जो तुम अभी कर रहे हो वही तुम हो || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)

विणु गुण कीते भगति न होई। अर्थ: बिना गुण के भक्ति नहीं हो सकती। (जपुजी साहिब)
आचार्य प्रशांत: आप दीवार के पास बैठे हैं और आप ऊँघ जाते हैं और आपके सिर पर दीवार लगती है ज़ोर से। क्या आप दीवार से कहते हो कि कमीनी मेरे ही घर की दीवार होते हुए तूने मेरा सर छोड़ दिया?
आप यहाँ ऑफिस में हो और ऑफिस में बड़े दिनों से हो, आप बड़े सीनियर हो गए हो। आप दीवार से कहोगे कि मैं तो यहाँ बहुत सीनियर हूँ, तूने मुझे चोट कैसे पहुँचा दी? अरे! जो कर रहे हो, भुगतना पड़ेगा। तुम करो चाहे कोई और करे, सज़ा एक बराबर मिलेगी। पर आपकी अपेक्षा क्या होती है? तुमने मुझे कैसे डाँट दिया? देखो कि तुम अपना अतीत लेकर के चल रहे हो।
अरे! जो करा है, वही तुम हो न। तुम्हारा और कोई परिचय ही नहीं है अभी। बाहर बारिश हो रही है, पानी पड़ा हुआ है, जाओ फिसल जाओ और उसके बाद फ़र्श को पीटो कि मैं तेरा किराया देता हूँ कमीने और तूने मुझे ही गिरा दिया। अस्तित्व आपके खोखले सिद्धान्तों पर नहीं चलता है। आप जो कर रहे हो, बस उतने ही आप हो। उसके आगे-पीछे का कुछ लेकर मत आना। आगे-पीछे कुछ भी लेकर मत आना।
पर हमारी बड़ी उम्मीदें रहती हैं। हम क्या हैं इस पर हमारी नज़र कम रहती है। हमारी नज़र इस पर ज़्यादा रहती है कि हमारा परिचय क्या है, लम्बा-चौड़ा। और हम सोचते हैं कि हमसे वो व्यवहार किया जाये जो हमारे परिचय के अनुरूप हो। हम जो हैं, उसके अनुरूप नहीं।
अरे! तुम हो और तुम हो और तुम हो — तीनों अगर एक भूल कर रहे हो तो तीनों को एक जैसी ही सज़ा मिलेगी। अब इसमें यह अपेक्षा ही क्यों, ‘अरे! मेरे साथ ऐसा क्यों कर दिया? उसको डाँटो, उसको डाँटो।‘ फिर ठीक है। फ़र्श पर सर पटको और बोलो फ़र्श से कि मैं तो बड़ा आदमी हूँ, मुझे तूने चोट कैसे दे दी। सर पटकोगे तो चोट लगेगी — यही शून्यता है।





