
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…


















प्रश्नकर्ता: सर, सुबह जब मैं आया था और बैठा था गंगा किनारे। तो जो लोग घूमने आये थे, अभी भी जैसे हैं, तो लोग चिल्लाते क्यों हैं? जैसे मैंने भी अपने पर ध्यान दिया है, मैं भी बहुत चिल्लाता हूँ। तो ये चिल्लाहट क्यों है? कोई अभिव्यक्ति होती है?



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं आपके द्वारा लोगों को लाभ पाता देखता हूँ। इस शिविर में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो लाभान्वित हुए हैं, और अपनी कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं और साथ में संस्था के जो स्वयं सेवक हैं उनके कार्य को भी देखता हूँ, तो मेरा

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। गुरु पूर्णिमा पर आपको बहुत सारा धन्यवाद। आपके कारण मैंने ईशावास्य उपनिषद् पढ़ा, वैसे पहले बस में उपन्यास वगैरह ही पढ़ता था। सर, ये बताइए कि आपने अपनेआप को गुरु बुलवाने में इतना अनकम्फ़रटेबल (असुविधाजनक) क्यों रखा है? आप हमेशा खुद को गुरु बुलवाने में इतना अनकम्फ़रटेबल…

आचार्य प्रशांत: आपके और इस आश्रम के बारे में, आपके और संसार के बारे में, आपके और मेरे बारे में, कुछ बातें समझ लेना ज़रूरी है। आप किसी बाहरी जगह पर नहीं आये हैं, लगता ऐसा ही है। पर इंसान की आँखों का कुछ खास भरोसा किया जा नहीं सकता।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सही गुरु की पहचान कैसे करें? क्योंकि सारे रास्ते तो मन ही दिखाता है?


आचार्य प्रशांत: जो भीतर के अंधेरे को हटा सके, उसके लिए नाम दिया गया—गुरु। अब उस शब्द का जनमानस दुरुपयोग कर ले तो वो अलग बात है। ध्यान दीजिएगा, भीतर का अंधेरा। और भीतर के अंधेरे का ही नाम होता है, 'मैं' भाव। मैं, मेरा संसार, मेरे इरादे, मेरी इच्छाएँ,



आचार्य प्रशांत: तो ऐसे ही एक चेला था, शिष्य, जो भी कह दीजिए, साधक, श्रोता, जैसे भी; कई रूप में आते हैं वो। ठीक है? पाठक कह दीजिए कि पढ़ता था सिर्फ़ पुस्तकों को, जो भी कहिए। श्रावक कह दीजिए, जो भी। भिक्षु, संन्यासी, जो भी। तो वो एक गुरुजी…

आचार्य प्रशांत: मुझे कभी विज्ञान विरुद्ध बातें करते देखना, मुझे कभी ऐसी बातें करते देखना जिनको विज्ञान कभी स्वीकार नहीं करेगा, जिन पर विज्ञान हँस देगा। तुरन्त समझ लेना कि माया मुझ पर भी छा गयी।

“आज्ञा मानना बंधन है। भय बंधन है।”

आचार्य प्रशांत: एक मुहावरा चल गया है कि अरे किताबों में क्या है वहाँ तो खोखले और थोथे शब्द हैं, असली ज्ञान तो भीतर है, बच्चा ध्यान करो। गीता उठाकर के कचरे में डाल दो, बच्चा ध्यान करो और असली ज्ञान भीतर से निकलेगा। मेरे पास शब्द नहीं हैं इस…

आचार्य प्रशांत: इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि गुरु भ्रष्ट है और इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि गुरु और व्यापारी और राजनेता इन तीनों में साँठ-गाँठ हो गयी है। ऐसा पहले कम हुआ था। धर्म और राजनीति तो अतीत में भी हुआ है…



प्रश्नकर्ता: कहीं-न-कहीं आज के समय में आम आदमी के मन में ये बात बहुत गहरे बैठ गयी है कि शायद बिना आसन जमाए, बिना कुछ ऐसा करे कि कुछ मन्त्र का जाप करे, कुछ भी करे बात नहीं बनेगी तो बहुत बार होता है कि लोग बोलते है कि आचार्य

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी अभी आपने जो बताया, आपके पास आने से पहले, जो भी समझा, जो भी पढ़ा था तो उसमें ये था कि कामना की पूर्ति करते-करते मुक्ति तक पहुँच जाएँगे। लेकिन जब आप, आपके प्रकाश में ये पता चला कि कामना की पूर्ति ये जानकर कि हो नहीं…

