भक्ति शुरू ही होती है आत्म-आलोचना से, और इस दृढ़ विश्वास के साथ कि यह जितनी बुराइयाँ हैं, यह समाप्त हो सकती हैं। जो अच्छे-से-अच्छा है वह दूर सही, पर प्राप्य है। मिलेगा! तो भक्त एक बड़ी विचित्र बात कहता है। कहता है कि मुझसे बुरा कुछ नहीं; जितनी भर बुराइयाँ थीं वह सब इकट्ठी होकर मुझमें आ गयी हैं। जो कुछ भी अच्छा है, ऊँचा है, शुद्ध है, पावन है, वह मेरे भगवान में निहित है। और साथ ही साथ वह यह भी कहता है कि इतना अंतर होते हुए भी उस भगवान को पा लूँगा मैं।
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प्रश्नकर्ता: भक्ति में, चाहे वह मेरी भक्ति हो या दूसरे की भक्ति हो, उसमें तर्क या फिर क्रिटिसिज़्म (आलोचना) भी बोलें, तो उसकी क्या जगह है? और ऐसा कोई तर्क हो, कोई क्रिटिसिज़्म हो, तो भक्त को उस चीज़ को कैसे एड्रेस (सम्बोधित) करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: भक्ति में क्रिटिसिज़्म का, आलोचना का क्या स्थान है — पूछा है। पूरा-पूरा स्थान है। भक्त कहता है – “मो सम कौन कुटिल खल कामी।” “बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन देखा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
भक्ति शुरू ही होती है आत्म-आलोचना से, और इस दृढ़ विश्वास के साथ कि यह जितनी बुराइयाँ हैं, यह समाप्त हो सकती हैं। जो अच्छे-से-अच्छा है वह दूर सही, पर प्राप्य है। मिलेगा!
तो भक्त एक बड़ी विचित्र बात कहता है। कहता है कि मुझसे बुरा कुछ नहीं; जितनी भर बुराइयाँ थीं वह सब इकट्ठी होकर मुझमें आ गयी हैं। जो कुछ भी अच्छा है, ऊँचा है, शुद्ध है, पावन है, वह मेरे भगवान में निहित है। और साथ ही साथ वह यह भी कहता है कि इतना अंतर होते हुए भी उस भगवान को पा लूँगा मैं।




