झूठे डर से मुक्ति कैसे? || आचार्य प्रशांत, नारद भक्ति सूत्र पर (2014)

आचार्य प्रशांत: केंद्रीय बात क्या है?
श्रोता: हर एक नश्वर चीज़ों से, पदार्थों से, व्यक्तियों से हमारा नाता है, तो मृत्यु का भय तो रहेगा?
आचार्य प्रशांत: वो नाता जो है उसको सिर्फ़ नीति के आधार पर नहीं अनुचित ठहराया जा रहा। वो नाता भूल है। वो नाता होना ही नहीं चाहिए था। ऐसा नहीं कि फ़ायदे के लिए कहा जा रहा है कि तुम उससे जुड़ो जो समयातीत है। इसीलिए कहा कि मृत्यु का डर वास्तव में एक विसंगति है, एक ऑडिटी है। जो होना ही नहीं चाहिए था, वो हो गया। कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। उदाहरण दिया था, कौओं के बीच में हँस जाकर बैठ गया है। तुम कौन हो और तुमने किनसे अपनेआप को घेर लिया है? तुम कौन हो और तुमने अपनेआप को क्या नाम दे दिया है? और ये सब कुछ ग़लत है, उसका प्रमाण है हमारे भीतर की रोज़ की बेचैनी। यदि सब ठीक होता, तो सब ठीक होता। न उलझनें होतीं, न आकांक्षाएँ होतीं; न संकोच होता, न अभीप्साएँ होतीं; न स्मृतियाँ होतीं, न सपने होते। मात्र 'होना' होता। पर ऐसा है तो नहीं। ऐसा है तो नहीं न!
भक्ति का अर्थ है ग़लती को ठीक करना। मन जुड़ता तो है ही, भक्ति का अर्थ है उससे जुड़ना जिससे मन को जुड़ना ही चाहिए। भक्ति का अर्थ है सही प्रेमी को पा लेना। प्रेमी कहना है प्रेमी कह लो, पिता कहना है पिता कह लो। पर वही जो एक हक़दार है कि उससे नाता रखा जाए, उसी से नाता रखना ही भक्ति है। और ये न कह दीजिएगा, ‘कोई नाता रखा ही क्यों जाए?’ क्योंकि नाते तो आप रखते ही हो। है कोई यहाँ पर ऐसा जो नाते ही न रखता हो? सब ने नाते तो बाँध ही रखे हैं न? पहचानें तो सभी के पास हैं न?
भक्ति का अर्थ है सही से नाता रखना और अपनी सही पहचान को पाना। झूठ से मुक्ति, सच की भक्ति — दोनों एक ही बात हैं और एक के बिना दूसरा हो नहीं सकता; झूठ से मुक्ति, सच की भक्ति। झूठ मरेगा, मृत्युधर्मा है, मरणशील है, मर्त्य है; सच अमर है। तो इसीलिए भक्ति अमृत स्वरूपा है। सच से जुड़े नहीं कि अमर हो गये।






