प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्र: जब मैं कुछ लोगों को सुनता हूँ, जैसे कुछ ज्ञानी लोग, वो लोग बात ये कहते हैं कि आज-कल के युवाओं में हो चाहे जो भी लोगों में, जीवन जिस तरह से वो जिये हैं उनको उनके जीवन में।
आचार्य: आप थोड़ा सा थोड़ा थोड़ा थोड़ा धीरे-धीरे बोलिएगा, आवाज़ उतनी साफ़ नहीं है, तो थोड़ा सा थम-थमकर बोलिए।
प्र: जी, तो मैं कह रहा था, वो कहते हैं कि उतनी व्यावहारिक नहीं है, तो वो ऐसा कहते हैं कि तुम नाम-जप ही करो वो ही तुम्हारे लिए काफ़ी है। तो मैं जब सुनता हूँ तो मुझे तो लगता है कि ये जो कह रहे हैं वो बात ही अव्यवहारिक है। तो लेकिन मैं उसको पूरी तरह से उसको इनकार नहीं कर पाता हूँ। मेरे अन्दर ये साहस ही नहीं आ पाता है कि वो जो बात कह रहे हैं वो मतलब व्यवहारिक ही नहीं। तो इतना साहस मेरे अन्दर क्यों नहीं आ पाता है? ये मैं जानना चाहता हूॅं।
आचार्य: क्योंकि आपने अभी तक स्वयं जाॅंच कर और प्रमाणित करके नहीं देखा कि वो बात अव्यवहारिक है। देखिये, कुल मिलाकर के हमें तो भीतरी कूड़ा साफ़ करना है। भीतर हम सौ बातें मानकर बैठे हैं उसी को भीतरी कूड़ा कहते हैं। अगर वो कूड़ा नाम-जप से साफ़ होता हो तो बहुत अच्छी चीज़ है नाम-जप, सबको करना चाहिए। पर वो काम करेगा या नहीं करेगा इसके लिए पहले आपको उस कूड़े का आकार, प्रकार, उसकी प्रकृति पता हो न? अगर मुझे बीमारी नहीं पता तो मुझे कैसे पता कि दवा ने काम करा या नहीं करा? प्रश्न पूछ रहा हूँ। अगर बीमारी नहीं पता तो कैसे पता कि दवा ने काम करा कि नहीं करा? कैसी बात कर रहे हैं आप? बीमारी का अनुभव होना बन्द हो जाएगा न, दर्द का अनुभव होना बन्द हो जाएगा। अगर दर्द का अनुभव होना बन्द हो गया तो मतलब दवा ने काम करा है। नहीं, आप ग़लत कह रहे हैं। मुझे सिर दर्द हो रहा है, मुझे




