कभी किसी फ़िल्म में डूबकर हम अपना ख़याल ही भूल जाते हैं, कभी मनपसंद खाना सामने आते ही लगता है कि सब कुछ मिल गया। भजन में झूमते हुए भी लगता है कि अहंकार कहीं नहीं बचा। पर सोता हुआ आदमी भी मासूम दिखता है, तो क्या उसका अहंकार मिट गया? थोड़ी देर का यह विराम ही अहंकार को अगले दिन के लिए तरोताज़ा कर देता है। और प्रेम आँसुओं में बह जाना नहीं, चट्टान की तरह अड़े रहना है। क्या हमारे जीवन में कुछ ऐसा है जिसके लिए हम अड़ सकें, चाहे जो क़ीमत चुकानी पड़े?
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत प्रसन्नता हुई आपको सुनके। मेरा जन्म मथुरा-वृंदावन का है। बहुत नज़दीकी से, बहुत क्लोज़नेस से मैंने वहाँ का वातावरण देखा और उसी में बड़ा पला हुआ हूँ कुछ सालों तक। भक्ति भाव आता है वहाँ पर मंदिरों में और हाँ, फिर एक नहीं, सैकड़ों लोगों को। मैं ख़ुद भी उसका भागीदार हूँ। जब तक मैं वहाँ रहा, तब उसमें कहीं पर भी अहंकार नहीं होता। एक बार वहीं पर मंदिर में किसी ने बोला था कि “मेरा ज़िक्र अंजुमन में, कोई ख़ास बात होगी। क्या कहा ख़िज़ाँ चमन में, कोई ख़ास बात होगी।” तो यह तो अहंकार की बात हो गई। “सुकरात और मीरा विष पी गए अबोले। क्या ज़ुबाँ आती ज़ेहन में, कोई ख़ास बात होगी।” तो जब सुकरात और मीरा ने यह किया, तो वहाँ अहंकार की बात कहाँ रही? और मैंने कितने सुकरात और मीरा को देखा है वहाँ पर।
आचार्य प्रशांत: आपने पहले वालों को कहाँ देखा था, जो आप कह पाए कि बाद में जिनको देखा, वो पहले वालों जैसे थे?
प्रश्नकर्ता: मैं तो उतना बता सकता हूँ, जो मैं वहाँ…
आचार्य प्रशांत:




