भक्त पूरी सावधानी रखता है कि वो अपने ऊपर किसी भी तरह का भरोसा न कर बैठे। वो आख़िरी काम है जो उसे करना है, क्या? ख़ुद पर भरोसा; अपनी ही ताक़त या अपने निर्णय पर भरोसा। भक्त कहता है, ‘ये नहीं करना है क्योंकि यही कर-कर के तो अपनी दुर्गति करी है।’ तो भक्त कहता है, ‘अब मेरे सारे निर्णय कौन करेगा? मेरा भगवान करेगा। रास्ता कौन बताएगा? भगवान बताएगा।’
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आचार्य प्रशांत: भक्ति का मतलब होता है ये अनुभव, पीड़ा, निश्चित धारणा कि जो कुछ अच्छा है, ऊँचा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूर छिटक आये हैं — पहली बात। जो कुछ ऊँचा है, अच्छा है, सुन्दर है, शुद्ध है, उससे दूरी बन गयी है — कोई होगी वजह, कौन जाने, माया होगी या अपनी ही कोई भूल — और वो जो दूरी है वो अपने पाटे हम पाट भी नहीं पायेंगे। जो सुन्दर है, शुद्ध है, सत्य है, वही सामर्थ्यवान भी है। तो हम चूँकि उससे दूर निकल आये हैं, तो हमारे पास सामर्थ्य, बल भी नहीं बचा है कि अपने बूते उस तक पहुँच पायें।
बात समझ में आ रही है?
तो फिर भक्ति में एकमात्र विधि ये बचती है कि सिर को झुका दो, अपने आप को पूरी तरह उसके हवाले छोड़ दो जिस तक पहुँचना चाहते हो। जो मंतव्य है, जो मंज़िल है, उसी से कह दो कि रास्ता भी तुम ही बता सकते हो। हम इतने अक्लवान होते कि रास्ता वग़ैरह ख़ुद तय कर पाते, तो हम वैसे क्यों होते जैसे हैं, वैसे क्यों जीते जैसे जी रहे हैं।
तो भक्ति के पीछे भी एक दर्शन है। भक्ति कोई अंधी भावना का प्रवाह नहीं है। आपको ऐसा भ्रम हो सकता है क्योंकि भक्ति का सामान्यतः लोक-संस्कृति में जैसा वर्णन, चित्रण रहता है वो ऐसा ही रहता है कि भक्त का क्या काम है — कि वो अपने भगवान के सामने बैठकर गा रहा है, अपने आराध्य को सिर झुका रहा है, आँसुओं से उसका चेहरा तर-बतर है।




