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जब खेलने में ही मन लगता हो || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
16 min
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आचार्य प्रशांत: शोभित हैं, कह रहे हैं, 'पूरे दिन में खेलना ही अच्छा लगता है। खेलते समय कोई बहाना नहीं मारता और अगर दिमाग़ में कोई बहाना आता भी है तो भी मैं खेलने लग जाता हूँ। खेल में ऐसा क्या है?'

खेल में कुछ विशेष नहीं है पर खेल के अतिरिक्त जो जीवन जी रहे हो, उसमें कुछ गड़बड़ है। वो सारी गड़बड़ियाँ खेलते वक़्त ज़रा छुप जाती हैं, भूल जाती हैं, मिट जाती हैं, तो खेलना अच्छा लगता है। दिन भर दबाव में जी रहे हो कि कोई लक्ष्य पाना है, खेलते समय उस लक्ष्य से आज़ाद हो गए। लक्ष्य तुम्हारा अपना था नहीं, तुम्हारे ऊपर थोपा गया था तो उस लक्ष्य को तुम ऐसे ढो रहे थे जैसे कोई बोझ। जब खेलने लग गए तो लक्ष्य वगैरह पीछे छूट गया, तुम मौज में खेल रहे हो।

इसी तरीक़े से दिन भर तुम्हारे ऊपर आचरण की जो बंदिशें रहती हैं, वो खेलते समय हट जाती हैं। खेलते समय तुम अपनेआप को ज़रा ज़्यादा अभिव्यक्ति दे सकते हो। खेल में भी कुछ वर्जनाएँ होती हैं, तुम कुछ नियमों के भीतर खेलते हो पर कम से कम तुम्हें वो नियम पता तो हैं! तुम्हें पता तो है कि खेल में कब कहा जाएगा कि तुमने फ़ाउल करा, तो तुम ज़रा सुरक्षित अनुभव करते हो।

तुम कहते हो, 'मैं जानता हूँ कि सीमाएँ क्या हैं और जब तक उन सीमाओं को पार नहीं करूँगा, कोई मुझे दोषी नहीं बता सकता।' दुनिया में तो तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुमने फ़ाउल कब कर दिया।‌ दुनिया में तो कोई यूँ ही आता है और बोल देता है — ‘फ़ाउल’ , और तुम अवाक खड़े हो कि 'अब क्या गलती हो गई?'

घर से फ़ोन आया और डाँट पड़ रही है, और पंद्रह मिनट तक तुम समझ भी नहीं पा रहे हो कि 'मैंने पाप क्या किया है?' क्रिकेट में तो अगर अम्पायर की उंगली उठी है तो तुम जानते हो कि क्यों उठी है। दुनिया में तो अगर उंगली उठ गई है तो आधी तो तकलीफ़ तुम्हारी ये है कि तुम्हें पता भी नहीं कि उंगली उठी क्यों। तो खेल तुमको ज़रा न्यायसंगत लगता है, खेल में तुमको लगता है कि यहाँ पर मामला साफ़ है, यहाँ पर अन्याय नहीं हो रहा, अत्याचार नहीं हो रहा।

समझ रहे हो?

यही सब बातें हैं जिनके कारण तुम्हें खेलना ज़्यादा प्रिय है। खेल अगर भा रहा है और खेल बाक़ी जीवन की अपेक्षा बहुत ज़्यादा भा रहा है तो खेल के बारे में मत पूछो; पूछो कि मेरा शेष जीवन कैसा चल रहा है? पूछो कि मेरे शेष जीवन में दमन क्यों है? घुटन क्यों है? संक्रमण क्यों है? भय क्यों है? अभिव्यक्ति की कमी क्यों है? मुझे बाँध क्यों दिया गया है?

खेलते समय तो ज़रा उन्मुक्त हो सकते हो न! खेल रहे हो फुटबॉल, कितनी ज़ोर से दौड़ लगा दोगे, कोई बंदिश नहीं है, लगाओ जितनी ज़ोर से लगा सकते हो! दुनिया ये आज़ादी देती ही नहीं।

खेल में कम से कम अपने मालिक तुम ख़ुद हो जाते हो। तुमको पता है अगर डट के खेलेंगे तो उसी अनुसार फल भी मिल सकता है और दुनिया का तो कुछ पता ही नहीं। खेल में ग़लती भी अपनी और पुरस्कार भी अपना। हमें पता है कि हमने अच्छा खेला, हमें पता है कि आज जान लगाई तो परिणाम उसी अनुसार आया। और दुनिया में तो पचास चीज़ें चलती हैं — कहीं किसी ने कुछ जुगाड़ लगा दिया, कहीं किसी ने चोरी कर दी, कहीं कुछ हो गया, कहीं कुछ हो गया। मामला उलझा हुआ है, आर-पार कुछ दिखता नहीं। खेल में पारदर्शिता ज़रा ज़्यादा है, इसीलिए खेल पसंद आता है।

प्रश्नकर्ता२: उच्च कोटि का भक्त कैसे बनूँ?

आचार्य: हाई क्वालिटी (उत्कृष्ट), टॉप-नॉच (शीर्ष का), बेस्ट ऑफ द बेस्ट! (सर्वश्रेष्ठों में सर्वश्रेष्ठ) — यही सिखाया है न तुम्हें दुनिया ने? बीट देम ऑल! (सभी को पछाड़ दो) क्रश द ऑपोज़िशन! (प्रतिपक्ष को ख़त्म कर दो) उच्च कोटि का भक्त! लाइफ़ इज़ अ रेस, एण्ड आय ऐम अहेड ऑफ एवरीवन! (जीवन एक दौड़ है, और मैं सबसे आगे हूँ) भक्ति भी मैं करती हूँ तो उच्च कोटि की!

उच्च कोटि के और कई काम करने चाहे, उसमें हो नहीं पाए उच्च कोटि के तो अब सोच रहे हैं कि नया फ़ील्ड (क्षेत्र) तलाशा जाए। 'भाई साहब, ये बताइए इस फ़ील्ड में क्या ऑपरचुनिटीज़ (अवसर) हैं, भक्ति में? क्या यहाँ मैं टॉपम टॉप (अव्वल) हो सकती हूँ?'

क्या लिख रही हो? भक्ति का अर्थ होता है सर्वप्रथम विनम्रता। भक्त कहता है — '*मो सम कौन कुटिल खल कामी*। मुझसे ज़्यादा कुटिल कौन? मुझसे ज़्यादा धूर्त कौन? मुझसे ज़्यादा कामी कौन?' भक्त कभी ये कहता है क्या कि मुझे उच्च कोटि का होना है?

पहले मन को देखो। मन तो अभी प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है।

प्र२: ये तो पता है कि हममें कितनी कमियाँ हैं।

आचार्य: तो उनकी बात क्यों नहीं करी?

प्र२: कमियाँ तो पता है अपनी, बहुत सारी कमियाँ हैं।

आचार्य: अच्छा! ये पता थी कि उच्च कोटि का बनना चाहती हूँ?

प्र२: ये विशेषता मुझमें नहीं है न।

आचार्य: ये पता थी कि ये बहुत बड़ी गड़बड़ है, जो बैठी हुई है? पता होती तो क्या लिख देती कि मुझे उच्च कोटि का बनना है?

प्र२: जिनपर कृपा हुई है, वो कुछ तो विशेष होंगे न।

आचार्य: तुम्हें कैसे पता उन लोगों का? अपना कुछ पता है?

प्र२: अपना तो ज़ीरो (शून्य) है, सर।

आचार्य: तो पहले अपना पता करो न। जिसको यही नहीं पता कि उसकी आँख खुली है या बंद है वो दुनिया की बातें करे और नज़ारों की बातें करे, तो शोभा देता है क्या?

मैं चिकित्सक के पास गया हूँ, नेत्र चिकित्सक के पास, और वहाँ बैठा हूँ और बोल रहा हूँ, 'दोनों ही आँखों से कुछ दिखाई नहीं देता, बिलकुल नहीं।' और साथ ही साथ कह रहा हूँ, 'ये खिड़की से बाहर क्या हरियाली है! और वो क्या मोर नाच रहा है!' ये दोनों बातें एक साथ शोभा देती हैं?

पहली बात तो ख़ुद ही कह रही हो कि दोनों ही आँखों से कुछ दिखाई नहीं देता। फिर बता रही हो, 'आहाहा! वो क्या मोर नाच रहा है! और मैं भी उच्च कोटि का नृत्य कैसे कर सकती हूँ, वैसा ही?'

तुम्हें दूसरों की बात करनी चाहिए या सिर्फ़ अपनी कि मेरी आँखों में कुछ गड़बड़ है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा। यही तो भक्त की विनम्रता होती है न कि मेरे साथ बड़ी गड़बड़ है। जिसने ये कह दिया कि मेरे साथ बड़ी गड़बड़ है, उसी ने तो फिर भगवान के सामने सर झुकाया न।

भक्त और भगवान का विभाजन और क्या है? भक्त भगवान को सबसे पहले अपनेआप से पृथक जानता है। वो जानता है कि वियोग है, फिर वो योग माँगता है, फिर वो मिलन माँगता है। भक्त से ज़्यादा विनय, भक्त से ज़्यादा लोच किसी में नहीं होता। भक्ति का तो अर्थ ही है समर्पण; जो समर्पित नहीं हो सकता वो भक्त कैसा?

