आचार्य प्रशांत: हम लगातार इसी आधार पर ज़िंदा हैं कि बाहर जो कुछ है, वो असली है। हमारी पहचान, हमारे रिश्ते-नाते, रूपया-पैसा यह सब कुछ जो बाहर है, वो असली है।
दो विधियों की बात की हमने — पहली, जप, जिसको किया जाता है; दूसरी, मूर्त रूप देना कि सत्य को एक मूर्त रूप दे दो, प्रेम को एक मूर्त रूप दे दो। और निश्चित रूप से वो जो मूर्त रूप दिया जाएगा, वो भी ऐसा ही देना होगा जो मन को भाए।
तो इसीलिए मूर्त रूप कैसे दिए जाते हैं? जितना भी भक्ति संगीत है उसमें सत्य को, प्रेम को कैसे मूर्त रूप दिए जाते हैं? आराध्य को कैसे मूर्त रूप दिए जाते हैं? कैसे होते हैं? देखने में सुंदर होंगे, बहुत ही सुंदर होंगे। आवाज़ भी मीठी होगी, पूरा श्रृंगार किया जाएगा। वो सबकुछ किया जाएगा जो मन को भाता है। वो इसलिए नहीं किया जा रहा कि वास्तव में कोई भगवान है या कोई प्रियतम है वैसी आकृति का; वो इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि आपके मन को वैसी ही आकृति भाती है — आपके मन को! याद रखिएगा, सत्य बाहर नहीं — आपके मन को।
जब मूर्त रूप दिया जाता है तो एक सम्बन्ध भी अक्सर जोड़ लिया जाता है। वो सम्बन्ध भी जो जोड़ा जाता है, वो और कोई सम्बन्ध आमतौर पर कम रखा जाता है — भाई कम कहा जाएगा, दोस्त भी कम कहा जाएगा। कभी-कभी पिता कहा जाता है, पिता भी कम कहा जाएगा। जो सम्बन्ध सबसे ज़्यादा प्रयुक्त होता है, वो है प्रेमी का। क्योंकि वास्तविक सम्बन्ध सिर्फ़ वही है, बाकी सब तो सामाजिक सम्बन्ध हैं। वास्तविक सम्बन्ध सिर्फ़ वही है। तो इसीलिए सम्पूर्ण भक्ति संगीत में जिस सम्बन्ध को सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है, वो है पिया, प्रीतम, पति, प्रेमी, प्रेमिका का — इस रूप में देखा जाता है। यह विधि है। इस सम्बन्ध की किसी को लहर नहीं उठी है कि उसने इस रूप में रख दिया है। यह किसी की बेहोशी से नहीं निकल रहा है, यह बहुत सोच-समझकर बनाई गई तकनीकी है, ताकि मन ध्यान में जा सके। ताकि ‘मन’ ध्यान में जा सके!
तीसरी जो इसमें विधि इस्तेमाल की जाती है, वो है निश्चित रूप से संगीत की। जो कुछ भी कहा जा रहा है उसको संगीत में रखा जाए, संगीतमय तरीक़े से कहा जाए। संगीत क्या है? कम-से-कम जहाँ तक शास्त्रीय संगीत की बात है, वो प्रकृति की ही ध्वनियों से निकलकर आया है।



