प्रश्न: मनुस्मृति से संबंधित सवाल पूछा गया है।
नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि । धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च । ।
“भक्षण करने योग्य प्राणियों को प्रतिदिन खाने वाला किसी दोष से ग्रस्त नहीं होता;क्योंकि इस लोक में खाने वालों और खाए जाने वाले लोगों की रचना ब्रह्मा जी ने ही की है।“ (मनुस्मृति अध्याय ५, श्लोक ३०)
(प्रश्न मूल रूप से अग्रेंजी में है— ‘इट इज़ नॉट सिनफुल टू इट दी मीट ऑफ़ ईटबल ऐनमल्स, फ़ॉर ब्रह्मा हैज़ क्रीऐट बोथ दी इटर्स एंड दी इटबल्स।‘)
आचार्य प्रशांत: तुमने एक ही काहे को अनुराग श्लोक भेजा और भी हैं।
उसके आगे भी हैं—
यज्ञाय जग्धिर्मांसस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः । अतोऽन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ।
(अध्याय ५, श्लोक ३१)