तो अपनेआप को देखेंगे कि कहाँ-कहाँ पर दोष है और जितने तुमको दोष दिखते जाऍंगे, समझ लो कि उतनी ईश्वरीय अनुकंपा तुम पर हो रही है। देखते जाओ, ये गड़बड़ है और ये गड़बड़ है। और दोनों बातें साथ चलें — अपनी लघुता का आभास और साथ ही साथ ये श्रद्धा कि लघु रहे आना, छोटा रहे आना, क्षुद्र रहे आना मेरी नियति नहीं। दोनों बातें। मैं छोटी हूँ लेकिन छोटी रह नहीं जाऊँगी। ‘छोटी रह नहीं जाऊँगी’, ये कहने से पहले ये ज़रूर कहना और खुलकर कहना, ‘बहुत छोटी हूँ’। और इन दोनों बातों को साथ ले चलना ज़रा मुश्किल होता है।

कुछ लोग होते हैं जो ये कहकर अटक जाते हैं कि हम तो बहुत छोटे हैं। और कुछ लोग होते हैं जो इसी भाव में जीते आते हैं कि बड़ा होना हमारा स्वभाव है। नहीं। भक्ति का अर्थ होता है दोनों बातों को साथ लेकर चलना। और ये दोनों बातें विरोधी लगती हैं, तो दोनों को एक साथ ले चलना ज़रा मुश्किल होता है। भक्ति का अर्थ होता है दोनों बातें याद रखेंगे — हम छोटे हैं लेकिन ये कुछ चूक हो गयी है, भगवान मिलेंगे ज़रूर। 'पता नहीं कैसे दूर चला गया, पता नहीं क्या खेल हुआ, पता नहीं क्या माया है कि दूर बहुत आ गई; लेकिन कितनी भी दूर आ गई हूँ, मिलन होगा ज़रूर।'

दोनों बातें स्वीकारनी हैं — दूरी है, ये भी स्वीकारना है और मिलन आवश्यक है, ये भी स्वीकारना है; तब भक्ति है। दोनों में से किसी भी बात को भूल मत जाना। शुरुआत तो हो गई भक्ति की, भक्ति और आँसुओं का बड़ा पुराना संबंध है।

पूछती हैं, 'हे प्रभु! मुझे मुझसे बचाओ — ये कैसे संभव होगा?' ऐसे ही संभव होगा। हम प्रभु को भी, देखो, अपने ही तरीक़ों से बुलाना चाहते हैं। ‘प्रभु! मुझे मुझसे बचाओ’ अर्थात् मुझे मेरे ही तरीक़ों से बचाओ। ऐसा थोड़े ही है कि प्रभु किसी को चाहिए नहीं। सबको चाहिए हैं, पर सबको अपने-अपने व्यक्तिगत तरीक़ों से चाहिए हैं, सबको अपने-अपने सुविधानुसार चाहिए हैं, इसीलिए मिलते नहीं। चाह तो सबके पास है लेकिन साथ ही साथ ज़िद है सबके पास, 'मिलें भी और वैसे मिलें जैसे मैं चाहती हूँ।' फिर कुछ नहीं मिलता।

प्र२: आचार्य जी, क्या ईश्वर ही सब कुछ करता है?

आचार्य: नहीं, ये आपने यूँ ही सुन लिया है कि गॉड (ईश्वर) सब कुछ करता है। आपकी दृष्टि में कौन है कर्ता, ये बताइए। प्रश्न ये नहीं है कि वास्तव में कौन कर रहा है, आपकी दृष्टि में कौन कर रहा है इसका ज़्यादा महत्त्व है। हो सकता है आप ट्रेन के भीतर बैठे हों और वो ट्रेन इंजन खींच रहा हो। आप ट्रेन के भीतर बैठे हैं और वो ट्रेन कौन खींच रहा है?

