्यादा डर लगता है। जब मैं किसी ज़्यादा पढ़े-लिखे से बात करता हूँ। तब जुबान लड़खड़ाने लगती है।देश, समाज, संस्कृति, को देखकर बहुत कुछ करना चाहता हूँ। बचपन से देश के


आचार्य प्रशांत: जिस दिन आपको पूरा भरोसा हो गया, आप अच्छी तरह साफ़-साफ़ जान गए कि इस शरीर से कुछ नहीं है जो आगे चला जाना है, उस दिन आपके ऊपर दो असर होंगे — पहली बात, आप ज़िंदगी को सही जीना जान जाएँगे। आपको साफ़ सुनाई देगी घड़ी की

आचार्य प्रशांत: इस जीवनकाल में न जाने किसके-किसके हाथों लूट रहे हो और भूल ही गये हो कि असली बाप कौन है, यहाँ किसी के हाथों लुटने की, यहाँ किसी से दबने की ज़रूरत है क्या, बताओ? और उसने (परमात्मा ने) पूरी व्यवस्था बना रखी है कि अगर तुम न…

आचार्य प्रशांत: मैंने तो यहाँ तक देखा है कि लोग कहते हैं कि सारी धार्मिकता बस एक वाक्य में यही है किसी को चोट मत पहुँचाओ। अरे! शायर बिलकुल आसमान पर खड़े होकर के घोषणा करते हैं कि ये हटाओ सारे धर्म-मज़हब, असली बात बस एक है, किसी को तकलीफ़…

“आज्ञा मानना बंधन है। भय बंधन है।”


आचार्य प्रशांत: डर के और भी फायदे होते हैं। एक मैंने गाना सुना था। गाने में लड़की-लड़का अकेले हैं, अंधेरी रात, बादल गरज रहे, वर्षा (हो रही)। और फिर वो गाते हैं: ‘बादल गरजा सिमट गए हम, बिजली कड़की लिपट गए हम, ये है कितना सुंदर मिलन!’ डरोगे नहीं तो



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप जिन लोगों के विरोध में बोल रहे हैं, जिनके बारे में इतना खुलकर बोल रहे हैं, वो लोग तो बहुत शक्तिशाली हैं। उनके पास राजनैतिक शक्ति है, मीडिया की ताक़त है, हर जगह वहीं छाये रहते हैं और पैसे का तो कहना ही क्या! अपार पैसा…


प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न थोड़ा कुतार्किक लगेगा, पर मुझे पूछना था। होता यह है कि अभी आप देखोगे हर तरफ़ क्या होता है कि हम आज का पेपर भी पढ़ेंगे, न्यूज़ चैनल हो या फिर कोई

प्रश्नकर्ता: गुरू जी, अपनी बातों से सबके जीवन का रस क्यों ख़त्म कर रहे हो? कुछ तो एक्साइटिंग (रोमांचक) रहने दो। सब ज्ञानी हो जाएँगे तो दुनिया बड़ी अजीब हो जाएगी।

आचार्य प्रशांत: सच इतना डरा हुआ क्यों है? सच इतना डरा हुआ इसलिए है, क्योंकि घपला कर बैठा है। “लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊँ कैसे”।
किसी को जब मारना होता है तो आमतौर पर उसको मारने के लिए शुद्ध ज़हर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। काला, दहकता, गरल हो विष,…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में अनिश्चितता (अनसर्टेनिटी) से डर क्यों लगता है?

डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।
डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।
दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!
अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।
सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।
एक से मुक्त होओगे तो दूसरे के पास चले जाओगे। ये कोई मुक्ति नहीं है, एक से मुक्त होकर के दूसरे की ओर आकर्षित हो जाना कोई मुक्ति नहीं है। और जब भी एक से मुक्ति की बात करोगे, तो दूसरे की ओर आकर्षित होओगे ही होओगे, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति किसी संदर्भ में है।
डर चेतना की सबसे बड़ी बीमारी है। यह आदमी को संकुचित कर देता है। डर मान्यता से उठता है। जहाँ मान्यता है, वहाँ डर होगा ही। इस बात पर डरे रहो कि कहीं ज़िंदगी से सच्चाई विदा न हो जाए — लेकिन लोग डरे हुए हैं कि कहीं ज़िंदगी से बंधन न छिन जाए। विषयों को ज़िंदगी से खदेड़ने की बात नहीं है; सच्चाई के आधार पर जीने की बात है। उसके बाद न कुछ बहुत प्यारा लगता है, न कुछ बहुत डरावना लगता है।
डर दो तरह का होता है। हम सब तरीक़े के छोटे–छोटे डरों में लिप्त रहते हैं; और जो एक डर हमें लगना ही चाहिए, उसे हमने छुपा रखा है। हम पूरी दुनिया से डरते हैं, बस जीवन के व्यर्थ चले जाने से, अमुक्त रह जाने से नहीं डरते। असली डर अगर जीवन में आ गया, तो ये सब छोटे–छोटे, क्षुद्र डर विदा हो जाएँगे।
मैं तुमसे कह रहा हूँ कि डरो मत, नक़ली हटेगा तो असली चमकेगा। तुमको ऐसा लगता है जैसे कोई तुम्हारी करोड़ों की जमापूँजी है और मैं उसको तुमसे छीने ले रहा हूँ। तुम्हारे पास कुछ नहीं है, जिन रिश्तों को तुम पकड़ कर बैठे हो बेटा, वो रिश्ते धूल बराबर हैं क्योंकि वह प्रेम पर आधारित नहीं हैं। ईमानदारी से अपने दिल को टटोलोगे तो जान जाओगे। तो वह गन्दगी अगर मैं तुमसे छीन भी रहा हूँ तो उसे छिनने दो, प्रतिरोध मत करो। गन्दगी हटेगी तो साफ़-साफ़ कुछ और चमकेगा, मस्त रहोगे, प्रसन्न रहोगे।
मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता।
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा।।
प्रश्न: सर, क्या यह पंक्तियाँ सही कह रही हैं?
उत्तर: विवेक,
छल रहित होना कभी कमज़ोरी नहीं होती।
निश्छलता आती है इस गहरी आश्वस्ति के साथ कि मुझे छल, धोखा, चालाकी की ज़रुरत…
डर और तनाव मूलतः इसी भाव से निकलते हैं कि कोई दूसरा है जो मेरा कुछ छीन सकता है और कोई दूसरा है जो मुझे कुछ दे सकता है। जब तक तुमने यह धारणा बाँध रखी है, डर और तनाव से मुक्ति संभव नहीं। सदा अपने आपको यही बताओ — मैं लाख गिरूँ तो भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता। जब इस भाव में जियोगे, तब न डर रहेगा न तनाव।
हर डर दूसरे का ही होता है, और कोई डर है ही नहीं दुनिया में, एक ही डर है — दूसरे का डर। क्योंकि हम अपने आप को जानते नहीं, और अपनी वही छवि बना लेते हैं जो दूसरे हमें देते हैं। सिर्फ़ एक कल्पना है और वो कल्पना दूसरों की कल्पना है, ‘दूसरे क्या कहेंगे?’ सदा तुम दूसरे से ही डरे हो। जिसने दूसरों की गुलामी छोड़ दी, जो दूसरों पर आश्रित नहीं रहा, अब उसके जीवन में डर भी नहीं रहा।
