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भक्त और भगवान का उल्टा खेल || आचार्य (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: यहाँ खेल उल्टा है, पता नहीं इसमें भक्त कौन है, भगवान कौन है। आप खड़े हुए हो अकड़कर, तनकर (कमर पर दोनों हाथ रखकर अकड़ने का संकेत करते हुए)। और वह जिसको भगवान कहते हो, सत्य कहते हो, वह एक घुटने पर झुका हुआ है आपके सामने और कह रहा है मान जाओ, मान जाओ; चिरौरी कर रहा है। और आप ऐसे कर रहे हो (चेहरे पर ऊब का भाव दर्शाते हुए) ‘अरे नहीं! कौन? जा न भाई रास्ता दे, बहुत आते हैं तेरे जैसे।‘

(श्रोतागण हँसते हैं)

कहने को वह है ऑलमाईटी , सर्वसामर्थ्यशाली, और एक उसने क़सम खायी हुई है कि ज़बरदस्ती नहीं करूँगा। प्यार की बात है, उसमें ज़ोरा-ज़ोरी थोड़े ही चलती है।

छोटा बच्चा होता है आपका। ताक़त तो पूरी है आपकी, आप कुछ भी करवा लो उससे। उसमें क्या जान है बेचारे में? छोटा है। वह खाना नहीं खाता है लेकिन आप यह थोड़े ही करते हो कि उसको पकड़ के उसकी छाती पर पाँव रखकर के ठूँस दें। अभी कर दोगे तो वह क्या करेगा?

उसके पास तो किसी तरह का कोई हक़ नहीं है, क़ानूनन भी उसे कोई हक़ नहीं है। आप यह कर सकते हो, आप उसको ज़बरदस्ती खाना खिला सकते हो, उसके हित में है। ‘खाना नहीं खा रहा है कमज़ोर हो जाएगा, खा।‘ पर आप यह नहीं करते हो। वह आपको नाच नचाता है, आप नाच नाचते हो।

‘नहीं खा रहा हूँ मैं।‘

‘अरे! खा ले, भाई। तू भगवान है, तू खा ले (हँसते हुए)।

कौन इसमें भगवान है, कौन भक्त? खेल बड़ा उल्टा है। ऊपर-ऊपर से देखें तो ऐसा दिखाई देता है कि जैसे मंदिरों में हम जाते हैं, हमें बड़ी दरकार है भगवान की, हम प्रार्थना करते हैं। ‘अरे भगवान! आ जाओ, आ जाओ।‘

अंदर-अंदर जो खेल है वह दूसरा चल रहा है। अंदर यह चल रहा है कि भगवान हमसे रोज़ प्रार्थना करता है – ‘अरे! मान जाओ।‘ हम मना कर रहे होते हैं।

ऊपर-ऊपर से तो भगवान पत्थर है और मूर्ति बनकर अकड़ा खड़ा हुआ है, और आप प्रार्थी हैं। आप रोज़ जाते हैं और कहते हैं, ‘अरे! अन्नदाता, भाग्य विधाता (हाथ जोड़कर विनती करने का संकेत करते हुए) मान जाओ।‘ और अंदर ही अंदर क्या चल रहा है? कौन है वास्तव में अकड़ा खड़ा?

श्रोता: जो भक्त माँग रहा है।

आचार्य: भगवान भक्त से चिरौरी करते हैं, ‘अरे! मान जाओ, मान जाओ।‘ भक्त जिस दिन मान गया, उस दिन भक्त नहीं बचेगा। भक्त नहीं मान रहा, भगवान मनौती में लगे हैं।

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