श्रोतागण: इंजन।

आचार्य: इंजन। पर आपकी नज़र में अगर ट्रेन का डब्बा आपके प्रयत्न से चल रहा है तो आप तो प्रयत्न करे ही जाऍंगे न। और आप थकेंगे भी ख़ूब। आप थकेंगे भी ख़ूब, आप अपनेआप को ऊँचा भी खूब मानेंगे कि ट्रेन चल रही है। अपनी पीठ खूब थपथपाऍंगे कि देखो, 'मैं ट्रेन खींच रहा हूँ', और आप जगत के प्रति शिकायत से भी भरे होंगे कि 'थोड़ी देर पहले साठ की गति से चल रही थी ट्रेन, फिर मैंने प्रयत्न बढ़ाया पर ट्रेन की गति नहीं बढ़ी। तो ये जगत अन्यायपूर्ण है।'

सवाल ये नहीं है कि ‘दुनिया कौन चला रहा है?’, सवाल ये है कि ‘आपकी नज़र में दुनिया कौन चला रहा है?’ क्योंकि आपकी नज़र में अगर आप हैं उस ट्रेन के चालक, उस डब्बे को आप चला रहे हैं और वो भी दौड़-दौड़ के चला रहे हैं, कि 'जितना मैं दौड़ता हूँ या जितना मैं खींचता हूँ, उतना डब्बा चलता है।' तो आपको दो चीज़ें दिखाई देंगी — पहली, आप दौड़ रहे हैं और दूसरी, डब्बा?

श्रोता: इंजन चला रहा है।

आचार्य: नहीं, ये तो आपको पता ही नहीं है। आपको क्या दिख रही हैं? आपको दो चीज़ें दिख रही हैं — आप दौड़ रहे हैं, पहली चीज़ ये दिख रही है और दूसरी क्या दिख रही है? डब्बा चल रहा है। और आप इन दोनों बातों में कॉज़-इफेक्ट (कार्य-कारण) का, कार्य-कारण का संबंध जोड़ देंगे, तुरंत।

एक आदमी की कल्पना करिए न, वो ट्रेन के भीतर है, डब्बे के अपने और वो डब्बे में दौड़ लगा रहा है; या वो डब्बे की दीवारों को धक्का दे रहा है और उसकी मान्यता ये है कि डब्बा चल रहा है उसके प्रयास से। अब उसे दो बातों का अनुभव हो रहा है, पहली बात ये कि उसे थकान है, वो श्रम कर रहा है। ये बात उसके अनुभव में आती है कि 'मैंने धक्का मारा, मैंने श्रम किया' और दूसरी बात उसके अनुभव में क्या आती है?

दूसरी बात अनुभव में आती है कि डिब्बा चल रहा है। तो वो इन दोनों बातों में कौन-सा संबंध बिठा देता है? कार्य-कारण का। वो कहता है कि 'मैं जो कर रहा हूँ वो कॉज़ (कारण) है, और डब्बे का जो चलना है, वो इफ़ेक्ट (कार्य) है।' अब उसकी नज़र से देखें तो कहानी पूरी हो गई। आप उसके पास जाएँ तो वो कहेगा, 'ये देखो न क्या हो रहा है, मैं यहाँ धक्का लगा रहा हूँ और डब्बा चलता जा रहा है।'

अब क्या फ़र्क पड़ता है कि डब्बे को चलाने वाला इंजन है? इन महाशय की नज़र में कहानी पूरी है और ये थक भी पूरा रहे हैं। इनसे तुम कहो अगर कि 'साहब, आप नहीं चला रहे हैं इस डब्बे को।' तो ये कहेंगे, 'यार, तुम बड़े एहसान फ़रामोश हो! यहाँ देख रहे हो पसीने हमारे, मेहनत देखो हमारी।' और मेहनत तो ये कर रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं। जान तो ये पूरी लगा रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं।

कह रहे हैं, 'मेहनत देखो हमारी और बजाय इसके कि तुम हमें कृतज्ञता ज्ञापित करो, तुम हमें बताने आए हो कि हमारा कर्ता-भाव झूठा है, तुम हमें बताने आए हो कि डब्बा यूँ ही चल रहा है। अभी छोड़ दें तो तुम्हें पता चलेगा।'

और तुम कहो, 'अच्छा, छोड़ दीजिए।' तो कहेंगे, 'हम इतने भी ग़ैर-ज़िम्मेदार नहीं हैं कि छोड़ दें। जानते हो न डब्बे में कितने लोग हैं, इन सब की ज़िम्मेदारी किसके ऊपर है? हमारे ऊपर है। हम धक्का न लगाएँ—प्रयोगवश ही, सिर्फ़ प्रयोग करने के लिए ही हम थोड़ी देर को प्रयत्न करना छोड़ दें और डब्बा शिथिल पड़ जाए, अपनी मंज़िल पर न पहुँचे, तो फिर क्या होगा? तो हम तो लगातार लगे रहेंगे और देखो तुम हमारा पसीना और देखो तुम हमारी थकान, ज़िंदगी भर से हम श्रम ही कर रहे हैं।' इनकी नज़र में कहानी पूरी है।

बात समझ रहे हो?