आचार्य प्रशांत: तुम सोचते नहीं, कुछ विचार ही नहीं करते न? देखती तो आँखें हैं; आँख अगर झपका भी दो तो कुछ दिखाई नहीं देगा। तुम कह रहे हो — तुम शरीर से बाहर निकल गए तो देख कौन रहा है फिर? तुम कह रहे हो, ‘मैंने बाहर निकल के…






'धरनी' पलक परै नहीं, पिय की झलक सुहाय। पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय।।
आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…
अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।
जो भीतर के अंधेरे को हटा सके उसके लिए नाम दिया गया गुरु। गुरु शब्द का इतना महत्त्व है कि सिखों ने मंदिर को नाम दिया गुरुद्वारा। गुरु नानक साहब उच्चतम कोटि के और असली गुरु हैं, पर कितने लोग हैं जो वास्तव में गुरु नानक साहब के जीवन पर और उनकी सीख पर चल रहे हैं? जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने नाम दे दिया गुरु का। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। बहुत खोजें, बहुत संदेह से भरे रहें, परीक्षण करें, यूँ ही किसी को गुरु मत बना लीजिए।
गुरु ही देव है, माने ऊँचा देव को बाद में मानना, पहले आत्मा को ऊँचा मानो। बाहर कुछ भी ऊँचा नहीं है, जो ऊँची से ऊँची चीज़ हो सकती है, वो तुम्हारे ही भीतर मौजूद है। कितनी आत्मसम्मान की बात है ना ये। पर हम अपने ही प्रति अपमान से भरे हुए लोग हैं। तो हमें लगता है कि वहाँ पर कुछ है और हमें जाकर लोट जाना है, नेताजी हो, कोई हो, लौट जाना है। हीन भावना, अपना ही अपमान।
बेबाक और बिंदास, बेधड़क और बेख़ौफ़ — ये रिश्ता है शिष्य और गुरु का। हमारा मन अर्जुन-सा नहीं होता कि, "कुछ न हो तुम्हारे पास, अपनी सारी सेना भी दुर्योधन को दे दी, फिर भी हमें तो नेह तुमसे लगा है।" सच्चा शिष्य परम-स्वार्थी होता है; वह छोटी-मोटी चीज़ गुरु से माँगता ही नहीं है, वह कहता है, "तुम ही आओ, पूरे आओ।"
गुरु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं होता; तुम जो ऊँचे से ऊँचे हो सकते हो, तुम्हारी उस अप्राप्त संभावना का नाम है — गुरु। गुरु के साथ रहने का अर्थ होता है — अपनी उच्चतम संभावना के साथ रहना। उसके साथ होने का मतलब होता है उसको समर्पित हो जाना। वो पीछे से आदेश देता रहता है और तुम काम कर रहे होते हो। गुरु का विचार नहीं किया जाता, जब गुरु साथ होता है तो समस्त विचारों में गुरुता आ जाती है। गुरु का विचार नहीं करो, गुरु द्वारा प्रेरित जीवन जियो।
जो भीतर के अंधेरे को हटा सके, उसके लिए नाम दिया गया — गुरु। आपकी उच्चतम संभावना को जो अभिव्यक्ति देने में मदद कर सके, उसका नाम गुरु है। कुछ शब्दों का हल्का प्रयोग नहीं करना चाहिए; 'गुरु' उन शब्दों में सर्वोपरी है। जो एक से बढ़कर एक अंधविश्वास के विक्रेता हैं, उनको हमने गुरु का नाम दे दिया है — ये मत करिए। बहुत खोजें, जाँचें, परखें, परीक्षण करें, और जिज्ञासा की भावना को बहुत जल्दी अंधी आस्था में न बदलने दें। ‘गुरु’ शब्द बड़े वजन का है, हर किसी के साथ इस शब्द को मत जोड़ दीजिए।
गुरु वो जो तुम्हारी भलाई में सहायक हो सके। जिस गुरु के साथ रह करके मन के भ्रम न कट रहे हों, उसको तुरंत त्यागो। किसी 'व्यक्ति' के प्रति निष्ठा मत रखने लग जाना। लक्ष्य तो सच्चाई है; व्यक्ति को थोड़े ही पूजना है। ‘व्यक्ति’ गुरु नहीं होता; गुरु संदेशवाहक है। गुरु ऊँचे-से-ऊँचा साधन भी हो सकता है और गुरु स्वयं बहुत बड़ी ग़ुलामी भी बन सकता है। अधिकांशतः गुरु के नाम पर ग़ुलामी ही मिलती है। लगातार जाँचते चलो — बंधन कट रहे हैं कि नहीं; अंधेरा हट रहा है कि नहीं।
