श्रध्दा और अंधविश्वास में क्या अंतर है? || आचार्य प्रशांत,वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल है कि श्रद्धा और अंधविश्वास में क्या अंतर है? आपने हमेशा ये सिखाया है कि चीज़ों को बस यूँ ही मान नहीं लेना है। उनको लॉजिकली (तार्किकता) देखना है कि बात सही है कि नहीं। और अक्सर मेरे साथ भी यही होता है कि जहाँ पर चीज़ों को लॉजिकली देखना चाहिए, वहाँ पर बिलिफ्स (आस्था) आ जाते हैं, अंधविश्वास आ जाते हैं। और जहाँ पर श्रद्धा होनी चाहिए, वहाँ पर मन में कुर्तक आ जाते हैं। तो फिर ये रेखा हम कहाँ खींचे, कैसे दोनों में भेद करें?
आचार्य प्रशांत: नहीं, श्रद्धा में कोई विश्वास होता ही नहीं है, तो अंधविश्वास कैसे होगा? श्रद्धा का कोई मतलब नहीं होता है। श्रद्धा का कोई अर्थ नहीं होता। श्रद्धा का कोई विषय नहीं होता। श्रद्धा का मतलब बस नकार में ही हो सकता है। नकार का क्या अर्थ है? झूठे विश्वासों की ज़रूरत नहीं है, ये श्रद्धा है। आप झूठे आसरे क्यों पकड़ते हो? क्योंकि आपको लगता है कि आपको उनकी ज़रूरत है, आपने उनको नहीं पकड़ा तो भीतर से ढह जाओगे।
कह देना कि मुझे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं है, मुझे किसी कवच की, किसी छत की, ज़रूरत नहीं है —– ये श्रद्धा है। श्रद्धा का मतलब ये नहीं होता कि कवच का, सुरक्षा का प्रबंध नहीं भी रखूँगा, तो भी मेरे साथ अच्छा-अच्छा होगा और सुखी रहूँगा। श्रद्धा का मतलब होता है कि मुझे सुख की भी ज़रूरत नहीं है। नहीं भी मिलेगा, तो भी कुछ नहीं हो गया। श्रद्धा का मतलब होता है, अकेला काफ़ी हूँ। किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है। तो एक तरह से श्रद्धा हो गया आत्मा में होना। आत्मा निसंग होती है, अकेली होती है — ये श्रद्धा है।
हम सहारों पर, भरोसों पर, मान्यताओं, विश्वासों पर, जीते हैं न, वो जब टूटने लगते हैं, तो कितना डर लगता है भीतर से, जैसे मौत ही आ रही हो। दाहरण के लिए एक धार्मिक आदमी है— और वो इसी मान्यता पर जीता हो, जो उसकी किताब में लिखी हैं कि एक दिन मेरे ईश्वर ने ऐसे-ऐसे करके पृथ्वी बनाई और फिर उसने ऐसा करा। उसमें पूरी प्रकिया लिखी होती है। फिर ये करा, फिर चार दिन तक ऐसा करा, फिर शनिवार को ये किया, इतवार को ये किया, फिर ऐसे आदमी बना, फिर औरत बनी, फिर फरिश्तों को ऐसी आज्ञा दी।