आचार्य प्रशांत: अपनी हस्ती पर भरोसा करिए। आप अपनेआप को जितना जानते हैं, आप उससे कहीं ज़्यादा सामर्थ्यवान हैं। अपना आकलन आप बड़ी हीनता में करते हैं, अंडरएस्टिमेशन (कम आँकना)।
छोटे नहीं हैं आप, विश्वास करिए। उसी ऊँचे विश्वास को श्रद्धा भी कहते हैं। कि जाने दो जो जाता है,…
आचार्य प्रशांत: इमेज की परवाह करने का मतलब होता है कि ये जो आस-पास के लोग हैं, ये बड़े महत्त्वपूर्ण हैं मेरे लिए। कि ये क्या कहेंगे मेरे बारे में, वो बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है।
आदमी छोटी बातों में तो दूसरों से ज्ञान ले सकता है क्योंकि ज्ञान किसी का…
आचार्य प्रशांत: खास बात समझो तो उनमें क्या है? देखो, किसी की सीधे-सीधे निन्दा कर देना बहुत आसान होता है। और किसी को देवता बनाकर के उसकी पूजा करने लगना, ये भी आसान ही होता है। पर इंसान को इंसान की तरह देखना और उसका सही मूल्यांकन करना वो ज़रूरी…
लंबी चाहिए तो खूब नकारात्मकता से भरे रहो। जितना तुम शक्की रहोगे, प्रकृति ने संयोग…
होश का मतलब यही होता है — अपनी वर्तमान हालत के प्रति ईमानदारी। सब जानते हैं पर भीतर इतनी तामसिकता भरी हुई है कि कौन संघर्ष करे इस कैद, इस पिंजड़े, इस कसाई के ख़िलाफ़।मदद मिलती है, सहारे आते हैं, चमत्कार होते हैं थोड़ा भरोसा तो रखो। और नहीं होंगे चमत्कार तो अधिक–से–अधिक क्या होगा? मर ही तो जाओगे, मर तो वैसे भी रहे हैं। तो भविष्य की नहीं सोचनी है, वर्तमान के ख़िलाफ़ विद्रोह करना है। जो भविष्य की सोचते हैं, उनका वर्तमान वैसा ही चलता रहता है जैसा चल रहा है।
डरों को जीता नहीं जाता, "डरों को भूला जाता है।" बहुत सारे जो डर होते है न, वो प्रेम में ही तिरोहित होते हैं। अपने आपको प्रेम में पड़ने का अवसर तो दो। जो सत्य के प्रति जो परम प्रेम होता है, वो ऐसे साहस से भर , जिसे मैं कह रहा हूँ "साहस कहना भी ठीक नहीं है", वो एक तरह की सहजता है। तुम सहज ही बहुत सारे साहसिक काम कर डालोगे, बिना साहस का उपयोग किए। प्रेम साहस से ऊपर का होता है। जहाँ प्रेम है, वहाँ साहस चाहिए ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मैं आपको लगभग छह महीने से मैं सुन रहा हूँ और मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है।
मैं आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूँ कि हमें हमेशा कुछ-न-कुछ चुनाव करना होता है कि ये करें या तो ये करें।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं तीस वर्ष का हूँ। एक दशक से ज़्यादा से बाइपोलर डिसॉर्डर (दोध्रुवी विकार) की समस्या से जूझ रहा हूँ। ओशो जी द्वारा सुझाई विधियों ने कुछ मदद भी की। परिवार के साथ ही रहता हूँ। कोई काम नहीं करता हूँ। आप कोई विधि बताएँ। परिवार…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। जो सवाल मैं पूछना चाहती थी, वह सवाल किसी दोस्त ने ही पूछ लिया। एक बहुत गर्व की बात लगती है और हर्ष की बात है कि हमारे जो चैनल्स हैं, उसके सब्सक्राइबर्स और व्यूअर्स की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बहुत खुशी होती है…
यस्यामिमे घण्नरदेव दस्यव: सार्थ विलुम्पन्ति कुनायकं बलातू। गोमायवो यत्न हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं बवृका:।।
अर्थ: महाराज, उस जंगल में छ: डाकू हैं। इस वणिक समाज का नायक बड़ा दुष्ट है। उसके नेतृत्व में जब यह समाज वहाँ पहुँचता है, तब ये लुटेरे बलात उसे लूट लेते हैं।
