बेचैन मन का शान्ति की ओर खिंचना ही प्रेम है || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे कर्म में कोई विश्वास नहीं है, भक्ति में कोई श्रद्धा नहीं है। मुझे धर्म की कोई समझ नहीं है, तो परमात्मा की कृपा मुझ पर होगी या नहीं? परमात्मा से मेरा कभी साक्षात्कार होगा?
आचार्य प्रशांत: तो अभी जैसे भी हो तुम, उससे अगर संतुष्ट ही हो, तो जैसा चल रहा है चलने दो।
प्र: नहीं आचार्य जी, जो चल रहा है उससे बिलकुल संतुष्ट नहीं हूँ।
आचार्य: अगर उससे असंतुष्ट हो तो फिर क्यों कह रहे हो कि मुझे किसी दूसरे की मदद करने में कोई रुचि नहीं है। तुम तो अभी भी वैसे ही हो न जो दूसरे की मदद इत्यादि नहीं करना चाहते। नहीं करना चाहते? तो गौर करो अपनी दोनों बातों पर।
तुम कह रहे हो, 'मैं ऐसा हूँ जो दूसरों की मदद इत्यादि करने में कोई रूचि नहीं रखता।' और तुम ही कह रहे हो कि तुम्हें अपनी वर्तमान अवस्था से असंतुष्टि है। तो फिर जैसे हो, उसको बदलो। और कैसे हो तुम? जो किसी की मदद नहीं करना चाहता। तो बदलो न! नहीं तो अजीब बात हो जाएगी।
प्र: प्रेम नहीं उठता किसी के लिए।
आचार्य: तुम्हें नहीं होता है प्रेम। तो ज़िन्दगी जैसी चल रही है, उसमें मस्त हो?



