प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज जो भजन सुना, मुझे उस बारे में पूछना था कि क्या यह विधि है? अगर यह एक विधि है तो क्या हमें इसी को कन्टिन्यू (जारी) रखना चाहिए दिनचर्या में?
आचार्य प्रशांत: तुमने इतनी फ़िल्में देखी होंगी, तुम्हें डायलॉग (संवाद) कितनों के याद हैं? और तुम्हें गाने कितनों के याद हैं? यूट्यूब पर लोग डायलॉग सुनने जाते हैं फ़िल्मों के या गाने सुनने जाते हैं?
प्र: डायलॉग।
आचार्य: फ़िल्मों के गाने ज़्यादा प्रसिद्ध होते हैं या डायलॉग?
प्र: गाने ज़्यादा प्रसिद्ध होते हैं।
आचार्य: तो गीत मन पर कब्ज़ा तो कर ही लेता है, इसीलिए जानने वालों ने विधि निकाली कि उसे जब मन पर कब्ज़ा कर ही लेना है तो क्यों न गीत में बोल वो हो, सन्देश वो हो जो मन की शुद्धि करे।
अगर यह गीत नहीं चलेगा मन में तो दूसरे गीत तो चल ही रहे हैं। यह गीत नहीं चलेगा तो दूसरे गीत तो चल ही रहे हैं। उनको हटाने की ख़ातिर गीत की विधि को अध्यात्म के साथ जोड़ दिया गया। दोनों में गाँठ बाँध दी गयी। इसी का नाम है — भजन।



