भक्त - निर्बुद्धि नहीं, अतिबुद्धि || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)

आचार्य प्रशांत: “मनै सुरति होवे मनि बुधि।”
बुद्धि क्या है? “मनै सुरति होवे मनि बुधि।” बुद्धि वास्तव में क्या है? एक बुद्धि तो वो है जो क़ीमत करती है दुनिया की चीज़ों की, उन्हें नाप-तोल कर एक-दूसरे से; बुद्धि, वो ताक़त जो फ़ायदा पहुँचाए। बुद्धि — मन को रास्ता दिखाने वाली मन की ही शक्ति।
तो एक बुद्धि तो वो हो सकती है जो मन को रास्ता दिखाए दुनिया के ही मध्य से कि यही सत्य है, इसी में तुम्हें जीना है, इसी में तुम्हें रहना है — लो, देखो! क्या क़ीमती है। जो क़ीमती है उसका चुनाव करते रहो, जो क़ीमती नहीं है उसको छोड़ते रहो।
ये हमारी व्यावहारिक बल्कि एक प्रकार की व्यावसायिक बुद्धि है। बुद्धि चल इसमें भी रही है, निर्णय यहाँ भी हो रहे हैं — ऊँचे-नीचे, सही-ग़लत, अच्छे-बुरे; इनका निर्णय बिलकुल हो रहा है। पर वो सारा निर्णय कुछ मान्यताओं के आधार पर हो रहा है।
और वो मान्यता ये है कि पहला, सामने जो दुनिया है वही अपनेआप में सच है और वही आख़िरी है; दूसरा, एक वस्तु से दूसरी वस्तु को और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को तोलने के मेरे पास जो आधार हैं, जो क्राइटेरिया (मानदंड) है वो भी सच है, वो भी आख़िरी हैं। तीसरा, ये बुद्धि मेरी अपनी है और मुझे पार लगा सकती है। एक बुद्धि तो ये होती है।
ऐसी बुद्धि वाले लोग आपको अक्सर दुनिया में बड़ी प्रतिष्ठित जगहों पर, ताक़त के पदों पर बैठे मिल जाएँगे। क्योंकि उन्होंने कुछ निर्णय बिलकुल वही करे होते हैं जो ताक़त अर्जित करने के लिए, जो प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए चाहिए होते हैं।






