
क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।















देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां हसड्भादजस्त्र परिवर्तते धियः। वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्धवेत्तावदसौ भवोद्धव: ।।






प्रश्नकर्ता: मैंने इस साल मई में पहली बार आपके सत्संग शिविर में हिस्सा लिया और इसके बाद मुझे शिविर का महत्व पता चला, क्योंकि अगर मैं ये शिविर नहीं लेती तो शायद मनोचिकित्सालय में होती।

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) सौरभ झांगिड़ हैं, कह रहे हैं कि “सर (महोदय), मुझे अपनी नौकरी में काफ़ी कोशिशों के बाद भी तरक्की नहीं मिल पा रही है। मैं सेल्स-विभाग में हूँ, और मेरे सीनियर्स का कहना है कि मैं क्लाइंट्स का मन नहीं पढ़ पाता हूँ…


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी मेरा सवाल है कि मुझे पता है कि समय काफ़ी सीमित है मेरे लिए। और इसे व्यर्थ करने की ज़रूरत नहीं है। इसको कुछ अर्थपूर्ण चीज़ों में लगाने की ज़रूरत है। मैं कोशिश भी करता हूँ इसके लिए। लेकिन समस्या है कि कई सारे


प्रश्नकर्ता: अगर एक गाय के सामने माँस रख दिया जाए तो वह तो नहीं खाएगी पर अगर एक शेर या इंसान के सामने रख दिया जाए तो वह खा लेते हैं, इसका मतलब यह है कि माँस खाना इंसान की कुदरती फितरत है।

आचार्य प्रशांत: केला तक तो खाते हो तो छिलका उतारकर खाते हो और बातें किसी की यूँही समूची निगल लेते हो, बिना देखे कि इसमें क्या लगा है। डॉक्टर हैं, बच्चों को समझाते होंगे सब्जी भी पहले रगड़-रगड़ कर धोना, छिलका उतारना, फिर पकाना और बातें कीचड़ मेंं लथपथ हो



प्रश्नकर्ता: सर, हृदय का अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: अर्थ, मन गढ़ता है। उसका कोई भी यदि आपको अर्थ दिया जाएगा तो आप उसके बारे में सोचना शुरु कर देंगे, उसके बारे में फिर से एक मानसिक धारणा बना लेंगे। अर्थ मत पूछिए, बस इतना समझ लीजिए कि मन सीमित…


प्रश्नकर्ता: कहीं-न-कहीं आज के समय में आम आदमी के मन में ये बात बहुत गहरे बैठ गयी है कि शायद बिना आसन जमाए, बिना कुछ ऐसा करे कि कुछ मन्त्र का जाप करे, कुछ भी करे बात नहीं बनेगी तो बहुत बार होता है कि लोग बोलते है कि आचार्य






विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।२.५९।।
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।

प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम। अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो समझ में तो आ रहा है कि


आचार्य प्रशांत: तुम पूछ रहे हो कि आज से चार-पाँच साल पहले खाते थे, पीते थे, खेलते थे, चैन की नींद सोते थे, अब नहीं होता, कुछ बदला है। तो तुम्हीं मुझे बताओ कि क्या बदला है।
प्रश्नकर्ता: बहुत कुछ बदला है।

आचार्य प्रशांत: (लिखित प्रश्न पढ़ते हुए) हर्ष हैं मुंबई से। कैसे हो हर्ष? आचार्य जी प्रणाम, आशीर्वाद। ईर्ष्या और द्वेष के विचार मन में क्यों आते हैं? क्योंकि ईर्ष्या और द्वेष ही मन है, हर्ष! मन जब बना था न और मन जब बनता रहता है, तो उसको बनाने की

आचार्य प्रशांत: ओपिनियन्स (राय) के मालिक के साथ रहिए तो ओपिनियन्स फिर आपके होंगे। हमारा ये हो जाता है कि हम

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन बन्दर की तरह उछलता-कूदता बहुत है। दृढ़ निश्चयी नहीं है। अपना शत-प्रतिशत सच्चाई के साथ किसी काम में दे नहीं पाती। क्या मेरा जीवन ऐसे ही अधूरेपन में कट जाएगा? इस कारण मुझे बेचैनी रहती है कि क्या ज़िन्दगी यूँही निकाल देनी है।
आचार्य प्रशांत: जाड़ों…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या हम शरीर और मन के अतिरिक्त भी कुछ हैं?