शरीरी गुरु क्यों चाहिए? इसलिए नहीं कि परमात्मा पक्षपात करता है, इसलिए क्योंकि तुम पक्षपात करते हो। ऊपरवाले की ज़िद नहीं है कि गुरु कोई देही आदमी ही हो सकता है। ये तुम्हारी ज़िद है। तुम्हें शरीर से बड़ा मोह है, बड़ी आसक्ति है। तुम्हें शरीर से बड़ी आसक्ति है, तो फिर तुम सीखते भी किसी ऐसे से ही हो जो सशरीर हो। नहीं तो तुम सीख नहीं पाओगे।
सिख धर्म का मतलब ही यही है — जो कुछ भी उचित लगता है, फ़र्क नहीं पड़ता किसने कहा और कब कहा — मैं उसको सुनूँगा और उसके सामने सिर झुकाऊँगा। सिख होने का मतलब है कि मैं लगातार सीख रहा हूँ, मैं शिष्य हूँ। दुनिया में कोई धर्म नहीं कहता कि शिष्य बनो, हर धर्म अनुयायी चाहता है। सिख धर्म शिष्यत्व चाहता है। बहुत-बहुत अनूठा है — न तो अवतार है, न पैग़म्बर, सिर्फ़ गुरु ग्रन्थ साहिब है जो शाश्वत गुरु है।
गुरु का परिचय उसका प्रभाव है; गुरु कोई पदवी नहीं है। गुरु वो हैं, जिनके होने से शांति, समझ और रोशनी आती हो। बुद्धि का भरपूर प्रयोग करो। किसी भी बात को बस आँख मूँदकर, हाथ जोड़कर स्वीकार मत कर लो कि, "गुरु जी कह रहे हैं तो ठीक ही होगी।" खासतौर पर उन जगहों से बचना जहाँ विज्ञान-विरुद्ध और अंधविश्वास से भरी हुई बातें की जाती हों। जहाँ डर हटने लगे, जहाँ मन से ईर्ष्या, संदेह, तमाम तरह की बेचैनियाँ हटने लगें, समझ लेना वह जगह तुम्हारे लिए ठीक है।
प्रश्न: आचार्य जी, आप आई.आई.टी., आई.आई.एम. के बाद अध्यात्म की शरण में क्यों गये?
आचार्य प्रशांत जी: हर आदमी की अपनी एक यात्रा होती है और उस यात्रा में दस कारण होते हैं जो उसके पीछे लगे होते हैं।
तुम्हारी अपनी एक यात्रा है जो तुम्हें तुम्हारे कॉलेज से ले…
प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…
आचार्य प्रशांत: जो बातें मैं कह रहा हूँ अगर उनमें कुछ दम, कुछ फ़ौलाद समझ में आता है तो उसको अपनी ज़िंदगी में उतार लें, मेरा उद्देश्य पूरा हो जाएगा। और अगर वो फ़ौलाद आप ज़िंदगी में नहीं उतार रहे हो और बस “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु” कर रहे हो, तो करते…
आचार्य…
प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली…
प्रश्नकर्ता नमस्ते सर, आज की बातचीत थोड़ी कॉन्ट्रोवर्शियल (विवादित) होने वाली है
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं होती रहती है कॉन्ट्रोवर्शी।
प्र: मैं आपसे गुरुओं के ऊपर बात करना चाहता हूँ और इस पूरी बात की शुरुआत आज से दस या बारह साल पहले से होती है।
आचार्य: क्या हुआ…
प्रश्नकर्ता: सर, प्रणाम! आपका पुराना छात्र हूँ। दो-हज़ार-दस से आपको सुन रहा हूँ, देख रहा हूँ। आप नहीं बदले, सब बदल गया। ज़माना बदल गया! आपके भीतर इतना जज़्बा आता कहाँ से है?
आचार्य प्रशांत: मुझे तो नहीं पता चलता कि मुझमें कोई जज़्बा है। तुमने कहा, ‘इतना जज़्बा! विशेष…
प्रश्नकर्ता: ये प्रश्न आपके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा है। बहुत सारे लोगों को शायद ये उत्सुकता होगी, मुझे भी है कि हमने आपको हमेशा सत्र में देखा है और यहाँ पर कैंप में आते हैं, यहाँ पर देखा है, यूट्यूब पर देखा है लेकिन उसके बाद आप क्या करते हैं?…
प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श आचार्य जी। आज विवेकचुड़ामनी मैं पढ़ा रहा था आदि शंकराचार्य जी की। तो उसमें दमन-शमन को लेकर बताया गया है। तो पहले क्या होता था मैं आपको करीब दो साल से ज़्यादा से सुन रहा हूँ तो लास्ट टाइम(पिछली बार) जब मैं आया था तो मैंने…
गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गोविंद और गुरु किसे कहा गया है समझ नहीं आ रहा?
आचार्य प्रशांत: गोविंद जब तुम्हारे सामने खड़ा होता है तो उसे गुरु बोलते हैं। निराकार है तो गोविंद, साकार है…