~ परमहंस गीता…
आचार्य प्रशांत: बिलकुल भी कुछ और नहीं है। तुम देखो न, पुराना आदमी है आदिमानव... सूर्यग्रहण आया, सोलर इक्लिप्स तो वो क्या बोलेगा? वो बोलेगा कि आज किसी राक्षस ने सूरज को पकड़ लिया है…
प्रश्नकर्ता: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं?
आचार्य प्रशांत: हम ध्यान में डर क्यों जाते हैं? डर का या बेचैनी का या किसी भी तरह के विचित्र या विशिष्ट अनुभवों का सामना किस-किस का हुआ है, ध्यान में? कि ध्यान की किसी भी विधि का उपयोग किया। श्रवण भी…
आचार्य प्रशांत: आपको जिस भी चीज़ का डर लगेगा वो कभी-न-कभी तो होनी ही है कि नहीं होनी? दुनिया में मुझे बताना कौन-सी चीज़ है जो नष्ट कभी हुई नहीं, न होने वाली है। और डर सदा इन्हीं चीज़ों का होता है न — कुछ नष्ट हो जाएगा, कुछ नहीं…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्रान्ति लाने के लिए धारणा पर काम करें कि मैं अभी आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ, मन नहीं हूँ या फिर स्वीकारें कि अभी मैं शरीर हूँ, अहंकार है तो क्रान्ति आएगी, आत्मा राम तक पहुँचेंगे। दोनों में से कौनसा?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी के साथ ज़रा…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आचार्य जी मुझे असफलता से बहुत डर लगता है। मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ। मन पढ़ते-पढ़ते परिणाम के बारे में सोचने लगता है और फिर बिल्कुल जम जाता है, डर लगता है आगे बढ़ने में। मैं डांसिंग ब्वाय कैसे बनूँ जिससे पढ़ाई भी…
आचार्य प्रशांत: आज्ञा का अर्थ है– विशेषाधिकार किसी का, किसी के पीछे सुनना, किसी को बहुत ऊँचा स्थान दे देना, किसी को प्रथम मान लेना। आत्मा और आज्ञा साथ-साथ नहीं चलते। आत्मा किसी की नहीं सुनती। आत्मा किसी की आज्ञा पर…
आचार्य प्रशांत: अब किसी के जीवन के सारे ढर्रे ही तनाव, ऊब, बैचैनी से भरे हुए हैं और वो कहे, ‘मुझे सिगरेट छोड़ देनी है’। सिगरेट की आदत छूटेगी नहीं क्योंकि आपके पास पाँच और आदतें हैं जो सिगरेट को आमन्त्रित करती हैं। जब तक आप उन पाँच और आदतों…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था। जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था। पिछले हफ्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्र: जब मैं कुछ लोगों को सुनता हूँ, जैसे कुछ ज्ञानी लोग, वो लोग बात ये कहते हैं कि आज-कल के युवाओं में हो चाहे जो भी लोगों में, जीवन जिस तरह से वो जिये हैं उनको उनके जीवन में।
आचार्य: आप थोड़ा…
आचार्य प्रशांत: तुम्हारी हालत ऐसी है कि जैसे किसी आदमी की छाती में छुरा घुपा हुआ हो। और वो पूछ रहा हो कि इस शहर में सैंडविच कहाँ मिलता है। और जूतों का कोई नया ब्रांड आया है क्या बाज़ार में? और वो जो लड़की जा रही है, बड़ी ख़ूबसूरत…
आचार्य प्रशांत: अरे, डरे हुए बेईमान आदमी! मक्कारी इतनी बढ़ गयी कि अभी तक ख़ुद से ही झूठ बोलते…
आचार्य प्रशांत: तुम बहुत इकट्ठा कर लो, बहुत बड़े हो जाओ तो भी सत्य नहीं मिलेगा। तुम बहुत छोटे हो जाओ तो भी नहीं मिलेगा। मिट के ही मिलेगा, बचाये-बचाये नहीं मिलेगा। तुम बचाये-बचाये जो अधिक-से-अधिक और जो कम-से-कम कर सकते हो, तुम सब आज़मा कर देख लो, तुम्हें असफलता…