प्रश्नकर्ता: मेरा नाम पूनम साहू है और मै जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट

आचार्य प्रशांत: देखो ये, बादल है। और अभी बादलों को देखकर के ये भ्रम हो जाता है कि जैसे कोई आकृति हो। पर वो भ्रम भी इसीलिए हो पा रहा है क्योंकि उनके पीछे सूरज है। है न?
तो अगर कोई भ्रमित भी है, अगर कोई इल्यूज़न में भी है,…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। पिछले शिविर में जब आपसे वार्तालाप हुई थी तब, तब से थोड़ा ज़्यादा पता चला कि आप जो अहम्-अहम् कहते रहते हैं, उसका क्या मतलब है। मतलब वह मैं उससे ही चिपक जाता हूँ और मैं उसको ही केंद्र में रखकर कार्य करता हूँ।
तो ये…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…
कोई आदत अच्छी नहीं होती; ‘अच्छी आदत’ जैसा कुछ नहीं होता है। एक आदमी सुबह उठते ही वॉक पर निकल जाता है — न सोचा, न समझा। उसकी मूल आदत वॉकिंग नहीं है, मूल आदत है न सोचना, न समझना। जो कुछ अंधेपन या बेहोशी में किया जाए, वही आदत है। आप जो कुछ कर रहे हो, देखो कि वो आदतवश ही हो रहा है। एक बार यह देख लोगे, तो कर्ता बदल जाता है।
तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।
साक्षी भाव इत्यादि का अनुभव करने की होड़ बिलकुल त्याग दो, साक्षी भाव का कोई अनुभव नहीं होता है। साक्षित्व सर्वप्रथम कोई भाव होता ही नहीं है, ये जुमला ही भ्रामक है — साक्षी भाव। और उससे ज़्यादा घातक है ये आकर्षण, ये लोभ कि मैं साक्षित्व का अनुभव कर लूँगा। साक्षित्व का कोई अनुभव नहीं होता। बेवकूफ़ियों के अनुभव में हम जीते हैं और अपनी बेवकूफ़ियों को हम ही ताकत देते हैं। वो ताकत देना बंद करो, साक्षित्व तो है ही।
जिसे तुम काबू में रखना चाहते हो, वो तुम्हारी छाया है। तुम जैसे हो, वो वैसी है। तुम उसे काबू में कैसे कर लोगे? मन निर्धारित ही इस बात से होता है कि तुमने अपने-आप को क्या समझ रखा है, क्या बना रखा है। तुम बदल जाओ, मन बदल जाएगा। इसलिए तुमने जो भी अपने-आप को बना रखा है, उसको समझो। ग़ौर से देखो कि क्या बना रखा है! फिर नहीं कहना पड़ेगा कि मन को काबू में कैसे करें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन पर लगी चोट से कैसे उबरें?
आचार्य प्रशांत: दूसरे काम करो। तुम्हें हर्ट (दर्द) पसंद है इसीलिए उसको पकड़ के बैठे हो। वो बंदर याद है न? एक मर्तबान था जिसका मुँह बड़ा सँकरा था, बंदरिया भी हो सकती है (श्रोतागण हँसते हैं।), चलो बंदर, चलो…
पहली कुसंगति आंतरिक होती है। मन ऐसा कुसंगी है जिसे बाहर कुसंग नहीं खोजना पड़ता। मन को अगर मन का साथ मिल जाए तो इससे बड़ा कुसंग नहीं। बाहर का कुसंग हटाना आसान है, पर भीतर वाला कुसंग, जहाँ आदमी अपने ही विचारों में फँसा है, "मैं हूँ और मेरे विचार हैं" - इससे बड़ी कुसंगति क्या हो सकती है? आंतरिक कुसंगति न हो तो बाहर का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।
जैसे शरीर को पोषण देते हैं, वैसे ही मन को पोषण दीजिए। फ़िल्म देखने से मन को पोषण नहीं मिल जाना है, मैच देखने से नहीं मिल जाना है। पार्टी करने से, ख़रीददारी करने से भी नहीं मिल जाना है। जहाँ मिलना है, वहाँ जाइए। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए।
हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि जो काम कर रहे हो उसमें हो जाओ। ये हो ही नहीं पाएगा। हम सोचते हैं वर्तमान में होने का अर्थ है कि इस वक़्त जो हो रहा है उसको अपना पूरा मन दे दो। ये हो ही नहीं पाएगा जब तक तुम अपनी उस जगह को उपलब्ध नहीं हो जाते जो वास्तव में है, जो वास्तव में प्रेज़ेंट (वर्तमान) है, जिसकी सत्ता सच्ची से सच्ची है, जो बदल नहीं सकती, जिसका कोई आना-जाना नहीं है। जब तुम वहाँ बैठे होते हो तब दुनिया भी तुम्हारी होती है और चूँकि हम वहाँ नहीं बैठे होते इसीलिए हम दुनिया में भी फिसड्डी रह जाते है।
प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र:…
प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…
मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित…
प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…
प्रश्नकर्ता: इंटरनेट से एक बहुत लम्बे समय तक मेरा कोई विशेष लगाव नहीं था। यूट्यूब भी मैंने तभी देखना शुरू किया जब आपको सुनने की आदत लगी है आपके कारण ही मैंने इंटरनेट पर ज़्यादा समय बिताना शुरू किया, पर अब ये हो गया है कि इंटरनेट पर मैं आता…
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतना आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में…
गुणानुरक्त्तं व्यसनाय जन्तो: क्षेमाय नैर्गुण्य मथो मन: स्यात्। यथा प्रदीपो घृत्वर्तिमश्रन् शिखा: सधूमा भजती ह्यन्यदा स्वम्।। पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मन: श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम्।।
विषयासक्त मन जीव को संसार-संकट में डाल देता है विषयहीन होने पर वही उसे शान्ति में मोक्ष पद प्राप्त करा देता है। जिस प्रकार घी से भीगी हुई…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं तीस वर्ष का हूँ। एक दशक से ज़्यादा से बाइपोलर डिसॉर्डर (दोध्रुवी विकार) की समस्या से जूझ रहा हूँ। ओशो जी द्वारा सुझाई विधियों ने कुछ मदद भी की। परिवार के साथ ही रहता हूँ। कोई काम नहीं करता हूँ। आप कोई विधि बताएँ। परिवार…
श्री भगवान् उवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:। सत्त्वेननान्यतमौ हन्यात् सत्त्वेन चैव हि।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम — यह तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्त्व के द्वारा रज और तम — इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर…
एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा मन बहुत भटकता है और जब भी मन को एकाग्र करने की कोशिश करता हूँ, तो एकाग्र नहीं हो पाता। तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: मैं तुम्हें बता दूँ कि मन को कैसे एकाग्र करते हैं ताकि तुम इसको…
मैं स्वयं साइकॉलोजी (मनोविज्ञान) की छात्रा हूँ, मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से साइकोलॉजी में बीए, एमए…
आचार्य प्रशांत: एक स्कूल था बच्चों का, छोटे बच्चे आते थे वहाँ एकदम। छोटे बच्चे आये वहाँ, खड़े हो और बड़े अपनेपन से और बड़े नाज़ से बोले, 'ये हमारा स्कूल है।' एक दिन वहाँ कुछ जंगली जानवर आ गये। उनको खबर मिल गयी थी कि यहाँ छोटे-छोटे बच्चे रहते…
प्रश्नकर्ता: मुझे ईश्वर में विश्वास करना कठिन लगता है। मैं क्यों मानूँ कि कोई महान या संचालक सत्ता कहीं है या सब कुछ चला रही है।
