आचार्य प्रशांत: “घूॅंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।” मन के कुछ सिद्धान्त हैं जो इससे एकदम सामने आते हैं उनको समझ लेना है। पहला, प्रत्येक प्राणी प्रेमी है प्राण माने प्रेम; अज्ञान में प्रेम की ही ऊर्जा कुछ और बन जाती है। कुछ और क्या? कामना, भय, ईर्ष्या, ममत्व, भुभुक्षा, भोगने की आतुरता, कामना कितनी भी विकृत हो उसका शुद्धतम रूप प्रेम ही होता है। ये पहला सूत्र है।
दूसरा, जिससे प्रेम है उसको पाने में प्रेमी का होना ही अड़चन है। मतलब, बाधा जो साध्य है उसकी ओर से नहीं है, जिससे प्रेम है उसकी ओर से कोई शर्त या बन्दिश नहीं है। जो वस्तु ढूॅंढी जा रही है वो कोई सूक्ष्म या गुप्त या दुष्प्राप्य नहीं है, सारी दिक्क़त ढूॅंढने वाले की ओर से है।
तो जिससे प्रेम है वो नहीं मिल रहा तो वजह जो प्रेमी है वो स्वयं है, और नहीं कोई वजह है। पिया कहीं छुपकर नहीं बैठे हैं।
जो ढूॅंढ रही है पिया को उसने अपने वजूद पर घूॅंघट डाल रखा है या उसने घूॅंघट को ही अपना वजूद बना रखा है। पहला सूत्र कहता है कि प्रेम तो है ही है, अगर साॅंस ले रहे तो प्रेमी हो, चेतना है अगर तो प्रेमी हो। कोई बहुत सड़ी-गली कामना भी करते हो तो भी हो तो प्रेमी ही। वैर में, ईर्ष्या में जले-फुॅंके जा रहे हो तो भी प्रमाणित तो यही होता है कि भीतर प्रेम है।
बहुत हिंसक हो रहे हो उससे भी यही पता चलता है कि भीतर प्राण हैं माने प्रेम है; बस वो जो प्रेम की ऊर्जा है उसने अज्ञान की अन्धेरी दिशा ले ली है, प्रेम की ऊर्जा ही जब ज्ञान का प्रकाश या ज्ञान का मार्गदर्शन जब वो नहीं पाती है, तो वो बहके हुए रास्तों पर चल पड़ती है।
तो ऊर्जा तो हमेशा प्रेम की होगी लेकिन उसको रास्ता चाहिए होता है ज्ञान से, और ज्ञान की रोशनी, ज्ञान का रास्ता न हो तो प्रेम की ऊर्जा बड़े विकृत और विनाशकारी रास्तों पर निकल पड़ती है।