हम सबकी नज़र में कहानी पूरी है। हम सबको यही लग रहा है कि हम जो कर रहे हैं उसी से तो हो रहा है। तो ये मत कहिए कि दुनिया भगवान चला रहा है। आपको तो यही लग रहा है न कि आप चला रहे हैं। बात ये नहीं है कि कौन चला रहा है, बात ये है कि आपको क्या लग रहा है? आपकी मान्यता क्या है?

आपकी मान्यता तो यही है कि आप चला रहे हैं। और सिद्धांत है बहुत सीधा कि जो अपनेआप को कर्ता मानेगा, उसे अपने कर्तृत्व के फलों का भोक्ता भी होना पड़ेगा। कर्ता-भाव झूठ है, पर झूठ को भी तुम सच मान तो सकते हो न, तो तुम मान लेते हो कि 'मैं ही तो चला रहा हूँ डब्बा।'

तो जो ये मानेगा कि मैं डब्बा चला रहा हूँ, उसकी सज़ा ये होगी कि अगर डब्बा धीमा पड़ गया—इंजन धीमा हो गया है तो डब्बा धीमा हो गया है—अब डब्बा धीमा हो गया तो ये महाशय दोष किसी न किसी को तो देंगे। या तो अपने ऊपर लेंगे या दुनिया की शिकायत करेंगे कि 'ये दुनिया बड़ी बेरहम है। देखो, हम कितनी मेहनत कर रहे हैं पर डब्बा अब धीमा होता जा रहा है। असल में बुढ़ापे की बात है। जब हम जवान थे तो गति ज़्यादा होती थी। अब डब्बा धीमा इसलिए पड़ गया है क्योंकि हम बुढ़ा रहे हैं।' वो ये मानेंगे ही नहीं कि बात तुम्हारी है ही नहीं, बात इंजन की है। वो सबकुछ अपने ऊपर लेंगे। ये भोक्ता-भाव है। चूँकि तुमने अपनेआप को कर्ता माना इसीलिए अब जो कुछ घट रहा है तुमको वो भुगतना भी पड़ेगा।

बात समझ रहे हो?

पूछ रहे हो — ‘सही-गलत कौन करता है, गॉड या मेमोरी (स्मृति)?’ सही-गलत जो अपनेआप को कर्ता मानता है, उसके लिए होता है। तुम मान रहे हो कि तुम डब्बा चला रहे हो और तुम्हारी चाहत है कि गति बढ़े डब्बे की और गति बढ़ गई तो तुमको लगता है बहुत अच्छा हो गया और तुम अपनेआप को बहुत पुरस्कार भी दे देते हो, अपना तुम बड़ा प्रोत्साहन कर लेते हो।

तुम कहते हो, 'देखो, जो हम चाहते थे वो हो गया और जो हम चाहते थे वो क्यों हुआ? हमारे श्रम के कारण हुआ।' अब ये अलग बात है कि ये मात्र संयोग है कि तुमने चाहा कि गति बढ़े और तुमने ज़ोर लगाया और उधर इंजन ने भी ज़ोर लगा दिया, गति बढ़ गई। तुम्हारी नज़र में कुछ अच्छा हो गया।

बुरा भी ऐसे ही होता है। तुम चाह रहे हो कि गति शिथिल हो जाए—अब तुम कुछ भी चाह सकते हो—तुम चाह रहे हो कि अभी गति ज़रा कम हो जाए, तो तुमने ज़ोर लगाना कम किया और संयोग की बात कि उधर इंजन ने भी ब्रेक लगा दिए और गति कम हो गई। तुमने फिर अपनी पीठ थपथपाई, तुमने कहा, 'देखा!' कुछ अच्छा हो गया।

बुरा कब होगा? जब तुम चाह रहे हो कि अब गति कम हो जाए और गति कम हो ही नहीं रही, उधर इंजन की स्पीड (गति) और बढ़ गई, तुम कह रहे हो, 'बड़ा बुरा हो गया! बड़ा बुरा हो गया!'

अच्छा या बुरा तो तुम्हारी चाहत पर निर्भर करता है। तुम कुछ चाह लो, संयोगवश वो पूरी हो गई चाहत तो तुम कह देते हो, ‘अच्छा हो गया!’ तुम कुछ चाह लो, वो पूरा नहीं हुआ, तुम कह देते हो, ‘बुरा हो गया!’ अस्तित्व में न कुछ अच्छा है न बुरा है, जो है सो है।

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