आचार्य प्रशांत:
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सर पटकता है। हमन गुरनाम साचा है, हमन दुनिया से यारी क्या?
~ कबीर साहब
कबीर साहब का एक बड़ा एब्यूज़्ड सा (ग़लत प्रयुक्त) दोहा है —
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
उसका…
समझ रहे हो?
'माया' का और 'मैं' का बड़ा गहरा नाता होता है। हम…
आचार्य प्रशांत: आज्ञा का अर्थ है– विशेषाधिकार किसी का, किसी के पीछे सुनना, किसी को बहुत ऊँचा स्थान दे देना, किसी को प्रथम मान लेना। आत्मा और आज्ञा साथ-साथ नहीं चलते। आत्मा किसी की नहीं सुनती। आत्मा किसी की आज्ञा पर…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपने अभी बताया कि जिसका अनुभव हो वह द्वैत है और अद्वैत का कोई अनुभव नहीं होता। अगर मौन का भी अगर अनुभव है तो वो मौन नहीं है। और असली अनुभव जब होता है तो अनुभोक्ता नहीं होता। आचार्य जी जीवन के इतने समय में…
आचार्य प्रशांत: गुरु संदेशवाहक है—जब तक वो बिना किसी विकृति के, घपले के, मिलावट के, मिश्रण के सन्देश सुना रहा है; तब तक उसकी बात सुनने लायक है। जिस दिन उसने संदेश में माल-मिलावट शुरू कर दी, उस दिन उसको तुरंत त्याग देना। व्यक्तियों में क्या रखा है? लक्ष्य तो…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। महाभारत में हम देखते हैं कि युद्ध से पूर्व अर्जुन को आत्यन्तिक पीड़ा होती है अपने सगे-सम्बन्धियों के विरुद्ध युद्ध करने में। उनका मन शोक से भर जाता है, वो नहीं चाहते हैं युद्ध करना। वहीं उनके दूसरे भाई — युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव — तैयार…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मेरा मन गुरु के प्रति बड़ी तीव्रता के साथ आकर्षित होता जा रहा है। मैं जब घर पर विडियो देखती हूँ तो लगता है आपके सामने होना चाहिए, ऑफ़िस में भी जब काम करती हूँ तो यही विचार आता है; लेकिन यहाँ पर जो चल रहा…
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।
~ नितनेम (अनंदु साहिब)
बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।
“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”
प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। कल का सत्र बहुत अच्छा था और जब सत्र में जुड़ने करने के लिए हम आवेदन करते हैं, मेल भेजते हैं, उसमें सबसे पहला सवाल पूछा जाता है कि आपकी अपेक्षा क्या है सत्र में भाग लेने से? मेरी जो अपेक्षा थी, वो पहले दस मिनट…
प्रश्नकर्ता: अभी हम ये उपनिषद् पढ़ रहे हैं और आपसे समझ रहे हैं, तो ये बार-बार आप बता रहे हैं कि जब पढ़ो ब्रह्म और परमात्मा के बारे में तो अपनी ओर देखो; लेकिन यदि कोई खुद से ही बैठकर पढ़ता है तो ये मुश्किल होता है। तो उस संदर्भ…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न राजा जनक से सम्बन्धित है। वो एक शान्त, सरल और स्पष्ट जिज्ञासा करते हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो, मुक्ति कैसे हो और वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो। मैं जब राजा जनक की स्थिति की तुलना महाभारत के अर्जुन की स्थिति से करता हूँ…
आचार्य प्रशांत: “पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय” धरनीदास के वचन हैं, सवाल है कि 'प्यास बुझेगी क्यों नहीं, प्यास बुझती क्यों नहीं?' प्रेम अनंत है। अनंत का क्या अर्थ है?…
आचार्य प्रशांत: अर्जुन असमंजस में हैं। कृष्ण बात को इतना सरल, इतना सीधा करके बता देते हैं कि अर्जुन को लग रहा है कि सही जीवन, सही निर्णय, सही कर्म ये सब तो बहुत सहज, साधारण बात होनी चाहिए। अर्जुन कह रहे हैं कि बात अगर इतनी सीधी है तो…