अगर मैं नास्तिक हूँ और ईश्वर में विश्वास नहीं करता, तो क्या मैं आध्यात्मिक नहीं हो सकता?
आचार्य प्रशांत: अच्छा मुद्दा है, सबके काम…
आचार्य प्रशांत: नहीं साहब, आप जो उदाहरण…
प्रश्नकर्ता: आपके साइन (हस्ताक्षर) देखें। आप बिल्कुल सरल तरीके से अपना नाम ही हिंदी में लिख देते हैं। तो आप ऐसे साइन क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: आपत्ती क्या है? कुछ उसमें गलत दिख रहा है क्या? दो बातें तुमने कहीं। पहली कि सीधे-सीधे अपना नाम लिख देते हैं और…
हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप ही के साथ रहकर पिछले कुछ समय से मुख्य उपनिषदों को पढ़ने का मौक़ा मिला। जब मुख्य उपनिषदों का पाठ कर रहा था तो मैंने एक बात उसमें देखी, जो बड़ी अजीब लगी। कि आज के समय में अध्यात्म का जो प्रचलित मतलब है, वो चक्रों…
प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते, चार साल से एक लड़के के साथ सम्बन्ध में हूँ। हम एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, पर प्यार के साथ रिलेशनशिप (सम्बन्ध) में रोमांस और इंटिमेसी (आत्मीयता) भी आते हैं। आज इतने सालों में उसको देखती हूँ, तो दिखता है कि उसे तो सिर्फ़ फिजिकल लव…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, धर्म के किस्से-कहानियों में एक नायक की तरह, एक सर्व शक्तिमान वीर या ज्ञानी की तरह बार-बार अवतारों का उल्लेख आता है। अवतार का क्या मतलब होता है? नरसिंह अवतार ने प्रहलाद को बचाया, वामन अवतार छोटे थे, बौने थे, परशुराम क्रोधित रहते थे, मत्स्य अवतार मछली…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने स्वयं का अपमान करने की बात कही थी, तो स्वयं का अपमान मतलब अहम् को नकारना है। तो क्या शरीर की आवश्यकता को भी नकारना है इसमें?
आचार्य प्रशांत: अहम् की आवश्यकता को नकारना है। जिस हद तक शरीर की आवश्यकता – शरीर की है, पूरी…
प्रश्नकर्ता: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: इसका जो शास्त्रीय तरीक़ा है बताने का, शुरुआत वहाँ से करेंगे। दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। और उसके अलावा होता है अन्तःकरण। अन्तःकरण क्या? अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं। कौन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…
आचार्य प्रशांत: कंडिशनिंग से अहम् का निर्माण नहीं है, कंडिशनिंग से…
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।
~ नितनेम (अनंदु साहिब)
बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।
“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”
प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड…
प्र: सर, हम लोग…
दोनों का अन्तर समझिये। मेरे होने से मेरी बात निकले, वो एक बात है और दूसरी चीज़ है कि मैं बातों का गुलाम…
आचार्य प्रशांत: अगर शरीर और मन है, तो कौनसी आत्मा? तुमने पूछा, 'शरीर और मन के अतिरिक्त कुछ होता है?' माने तुमने दो का होना तो पक्का मान ही रखा है, किसका?
श्रोतागण: मन और शरीर।
आचार्य:…
आचार्य प्रशांत: परिस्थिति तो परिस्थिति है न?
प्र: वो जो विपरीत परिस्थितियाँ है; जैसे कि कोई हमारा काम…